॥ दुर्गा सप्तशती नवमोऽध्यायः ॥
निशुंभवध नाम नवम अध्याय — श्लोकवार पूर्ण भावार्थ
🔶 ध्यान श्लोक — भावार्थ
मैं उस देवी का ध्यान करता हूँ जो बन्धूक पुष्प और स्वर्ण के समान कान्तिमयी हैं, सुंदर अक्ष-माला, पाश और अंकुश धारण करती हैं, अपने हाथों से वर देने वाली हैं। जिनके आभूषण चन्द्रमा के अंश के समान शोभायमान हैं, जो तीन नेत्रों वाली हैं, जो आधी अंबिका और आधे ईश्वर (अर्धनारीश्वर रूप) के स्वरूप में निरंतर विराजमान हैं — ऐसी देवी का मैं आश्रय ग्रहण करता हूँ।
श्लोक 1 — भावार्थ
राजा ने कहा —
श्लोक 2 — भावार्थ
हे भगवन्! आपने मुझे देवी के रक्तबीज वध से सम्बद्ध जो अद्भुत चरित्र और माहात्म्य बताया है, वह अत्यंत विचित्र और आश्चर्यजनक है।
श्लोक 3 — भावार्थ
अब मैं यह भी सुनना चाहता हूँ कि जब रक्तबीज मारा गया, तब अत्यंत क्रोधी शुंभ और निशुंभ ने क्या किया।
श्लोक 4 — भावार्थ
ऋषि ने कहा —
श्लोक 5 — भावार्थ
रक्तबीज के मारे जाने पर तथा अन्य असुरों के युद्ध में मारे जाने पर शुंभ और निशुंभ ने अत्यंत अपार क्रोध किया।
श्लोक 6 — भावार्थ
अपनी विशाल सेना को नष्ट होते देखकर और अत्यंत क्रोधित होकर निशुंभ मुख्य असुर सेना के साथ देवी पर आक्रमण करने दौड़ा।
श्लोक 7 — भावार्थ
उसके आगे, पीछे और दोनों पार्श्वों में बड़े-बड़े असुर क्रोध से होंठ काटते हुए देवी को मारने के लिए आगे बढ़े।
श्लोक 8 — भावार्थ
महावीर्यवान शुंभ भी अपनी सेना से घिरा हुआ, मातृशक्तियों के साथ युद्ध करता हुआ, क्रोधपूर्वक चंडिका को मारने के लिए आया।
श्लोक 9 — भावार्थ
तब देवी और शुंभ-निशुंभ के बीच अत्यंत भीषण युद्ध हुआ। दोनों ओर से ऐसे तीव्र बाणों की वर्षा होने लगी जैसे दो मेघ परस्पर वर्षा कर रहे हों।
श्लोक 10 — भावार्थ
चंडिका ने अपने बाणों के समूह से उनके बाणों को काट दिया और शस्त्रों की वर्षा से दोनों असुरराजों के अंगों पर प्रहार किया।
श्लोक 11 — भावार्थ
निशुंभ ने तेज धार वाली तलवार और सुंदर ढाल लेकर देवी के श्रेष्ठ वाहन सिंह के मस्तक पर प्रहार किया।
श्लोक 12 — भावार्थ
सिंह के आहत होने पर देवी ने तीक्ष्ण अस्त्र से शीघ्र ही शुंभ की ढाल और आठ चन्द्रों से अलंकृत उसकी तलवार काट डाली।
श्लोक 13 — भावार्थ
ढाल और तलवार कट जाने पर उस असुर ने शक्ति फेंकी, परंतु देवी ने सामने आती हुई उस शक्ति को भी अपने चक्र से दो टुकड़े कर दिए।
श्लोक 14 — भावार्थ
क्रोध से उन्मत्त होकर निशुंभ ने शूल उठाया, पर देवी ने उसे मुट्ठी के प्रहार से चूर्ण कर दिया।
श्लोक 15 — भावार्थ
उसने गदा उठाकर चंडिका पर फेंकी, परंतु देवी के त्रिशूल से वह गदा भी टूटकर भस्म हो गई।
श्लोक 16 — भावार्थ
फिर परशु हाथ में लेकर आते हुए उस दैत्यश्रेष्ठ को देवी ने बाणों की वर्षा से मारकर पृथ्वी पर गिरा दिया।
श्लोक 17 — भावार्थ
भीषण पराक्रमी निशुंभ के भूमि पर गिरने पर उसका भाई शुंभ अत्यंत क्रोधित होकर अम्बिका को मारने के लिए आगे बढ़ा।
श्लोक 18 — भावार्थ
वह रथ पर आरूढ़ होकर, आठ विशाल भुजाओं में उत्तम अस्त्र धारण किए, समस्त आकाश को व्याप्त करता हुआ शोभायमान हुआ।
श्लोक 19 — भावार्थ
उसे आते देखकर देवी ने शंख बजाया और धनुष की प्रत्यंचा का असह्य शब्द किया।
श्लोक 20 — भावार्थ
देवी ने अपनी घंटा के नाद से दिशाओं को भर दिया और उस ध्वनि से दैत्य सेना का तेज नष्ट होने लगा।
श्लोक 21 — भावार्थ
सिंह ने भी महान गर्जना करके आकाश, पृथ्वी और दसों दिशाओं को भर दिया।
श्लोक 22 — भावार्थ
काली ने आकाश में उछलकर दोनों हाथों से पृथ्वी को आघात किया। उस भयंकर ध्वनि से पूर्व की सारी ध्वनियाँ दब गईं।
श्लोक 23 — भावार्थ
शिवदूती ने अट्टहास किया जिससे असुर भयभीत हो गए और शुंभ अत्यंत क्रोधित हो उठा।
श्लोक 24 — भावार्थ
जब अम्बिका ने “दुरात्मन्! ठहर, ठहर!” कहा, तब आकाश में स्थित देवताओं ने “जय!” का उच्चारण किया।
श्लोक 25 — भावार्थ
शुंभ द्वारा छोड़ी गई अग्नि के समान प्रज्वलित शक्ति को देवी ने एक महा उल्का से नष्ट कर दिया।
श्लोक 26 — भावार्थ
शुंभ के सिंहनाद से तीनों लोक गूँज उठे, पर देवी के घोर शब्द ने उसे भी पराजित कर दिया।
श्लोक 27 — भावार्थ
शुंभ और देवी दोनों ने एक-दूसरे के छोड़े हुए बाणों को अपने-अपने तीव्र बाणों से सैकड़ों और हजारों की संख्या में काट डाला।
श्लोक 28 — भावार्थ
तब क्रोधित चंडिका ने शूल से शुंभ को आहत किया और वह मूर्छित होकर भूमि पर गिर पड़ा।
श्लोक 29 — भावार्थ
निशुंभ ने चेतना प्राप्त कर धनुष उठाया और देवी, काली तथा सिंह पर बाण चलाए।
श्लोक 30 — भावार्थ
फिर दैत्यराज ने असंख्य बाण और चक्र छोड़कर चंडिका को पीड़ित करने का प्रयास किया।
श्लोक 31 — भावार्थ
दुर्गा ने क्रोधित होकर अपने बाणों से उसके चक्र और शस्त्रों को काट डाला।
श्लोक 32 — भावार्थ
निशुंभ गदा लेकर देवी को मारने दौड़ा, उसके साथ पूरी दैत्य सेना थी।
श्लोक 33 — भावार्थ
चंडिका ने उसकी गदा तलवार से काट दी। तब उसने शूल उठा लिया।
श्लोक 34 — भावार्थ
शूल लेकर आते हुए निशुंभ को देवी ने अपने शूल से हृदय में बेध दिया।
श्लोक 35 — भावार्थ
जब वह शूल से घायल हुआ, तब उसके हृदय से एक और अत्यंत बलवान पुरुष निकला और बोला — “ठहर!”
श्लोक 36 — भावार्थ
देवी ने हँसकर उसका सिर तलवार से काट दिया और वह भूमि पर गिर पड़ा।
श्लोक 37 — भावार्थ
सिंह ने अपनी उग्र दाढ़ों से अनेक असुरों के सिर चबा डाले। काली और शिवदूती ने भी अन्य असुरों को मार डाला।
श्लोक 38 — भावार्थ
कुछ असुर कौमारी की शक्ति से मारे गए, कुछ ब्रह्माणी के मंत्रपूत जल से नष्ट हुए।
श्लोक 39 — भावार्थ
कुछ माहेश्वरी के त्रिशूल से और कुछ वाराही के दांतों के प्रहार से चूर्ण हो गए।
श्लोक 40 — भावार्थ
कुछ असुर वैष्णवी के चक्र से टुकड़े-टुकड़े हुए और कुछ ऐंद्री के वज्र से मारे गए।
श्लोक 41 — भावार्थ
कुछ असुर युद्ध में मारे गए, कुछ भाग गए, और कुछ काली, शिवदूती तथा सिंह द्वारा भक्षण किए गए।
श्लोक 42 — भावार्थ (समापन)
इस प्रकार मार्कण्डेय पुराण के सावर्णिक मन्वंतर में वर्णित देवी महात्म्य के नवम अध्याय “निशुंभ वध” की समाप्ति हुई।
🔶 आहुति — भावार्थ
ॐ क्लीं — जयन्ती देवी, जो अंग, आयुध, शक्ति, परिवार और वाहन सहित हैं, उन्हें मैं यह महा आहुति समर्पित करता हूँ। नमः, स्वाहा।...