II देवी माहात्म्यं अर्गला स्तोत्रम् II

II देवी माहात्म्यं अर्गला स्तोत्रम् II

अस्यश्री अर्गला स्तोत्र मन्त्रस्य विष्णुः ऋषिः अनुष्टुप्छन्दः श्री महालक्षीर्देवता मन्त्रोदिता देव्योबीजं
नवार्णो मन्त्र शक्तिः श्री सप्तशती मन्त्रस्तत्वं श्री जगदम्बा प्रीत्यर्थे सप्तशती पठां गत्वेन जपे विनियोगः॥

ध्यानं
ॐ बन्धूक कुसुम-आभासाम् पञ्च-मुण्ड-अधि-वासिनीम् ।
स्फुरत्-चन्द्र-कला-रत्न-मुकुटाम् मुण्ड-मालिनीम् ॥
त्रि-नेत्राम् रक्त-वसनाम् पीन-उन्नत-घट-स्तनीम् ।
पुस्तकम् च अक्ष-मालाम् च वरम् च अभयकम् क्रमात् ॥
दधतीम् संस्मरेत् नित्यम् उत्तर-आम्नाय-मानिताम् ।

अथवा
या चण्डी मधु-कैटभ-आदि दैत्य-दलनी या माहिष-उन्मूलिनी
या धूम्र-ईक्षण चण्ड-मुण्ड-मथनी या रक्त-बीज-अशनी ॥
शक्तिः शुम्भ-निशुम्भ-दैत्य-दलनी या सिद्धि-दात्री परा
सा देवी नव-कोटि-मूर्ति सहिता माम् पातु विश्व-ईश्वरी॥

ॐ नमश्चण्डिकायै
मार्कण्डेय उवाच
(1)

ॐ जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी।
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते॥1॥

पद-विच्छेद:
ॐ जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमः अस्तु ते

(2)

जय त्वं देवि चामुण्डे जय भूतार्तिहारिणि।
जय सर्वगते देवि कालरात्रि नमोऽस्तु ते॥2॥

पद-विच्छेद:
जय त्वम् देवि चामुण्डे जय भूत-आर्ति-हारिणि
जय सर्वगते देवि कालरात्रि नमः अस्तु ते

(3)

मधुकैटभविद्राविविधातृवरदे नमः।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥3॥

पद-विच्छेद:
मधु-कैटभ-विद्रावि विधातृ-वर-दे नमः
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि

(4)

महिषासुरनिर्णाशि भक्तानां सुखदे नमः।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥4॥

पद-विच्छेद:
महिष-असुर-निर्-नाशि भक्तानाम् सुख-दे नमः
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि

(5)

रक्तबीजवधे देवि चण्डमुण्डविनाशिनि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥5॥

पद-विच्छेद:
रक्त-बीज-वधे देवि चण्ड-मुण्ड-विनाशिनि
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि

(6)

शुम्भस्यैव निशुम्भस्य धूम्राक्षस्य च मर्दिनि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥6॥

पद-विच्छेद:
शुम्भस्य एव निशुम्भस्य धूम्र-अक्षस्य च मर्दिनि
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि

(7)

वन्दिताङ्घ्रियुगे देवि सर्वसौभाग्यदायिनि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥7॥

पद-विच्छेद:
वन्दित-अङ्घ्रि-युगे देवि सर्व-सौ-भाग्य-दायिनि
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि

(8)

अचिन्त्यरुपचरिते सर्वशत्रुविनाशिनि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥8॥

पद-विच्छेद:
अचिन्त्य-रूप-चरिते सर्व-शत्रु-विनाशिनि
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि

(9)

नतेभ्यः सर्वदा भक्त्या चण्डिके दुरितापहे।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥9॥

पद-विच्छेद:
नतेभ्यः सर्वदा भक्त्या चण्डिके दुरित-अप-हे
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि

(10)

स्तुवद्भ्यो भक्तिपूर्वं त्वां चण्डिके व्याधिनाशिनि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥10॥

पद-विच्छेद:
स्तुवद्भ्यः भक्ति-पूर्वं त्वाम् चण्डिके व्याधि-नाशिनि
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि

(11)

चण्डिके सततं ये त्वामर्चयन्तीह भक्तितः।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥11॥

पद-विच्छेद:
चण्डिके सततम् ये त्वाम् अर्चयन्ति इह भक्तितः
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि

(12)

देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम्।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥12॥

पद-विच्छेद:
देहि सौभाग्य-आरोग्यम् देहि मे परम् सुखम्
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि

(13)

विधेहि द्विषतां नाशं विधेहि बलमुच्चकैः।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥13॥

पद-विच्छेद:
विधेहि द्विषताम् नाशम् विधेहि बलम् उच्चकैः
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि

(14)

विधेहि देवि कल्याणं विधेहि परमां श्रियम्।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥14॥

पद-विच्छेद:
विधेहि देवि कल्याणम् विधेहि परमाम् श्रियम्
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि

(15)

सुरासुरशिरोरत्ननिघृष्टचरणेऽम्बिके।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥15॥

पद-विच्छेद:
सुर-असुर-शिरः-रत्न-निघृष्ट-चरणे अम्बिके
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि

(16)

विद्यावन्तं यशस्वन्तं लक्ष्मीवन्तं जनं कुरु।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥16॥

पद-विच्छेद:
विद्या-वन्तम् यशः-वन्तम् लक्ष्मी-वन्तम् जनम् कुरु
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि

(17)

प्रचण्डदैत्यदर्पघ्ने चण्डिके प्रणताय मे।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥17॥

पद-विच्छेद:
प्रचण्ड-दैत्य-दर्प-घ्ने चण्डिके प्रणताय मे
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि

(18)

चतुर्भुजे चतुर्वक्त्रसंस्तुते परमेश्वरि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥18॥

पद-विच्छेद:
चतुः-भुजे चतुः-वक्त्र-संस्तुते परम-ईश्वरि
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि

(19)

कृष्णेन संस्तुते देवि शश्वद्भक्त्या सदाम्बिके।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥19॥

पद-विच्छेद:
कृष्णेन संस्तुते देवि शश्वत् भक्त्या सदा अम्बिके
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि

(20)

हिमाचलसुतानाथसंस्तुते परमेश्वरि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥20॥

पद-विच्छेद:
हिमाचल-सुता-नाथ-संस्तुते परम-ईश्वरि
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि

(21)

इन्द्राणीपतिसद्भावपूजिते परमेश्वरि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥21॥

पद-विच्छेद:
इन्द्राणी-पति-सत्-भाव-पूजिते परम-ईश्वरि
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि

(22)

देवि प्रचण्डदोर्दण्डदैत्यदर्पविनाशिनि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥22॥

पद-विच्छेद:
देवि प्रचण्ड-दोः-दण्ड-दैत्य-दर्प-विनाशिनि
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि

(23)

देवि भक्तजनोद्दामदत्तानन्दोदयेऽम्बिके।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥23॥

पद-विच्छेद:
देवि भक्त-जन-उद्-दाम-दत्त-आनन्द-उदये अम्बिके
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि

(24)

पत्नीं मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम्।
तारिणीं दुर्गसंसारसागरस्य कुलोद्भवाम्॥24॥

पद-विच्छेद:
पत्नीम् मनो-रमाम् देहि मनः-वृत्ति-अनु-सारिणीम्
तारिणीम् दुर्ग-संसार-सागरस्य कुल-उद्-भवाम्

(25)

इदं स्तोत्रं पठित्वा तु महास्तोत्रं पठेन्नरः।
स तु सप्तशतीसंख्यावरमाप्नोति सम्पदाम्॥25॥

पद-विच्छेद:
इदम् स्तोत्रम् पठित्वा तु महा-स्तोत्रम् पठेत् नरः
स तु सप्त-शती-संख्या-वरम् आप्नोति सम्पदाम्...

भावार्थ

अर्गला स्तोत्रम् — भावार्थ

(1)
हे देवी! आप विजय देने वाली, मंगलस्वरूपा, काली, भद्रकाली और कपालधारिणी हैं।
आप दुर्गा, क्षमा और पालन करने वाली हैं — आपको नमस्कार है।

(2)
हे चामुण्डा देवी! आपकी जय हो।
आप समस्त प्राणियों के दुःख हरने वाली, सर्वत्र व्याप्त और कालरात्रि स्वरूपा हैं।

(3)
हे मधु-कैटभ का संहार करने वाली, ब्रह्मा को वर देने वाली देवी!
हमें तेज, विजय और यश दीजिए तथा शत्रुओं का नाश कीजिए।

(4)
हे महिषासुर का विनाश करने वाली, भक्तों को सुख देने वाली देवी!
हमें रूप, विजय, यश प्रदान करें और शत्रुओं का नाश करें।

(5)
हे रक्तबीज का वध करने वाली, चण्ड-मुण्ड का संहार करने वाली देवी!
हमें तेज, विजय, यश दें और शत्रुओं का नाश करें।

(6)
हे शुम्भ, निशुम्भ और धूम्राक्ष का मर्दन करने वाली देवी!
हमें रूप, विजय, यश प्रदान करें और शत्रुओं का नाश करें।

(7)
हे देवी! आपके चरणों की वन्दना करने वालों को आप सम्पूर्ण सौभाग्य देती हैं।
हमें भी विजय, यश और शत्रुनाश प्रदान करें।

(8)
हे अचिन्त्य स्वरूप और अद्भुत चरित्र वाली देवी!
आप समस्त शत्रुओं का नाश करने वाली हैं — हमें भी वही कृपा दें।

(9)
हे चण्डिके! जो भक्त नम्रता और भक्ति से आपकी शरण लेते हैं,
आप उनके समस्त पाप और कष्ट दूर करती हैं।

(10)
हे देवी! जो भक्त भक्ति-पूर्वक आपकी स्तुति करते हैं,
आप उनके रोगों का नाश करती हैं और उन्हें विजय देती हैं।

(11)
हे चण्डिके! जो भक्त निरन्तर भक्ति से आपकी पूजा करते हैं,
उन्हें रूप, विजय, यश और शत्रुनाश का फल प्राप्त होता है।

(12)
हे देवी! मुझे सौभाग्य, आरोग्य और परम सुख प्रदान कीजिए
तथा विजय और यश से विभूषित कीजिए।

(13)
हे देवी! मेरे शत्रुओं का पूर्ण नाश कीजिए
और मुझे अत्यधिक बल प्रदान कीजिए।

(14)
हे माता! मेरे जीवन में कल्याण कीजिए
और मुझे महान समृद्धि प्रदान कीजिए।

(15)
हे अम्बिके! जिनके चरण देवताओं और असुरों के मुकुटों से चमकते हैं,
आप मुझे विजय, यश और शत्रुनाश प्रदान करें।

(16)
हे देवी! मुझे विद्वान, यशस्वी और लक्ष्मीवान बनाइए
और शत्रुओं का नाश कीजिए।

(17)
हे प्रचण्ड दैत्य-दर्प का नाश करने वाली चण्डिके!
मैं आपकी शरण में हूँ — मुझे विजय और यश प्रदान करें।

(18)
हे चार भुजाओं और चार मुखों वाली परमेश्वरी!
आपकी स्तुति करता हूँ — कृपा कर मुझे सफल बनाइए।

(19)
हे देवी! जिनकी स्तुति स्वयं श्रीकृष्ण ने की है,
आप मेरी भक्ति स्वीकार कर मुझे विजय दें।

(20)
हे हिमालय-सुता के स्वामी द्वारा स्तुत परमेश्वरी!
आप मुझे रूप, विजय और यश प्रदान करें।

(21)
हे देवी! जिनकी पूजा इन्द्राणी के पति इन्द्र करते हैं,
आप मुझे शत्रुनाश और सफलता दें।

(22)
हे देवी! अपने प्रचण्ड भुजादण्ड से दैत्यों के अभिमान का नाश करने वाली,
मुझे विजय और यश प्रदान करें।

(23)
हे अम्बिके! आप भक्तों को असीम आनन्द देने वाली हैं,
मुझे भी वही कृपा प्रदान करें।

(24)
हे देवी! मुझे सुशील, मनोहर, अनुकूल स्वभाव वाली पत्नी दें
और इस दुर्ग संसार-सागर से पार कराने वाली बनें।

(25)
जो मनुष्य इस अर्गला स्तोत्र का पाठ करता है
वह दुर्गा सप्तशती के समान दुर्लभ सम्पत्ति और वर प्राप्त करता है।

पूजन विधि

अर्गला स्तोत्र पाठ-विधि (Vidhi) 1️⃣ पात्रता स्त्री-पुरुष, गृहस्थ-सन्यासी — सबके लिए योग्य विशेषतः नवरात्रि, अष्टमी, नवमी, अमावस्या, शुक्रवार को श्रेष्ठ 2️⃣ पूर्व-तैयारी स्नान करके शुद्ध वस्त्र धारण करें शांत स्थान में पूर्व या उत्तर मुख होकर बैठें देवी दुर्गा / चण्डिका का ध्यान करें 3️⃣ क्रम (बहुत महत्वपूर्ण) शास्त्रानुसार अर्गला स्तोत्र अकेले नहीं, इस क्रम से पढ़ना श्रेष्ठ है: देवी कवच अर्गला स्तोत्र कीलक स्तोत्र (यदि संभव हो तो) सप्तशती पाठ 👉 यदि पूरा संभव न हो तो: कवच + अर्गला + कीलक — न्यूनतम आवश्यक 4️⃣ पाठ-संख्या सामान्य साधना: 1 पाठ प्रतिदिन विशेष कार्य / बाधा निवारण: 3 / 5 / 7 पाठ नवरात्रि में: प्रतिदिन 1 या 3 पाठ 5️⃣ जप-भाव “रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि” — इस पंक्ति को पूर्ण श्रद्धा से पढ़ें क्रोध या प्रतिशोध-भाव नहीं, बल्कि आन्तरिक व बाह्य बाधाओं के नाश का भाव 6️⃣ संकल्प (संक्षेप) मम सर्व-दुःख-निवारणार्थं, शत्रु-बाधा-शमनार्थं, श्री चण्डिका-प्रीत्यर्थं अर्गला स्तोत्र पाठं करिष्ये

लाभ एवं महत्व

अर्गला स्तोत्र के लाभ (Labh) 🔱 आध्यात्मिक लाभ देवी की शीघ्र कृपा साधना में तेज और स्थिरता भय, संशय, नकारात्मकता का नाश 🔱 मानसिक एवं पारिवारिक लाभ मानसिक अशांति, तनाव में कमी गृह-कलह, दाम्पत्य बाधाओं में शमन आत्मविश्वास और साहस की वृद्धि 🔱 भौतिक लाभ विजय (मुकदमे, प्रतिस्पर्धा, परीक्षा) यश और प्रतिष्ठा धन, ऐश्वर्य और सौभाग्य में वृद्धि 🔱 शत्रु-बाधा निवारण प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष शत्रुओं से रक्षा ईर्ष्या, षड्यंत्र, तांत्रिक-बाधा से संरक्षण “द्विषो जहि” का अर्थ — दोषों, बाधाओं और अधर्म का नाश 🔱 रोग-निवारण दीर्घकालिक रोगों में मानसिक-आध्यात्मिक बल भय, अवसाद, अनिद्रा में विशेष सहायक विशेष टिप्पणी (महत्वपूर्ण) यह स्तोत्र हिंसा की भावना नहीं, बल्कि धर्म-संरक्षण और आत्म-रक्षा का मंत्र है श्रद्धा + नियम = फल दिखावा या अहंकार = फल में बाधा