।। श्रीलक्ष्मीनारायण स्त्रोत।।

।। श्रीलक्ष्मीनारायण स्त्रोत।।

ध्यानम्
चक्रं विद्या-वर घट-गदा-दर्पणम्
पद्म-युग्मं दोर्भिः बिभ्रत् सुरुचिर-तनुं मेघ-विद्युन्निभाभम्
गाढ-उत्कण्ठं विवश-मनिशं पुण्डरीकाक्ष-लक्ष्म्यो-रेकीभूतं
वपुरवतु वः पीत-कौशेय-कान्तम्
शंख-चक्र-गदा-पद्म-कुंभाऽऽदर्शा-ब्ज-पुस्तकम्
बिभ्रतं मेघ-चपल-वर्णं लक्ष्मी-हरिं भजे
स्तोत्रम्
विद्युत्-प्रभा-श्लिष्ट-घन-उपमानौ
शुद्ध-आशये बिंबित-सुप्रकाशौ
चित्ते चिदाभौ कलयामि लक्ष्मी-नारायणौ
सत्त्व-गुण-प्रधानौ
लोकोद्भव-स्थे मलयेश्वराभ्यां
शोक-उरुदीन-स्थितिनाशकाभ्याम्
नित्यं युवाभ्यां नतिरस्तु लक्ष्मी-नारायणाभ्यां
जगतः पितृभ्याम्
सम्पत्-सुख-आनन्द-विधायकाभ्यां
भक्तावना-ऽनारत-दीक्षिताभ्याम्
नित्यं युवाभ्यां नतिरस्तु लक्ष्मी-नारायणाभ्यां
जगतः पितृभ्याम्
दृष्ट्वो-पकारे गुरुतां च पञ्च-विंश-ावतारान्
सरसं दधत्भ्याम्
नित्यं युवाभ्यां नतिरस्तु लक्ष्मी-नारायणाभ्यां
जगतः पितृभ्याम्
क्षीरांबुराश्यादि-विराट-भवाभ्यां
नारं सदा पालयितुं पराभ्याम्
नित्यं युवाभ्यां नतिरस्तु लक्ष्मी-नारायणाभ्यां
जगतः पितृभ्याम्
दारिद्र्य-दुःख-स्थिति-दारकाभ्यां
दयैव-दूरीकृत-दुर्गतिभ्याम्
नित्यं युवाभ्यां नतिरस्तु लक्ष्मी-नारायणाभ्यां
जगतः पितृभ्याम्
भक्त-व्रजा-घौघ-विदारकाभ्यां
स्वीय-आशयो-द्धूत-रज-स्तमोभ्याम्
नित्यं युवाभ्यां नतिरस्तु लक्ष्मी-नारायणाभ्यां
जगतः पितृभ्याम्
रक्त-उत्पल-आभ्र-आभव-पुर-धराभ्यां
पद्म-री शंख-ब्ज-गदाधराभ्याम्
नित्यं युवाभ्यां नतिरस्तु लक्ष्मी-नारायणाभ्यां
जगतः पितृभ्याम्
अङ्घ्रि-द्वयाभ्यर्चक-कल्पकाभ्यां
मोक्ष-प्रद-प्राक्तन-दंपतीभ्याम्
नित्यं युवाभ्यां नतिरस्तु लक्ष्मी-नारायणाभ्यां
जगतः पितृभ्याम्
फलश्रुति
इदं तु यः पठेत् स्तोत्रं लक्ष्मी-नारायण-ष्टकम्
ऐहिक-आमुष्मिक-सुखं भुक्त्वा स लभतेऽमृतम्
इति श्रीकृष्णकृतं लक्ष्मी-नारायण स्तोत्रं संपूर्णम्

भावार्थ

भावार्थ (Meaning)
ध्यानम् – इस मंत्र के ध्यान में लक्ष्मी (धन, वैभव, सुख-समृद्धि की देवी) और नारायण (भगवान विष्णु, पालनहार) की कल्पना की जाती है। उनके हाथों में चक्र, शंख, गदा, पद्म, कमल और ज्ञान का प्रतीक रखा है। शरीर स्वर्णाभ, कांतिमान और मेघ विद्युत के समान तेजस्वी दिखता है।
स्तोत्रम् – प्रत्येक श्लोक में लक्ष्मी नारायण की महिमा का वर्णन है और उनके निम्नलिखित गुणों का स्मरण कराया गया है:
सत्त्वगुणप्रधान – ये दोनों सदा धर्म और सद्गुणों के पालन में रहते हैं।
लोककल्याणकारी – संसार में दुःख, शोक और संकटों को नष्ट करते हैं।
सम्पत्ति सुख की प्रदायक – भक्तों को समृद्धि, सुख और आनंद प्रदान करते हैं।
पितृकल्याणकारी – पूर्वजों के पितृकर्म और कल्याण के लिए भी यह स्तोत्र उपयोगी है।
मोक्षप्रद – अज्ञान और अंधकार को दूर कर मोक्ष की ओर ले जाते हैं।
फलश्रुति – जो व्यक्ति इस स्तोत्र का नियमित पाठ करता है, वह ऐहिक सुख और भोग प्राप्त करता है और आध्यात्मिक दृष्टि से अमृत प्राप्ति करता है।

पूजन विधि

पाठ की विधि (How to Recite) साफ-सुथरी जगह पर बैठें और मानसिक रूप से भगवान लक्ष्मी नारायण का ध्यान करें। शुद्ध मन और तन से इस स्तोत्र का पाठ करें। पाठ के समय संयमित स्वर और उच्चारण का ध्यान रखें। संभव हो तो स्नान कर के, शुद्ध वस्त्र पहन कर और कमल का फूल अर्पित करते हुए पाठ करें। पाठ समाप्ति के बाद हाथ जोड़कर प्रार्थना करें। संख्या – रोजाना 1 या 3 बार पाठ करना शुभ है। पर्व, पूजा, या विशेष अवसर पर 7 या 11 बार पाठ करने से विशेष लाभ मिलता है।

लाभ एवं महत्व

लाभ (Benefits) ऐहिक लाभ – घर में धन-समृद्धि, सुख, सौभाग्य, वैभव और जीवन में सुख-शांति। आध्यात्मिक लाभ – शोक, तनाव, दुख और नकारात्मक प्रभावों से मुक्ति। पितृकल्याण – पूर्वजों की आत्मा को शांति और पुण्य। मोक्ष और ज्ञान – अज्ञान का नाश और मोक्ष की प्राप्ति में सहायता। सर्वसिद्धि – जीवन में समस्त कल्याणकारी उपलब्धियों की प्राप्ति।