।। श्री विनायक स्तोत्रम् ।।

।। श्री विनायक स्तोत्रम् ।।

मूषिकवाहन मोदकहस्त चामरकर्ण विलम्बितसूत्र ।
वामनरूप महेश्वरपुत्र विघ्नविनायक पाद नमस्ते ॥

देवदेवसुतं देवं जगद्विघ्नविनायकम् ।
हस्तिरूपं महाकायं सूर्यकोटिसमप्रभम् ॥ १॥

वामनं जटिलं कान्तं ह्रस्वग्रीवं महोदरम् ।
धूम्रसिन्दूरयुद्गण्डं विकटं प्रकटोत्कटम् ॥ २॥

एकदन्तं प्रलम्बोष्ठं नागयज्ञोपवीतिनम् ।
त्र्यक्षं गजमुखं कृष्णं सुकृतं रक्तवाससम् ॥ ३॥

दन्तपाणिं च वरदं ब्रह्मण्यं ब्रह्मचारिणम् ।
पुण्यं गणपतिं दिव्यं विघ्नराजं नमाम्यहम् ॥ ४॥

देवं गणपतिं नाथं विश्वस्याग्रे तु गामिनम् ।
देवानामधिकं श्रेष्ठं नायकं सुविनायकम् ॥ ५॥

नमामि भगवं देवं अद्भुतं गणनायकम् ।
वक्रतुण्ड प्रचण्डाय उग्रतुण्डाय ते नमः ॥ ६॥

चण्डाय गुरुचण्डाय चण्डचण्डाय ते नमः ।
मत्तोन्मत्तप्रमत्ताय नित्यमत्ताय ते नमः ॥ ७॥

उमासुतं नमस्यामि गङ्गापुत्राय ते नमः ।
ओङ्काराय वषट्कार स्वाहाकाराय ते नमः ॥ ८॥

मन्त्रमूर्ते महायोगिन् जातवेदे नमो नमः ।
परशुपाशकहस्ताय गजहस्ताय ते नमः ॥ ९॥

मेघाय मेघवर्णाय मेघेश्वर नमो नमः ।
घोराय घोररूपाय घोरघोराय ते नमः ॥ १०॥

पुराणपूर्वपूज्याय पुरुषाय नमो नमः ।
मदोत्कट नमस्तेऽस्तु नमस्ते चण्डविक्रम ॥ ११॥

विनायक नमस्तेऽस्तु नमस्ते भक्तवत्सल ।
भक्तप्रियाय शान्ताय महातेजस्विने नमः ॥ १२॥

यज्ञाय यज्ञहोत्रे च यज्ञेशाय नमो नमः ।
नमस्ते शुक्लभस्माङ्ग शुक्लमालाधराय च ॥ १३॥

मदक्लिन्नकपोलाय गणाधिपतये नमः ।
रक्तपुष्प प्रियाय च रक्तचन्दन भूषित ॥ १४॥

अग्निहोत्राय शान्ताय अपराजय्य ते नमः ।
आखुवाहन देवेश एकदन्ताय ते नमः ॥ १५॥

शूर्पकर्णाय शूराय दीर्घदन्ताय ते नमः ।
विघ्नं हरतु देवेश शिवपुत्रो विनायकः ॥ १६।।

~फलश्रुति~

जपादस्यैव होमाच्च सन्ध्योपासनसस्तथा ।
विप्रो भवति वेदाढ्यः क्षत्रियो विजयी भवेत् ॥

वैश्यो धनसमृद्धः स्यात् शूद्रः पापैः प्रमुच्यते ।
गर्भिणी जनयेत्पुत्रं कन्या भर्तारमाप्नुयात् ॥

प्रवासी लभते स्थानं बद्धो बन्धात् प्रमुच्यते ।
इष्टसिद्धिमवाप्नोति पुनात्यासत्तमं कुलं ॥

सर्वमङ्गलमाङ्गल्यं सर्वपापप्रणाशनम् ।
सर्वकामप्रदं पुंसां पठतां श्रुणुतामपि ॥

इति श्रीब्रह्माण्डपुराणे स्कन्दप्रोक्त विनायकस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

भावार्थ

श्री विनायक स्तोत्रम् — भावार्थ
🔱 प्रथम मंगलाचरण
मूषिकवाहन… पाद नमस्ते
जो मूषक वाहन पर विराजमान हैं, जिनके हाथ में मोदक है, जिनके कान सूप के समान विशाल हैं, जो महेश्वर के पुत्र हैं—
ऐसे विघ्नों का नाश करने वाले श्री विनायक के चरणों में नमस्कार।
1–5 श्लोक : स्वरूप-वर्णन
गणपति देवों में श्रेष्ठ, विश्व के प्रारम्भ में पूज्य
हाथीमुख, विशाल शरीर, सूर्य के समान तेज
वामन रूप, जटाधारी, लम्बोदर
एकदन्त, नागयज्ञोपवीत, त्रिनेत्र
वरदायक, ब्रह्मचारी, विघ्नराज
👉 यहाँ गणेश को सगुण ब्रह्म के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है।
6–8 श्लोक : उग्र-तत्व व तत्त्वस्वरूप
वक्रतुण्ड, उग्र, प्रचण्ड
चण्ड, गुरुचण्ड, मत्त एवं उन्मत्त
उमा-पुत्र, गंगा-पुत्र
ॐकार, वषट्, स्वाहा — यज्ञीय तत्त्व
👉 यह भाग बताता है कि गणपति केवल सौम्य नहीं,
तामस-राजस-सात्त्विक तीनों शक्तियों के अधिपति हैं।
9–11 श्लोक : योग और ब्रह्मतत्त्व
मंत्रमूर्ति, महायोगी
परशु-पाश धारणकर्ता
मेघ के समान व्यापक
पुराणपूर्व पूज्य, आदिपुरुष
महाविक्रमशाली
👉 गणपति को यहाँ योगेश्वर और ब्रह्मस्वरूप कहा गया है।
12–16 श्लोक : भक्तवत्सल रूप
भक्तों पर स्नेह रखने वाले
शान्त, महातेजस्वी
यज्ञस्वरूप, यज्ञेश्वर
रक्त पुष्प प्रिय
अखुवाहन, एकदन्त
अंत में प्रार्थना—
“हे शिवपुत्र विनायक, मेरे विघ्नों का नाश करें।”
📜 फलश्रुति — भावार्थ
ब्राह्मण — वेदज्ञान सम्पन्न
क्षत्रिय — विजयी
वैश्य — धनसमृद्ध
शूद्र — पापमुक्त
अन्य फल:
गर्भिणी को पुत्र
कन्या को योग्य पति
प्रवासी को स्थिर स्थान
बंदी को बंधन-मुक्ति
कुल का शुद्धिकरण
सभी प्रकार की सिद्धि और मंगल
👉 पाठ करने वाला ही नहीं, सुनने वाला भी फल पाता है।

पूजन विधि

पाठ-विधि (सरल व सुरक्षित) ⏰ समय प्रातःकाल (विशेष) या किसी भी शुभ कार्य से पूर्व चतुर्थी, बुधवार, संकष्टी विशेष फलदायी 🪔 विधि स्नान कर स्वच्छ वस्त्र दीप/धूप ॐ गं गणपतये नमः — 3 या 11 बार पूरा स्तोत्र 1 बार (या 3 / 11 बार) अंत में मौन प्रार्थना ❗ न न्यास अनिवार्य, न दीक्षा आवश्यक

लाभ एवं महत्व

श्री विनायक स्तोत्र के लाभ 🛡️ सांसारिक कार्य-विघ्न नाश नौकरी, परीक्षा, व्यापार में सफलता ऋण, विवाद, बाधा शमन 🧠 मानसिक भय, अस्थिरता, भ्रम दूर निर्णय-शक्ति और एकाग्रता 🔱 आध्यात्मिक मंत्र-सिद्धि में सहायता अन्य देव-पूजा की पूर्णता साधना में सुरक्षा कवच जैसा प्रभाव