॥ श्रीशुक्लयजुर्वेदीय श्रीरुद्राष्टाध्यायी — अष्टमोऽध्यायः (चमकप्रश्न) ॥ ✧ सम्पूर्ण पद-विच्छेद ✧ मन्त्र १ वाजः-च-मे-प्रसवः-च-मे-प्रयतिः-च-मे-प्रसितिः-च-मे-धीतिः-च-मे-क्रतुः-च-मे-स्वरः-च-मे-श्लोकः-च-मे-श्रवः-च-मे-श्रुतिः-च-मे-ज्योतिः-च-मे-स्वः-च-मे-यज्ञेन-कल्पन्ताम् ॥ मन्त्र २ प्राणः-च-मे-अपानः-च-मे-व्यानः-च-मे-असुः-च-मे-चित्तम्-च-मे-आधीतम्-च-मे-वाक्-च-मे-मनः-च-मे-चक्षुः-च-मे-श्रोत्रम्-च-मे-दक्षः-च-मे-बलम्-च-मे-यज्ञेन-कल्पन्ताम् ॥ मन्त्र ३ ओजः-च-मे-सहः-च-मे-आत्मा-च-मे-तनूः-च-मे-शर्म-च-मे-वर्म-च-मे-अङ्गानि-च-मे-अस्थीनि-च-मे-परूषि-च-मे-शरीराणि-च-मे-आयुः-च-मे-जरा-च-मे-यज्ञेन-कल्पन्ताम् ॥ मन्त्र ४ ज्यैष्ठ्यम्-च-मे-आधिपत्यम्-च-मे-मन्युः-च-मे-भामः-च-मे-अमः-च-मे-अम्भः-च-मे-जेमा-च-मे-महिमा-च-मे-वरिमा-च-मे-प्रथिमा-च-मे-वर्षिमा-च-मे-द्राघिमा-च-मे-वृद्धम्-च-मे-वृद्धिः-च-मे-यज्ञेन-कल्पन्ताम् ॥ मन्त्र ५ सत्यम्-च-मे-श्रद्धा-च-मे-जगत्-च-मे-धनम्-च-मे-विश्वम्-च-मे-महः-च-मे-क्रीडा-च-मे-मोदः-च-मे-जातम्-च-मे-जनिष्यमाणम्-च-मे-सूक्तम्-च-मे-सुकृतम्-च-मे-यज्ञेन-कल्पन्ताम् ॥ मन्त्र ६ ऋतम्-च-मे-अमृतम्-च-मे-अयक्ष्मम्-च-मे-अनामयम्-च-मे-जीवातुः-च-मे-दीर्घायुत्वम्-च-मे-अनमित्रम्-च-मे-अभयम्-च-मे-सुखम्-च-मे-शयनम्-च-मे-सूषाः-च-मे-सुदिनम्-च-मे-यज्ञेन-कल्पन्ताम् ॥ मन्त्र ७ यन्ता-च-मे-धर्ता-च-मे-क्षेमः-च-मे-धृतिः-च-मे-विश्वम्-च-मे-महः-च-मे-संवित्-च-मे-ज्ञात्रम्-च-मे-सूः-च-मे-प्रसूः-च-मे-सीरम्-च-मे-लयः-च-मे-यज्ञेन-कल्पन्ताम् ॥ मन्त्र ८ शम्-च-मे-मयः-च-मे-प्रियम्-च-मे-अनुकामः-च-मे-कामः-च-मे-सौमनसः-च-मे-भगः-च-मे-द्रविणम्-च-मे-भद्रम्-च-मे-श्रेयः-च-मे-वसीयः-च-मे-यशः-च-मे-यज्ञेन-कल्पन्ताम् ॥ मन्त्र ९ ऊर्क्-च-मे-सूनृता-च-मे-पयः-च-मे-रसः-च-मे-घृतम्-च-मे-मधु-च-मे-सग्धिः-च-मे-सपीतिः-च-मे-कृषिः-च-मे-वृष्टिः-च-मे-जैत्रम्-च-मे-औद्भिद्यम्-च-मे-यज्ञेन-कल्पन्ताम् ॥ मन्त्र १० रयिः-च-मे-रायः-च-मे-पुष्टम्-च-मे-पुष्टिः-च-मे-विभु-च-मे-प्रभु-च-मे-पूर्णम्-च-मे-पूर्णतरम्-च-मे-कुयवम्-च-मे-अक्षितम्-च-मे-अन्नम्-च-मे-अक्षुत्-च-मे-यज्ञेन-कल्पन्ताम् ॥ मन्त्र ११ वित्तम्-च-मे-वेद्यम्-च-मे-भूतम्-च-मे-भविष्यत्-च-मे-सुगम्-च-मे-सुपथ्यम्-च-मे-ऋद्धम्-च-मे-ऋद्धिः-च-मे-क्लृप्तम्-च-मे-क्लृप्तिः-च-मे-मतिः-च-मे-सुमतिः-च-मे-यज्ञेन-कल्पन्ताम् ॥ मन्त्र १२ व्रीहयः-च-मे-यवाः-च-मे-माषाः-च-मे-तिलाः-च-मे-मुद्राः-च-मे-खल्वाः-च-मे-प्रियङ्गवः-च-मे-अणवः-च-मे-श्यामाकाः-च-मे-नीवाराः-च-मे-गोधूमाः-च-मे-मसूराः-च-मे-यज्ञेन-कल्पन्ताम् ॥ मन्त्र १३ अश्मा-च-मे-मृत्तिका-च-मे-गिरयः-च-मे-पर्वताः-च-मे-सिकताः-च-मे-वनस्पतयः-च-मे-हिरण्यम्-च-मे-अयः-च-मे-श्यामम्-च-मे-लोहम्-च-मे-सीसम्-च-मे-त्रपु-च-मे-यज्ञेन-कल्पन्ताम् ॥ मन्त्र १४ अग्निः-च-मे-आपः-च-मे-वीरुधः-च-मे-ओषधयः-च-मे-कृष्टपच्याः-च-मे-अकृष्टपच्याः-च-मे-ग्राम्याः-च-मे-पशवः-आरण्याः-च-मे-वित्तम्-च-मे-वित्तिः-च-मे-भूतम्-च-मे-भूतिः-च-मे-यज्ञेन-कल्पन्ताम् ॥ मन्त्र १५ वसु-च-मे-वसतिः-च-मे-कर्म-च-मे-शक्तिः-च-मे-अर्थः-च-मे-एमः-च-मे-इत्या-च-मे-गतिः-च-मे-यज्ञेन-कल्पन्ताम् ॥ मन्त्र १६ अग्निः-च-मे-इन्द्रः-च-मे- सोमः-च-मे-इन्द्रः-च-मे-सविता-च-मे-इन्द्रः-च-मे-सरस्वती-च-मे-इन्द्रः-च-मे-पूषा-च-मे-इन्द्रः-च-मे-बृहस्पतिः-च-मे-इन्द्रः-च-मे-यज्ञेन-कल्पन्ताम् ॥ मन्त्र १७ मित्रः-च-मे-इन्द्रः-च-मे-वरुणः-च-मे-इन्द्रः-च-मे-धाता-च-मे-इन्द्रः-च-मे-त्वष्टा-च-मे-इन्द्रः-च-मे-मरुतः-च-मे-इन्द्रः-च-मे-विश्वे-च-मे-देवाः-इन्द्रः-च-मे-यज्ञेन-कल्पन्ताम् ॥ मन्त्र १८ पृथिवी-च-मे-इन्द्रः-च-मे-अन्तरिक्षम्-च-मे-इन्द्रः-च-मे-द्यौः-च-मे-इन्द्रः-च-मे-समाः-च-मे-इन्द्रः-च-मे-नक्षत्राणि-च-मे-इन्द्रः-च-मे-दिशः-च-मे-इन्द्रः-च-मे-यज्ञेन-कल्पन्ताम् ॥ मन्त्र १९ अशुः-च-मे-रश्मिः-च-मे-अदाभ्यः-च-मे-अधिपतिः-च-मे-उपांशुः-च-मे-अन्तर्यामः-च-मे-ऐन्द्रवायवः-च-मे-मैत्रावरुणः-च-मे-आश्विनः-च-मे-प्रतिप्रस्थानः-च-मे-शुक्रः-च-मे-मन्थी-च-मे-यज्ञेन-कल्पन्ताम् ॥ मन्त्र २० आग्रयाणः-च-मे-वैश्वदेवः-च-मे-ध्रुवः-च-मे-वैश्वानरः-च-मे-ऐन्द्राग्नः-च-मे-महावैश्वदेवः-च-मे-मरुत्वतीयाः-च-मे-निष्केवल्यः-च-मे-सावित्रः-च-मे-सारस्वतः-च-मे-पात्नीवत्-च-मे-हारियोजनः-च-मे-यज्ञेन-कल्पन्ताम् ॥ मन्त्र २१ स्रुचः-च-मे-चमसाः-च-मे-वायव्यानि-च-मे-द्रोणकलशः-च-मे-ग्रावाणः-च-मे-अधिषवणे-च-मे-पूतभृत्-च-मे-आधवनीयः-च-मे-वेदिः-च-मे-बर्हिः-च-मे-अवभृथः-च-मे-स्वगाकारः-च-मे-यज्ञेन-कल्पन्ताम् ॥ मन्त्र २२ अग्निः-च-मे-घर्मः-च-मे-अर्कः-च-मे-सूर्यः-च-मे-प्राणः-च-मे-अश्वमेधः-च-मे-पृथिवी-च-मे-अदितिः-च-मे-दितिः-च-मे-द्यौः-च-मे-अङ्गुलयः-च-मे-शक्वरयः-च-मे-दिशः-च-मे-यज्ञेन-कल्पन्ताम् ॥ मन्त्र २३ व्रतम्-च-मे-ऋतवः-च-मे-तपः-च-मे-संवत्सरः-च-मे-अहोरात्रे-च-मे-ऊर्वष्ठीवे-च-मे-बृहद्-च-मे-रथन्तरम्-च-मे-यज्ञेन-कल्पन्ताम् ॥ मन्त्र २४ एका-च-मे-तिस्रः-च-मे-पञ्च-च-मे-सप्त-च-मे-नव-च-मे-एकादश-च-मे-त्रयोदश-च-मे-पञ्चदश-च-मे-सप्तदश-च-मे-नवदश-च-मे-एकविंशतिः-च-मे-त्रयोविंशतिः-च-मे-पञ्चविंशतिः-च-मे-सप्तविंशतिः-च-मे-नवविंशतिः-च-मे-एकत्रिंशत्-च-मे-त्रयस्त्रिंशत्-च-मे-यज्ञेन-कल्पन्ताम् ॥ मन्त्र २५ चतस्रः-च-मे-अष्टौ-च-मे-द्वादश-च-मे-षोडश-च-मे-विंशतिः-च-मे-चतुर्विंशतिः-च-मे-अष्टाविंशतिः-च-मे-द्वात्रिंशत्-च-मे-षट्त्रिंशत्-च-मे-चत्वारिंशत्-च-मे-चतुश्चत्वारिंशत्-च-मे-अष्टाचत्वारिंशत्-च-मे-यज्ञेन-कल्पन्ताम् ॥ मन्त्र २६ त्र्यविः-च-मे-त्र्यवी-च-मे-दित्यवाट्-च-मे-दित्यौही-च-मे-पञ्चाविः-च-मे-पञ्चावी-च-मे-त्रिवत्सः-च-मे-त्रिवत्सा-च-मे-तुर्यवाट्-च-मे-तुर्यौही-च-मे-यज्ञेन-कल्पन्ताम् ॥ मन्त्र २७ पष्ठवाट्-च-मे-पष्ठौही-च-मे-उक्षा-च-मे-वशा-च-मे-ऋषभः-च-मे-वेहः-च-मे-अनड्वान्-च-मे-धेनुः-च-मे-यज्ञेन-कल्पन्ताम् ॥ मन्त्र २८ वाजाय-स्वाहा-प्रसवाय-स्वाहा-अपिजाय-स्वाहा-क्रतवे-स्वाहा-वसवे-स्वाहा-अहर्पतये-स्वाहा-अह्ने-स्वाहा-मुग्धाय-स्वाहा-मुग्धाय-वैनशिनाय-स्वाहा-विनशिने-आन्त्यायनाय-स्वाहा-अन्त्याय-भौवनाय-स्वाहा-भुवनस्य-पतये-स्वाहा-अधिपतये-स्वाहा-प्रजापतये-स्वाहा-इयम्-ते-राट्-मित्राय-यन्ता-असि-यमनः-ऊर्जे-त्वा-वृष्ट्यै-त्वा-प्रजानाम्-त्वा-अधिपत्याय ॥ मन्त्र २९ आयुः-यज्ञेन-कल्पताम्-प्राणः-यज्ञेन-कल्पताम्-चक्षुः-यज्ञेन-कल्पताम्-श्रोत्रम्-यज्ञेन-कल्पताम्-वाक्-यज्ञेन-कल्पताम्-मनः-यज्ञेन-कल्पताम्-आत्मा-यज्ञेन-कल्पताम्-ब्रह्म-यज्ञेन-कल्पताम्-ज्योतिः-यज्ञेन-कल्पताम्-स्वः-यज्ञेन-कल्पताम्-पृष्ठम्-यज्ञेन-कल्पताम्-यज्ञः-यज्ञेन-कल्पताम्-स्तोमः-च-यजुः-च-ऋक्-च-साम-च-बृहद्-च-रथन्तरम्-च-स्वः-देवाः-अगन्म-अमृताः-अभूम-प्रजापतेः-प्रजाः-अभूम-वेट्-स्वाहा ॥ इति: चमकप्रश्नः नामरुद्रीऽष्टमोऽध्यायः ॥ ८॥...