॥श्रीरुद्राष्टाध्यायी षष्ठोऽध्यायः ॥

॥ श्रीशुक्लयजुर्वेदीय श्रीरुद्राष्टाध्यायी षष्ठोऽध्यायः ॥

मन्त्र १
वयम् । सोम । व्रते । तव । मनः । तनूषु । बिभ्रतः ।
प्रजावन्तः । सचेमहि ॥

मन्त्र २
एषः । ते । रुद्र । भागः । सह । स्वस्रा । अम्बिकया । तम् ।
जुषस्व । स्वाहा । एषः । ते । रुद्र । भागः । आखुः । ते । पशुः ॥

मन्त्र ३
अव । रुद्रम् । अदीमहि । अव । देवम् । त्र्यम्बकम् ।
यथा । नः । वस्यसः । करत् । यथा । नः । श्रेयसः । करत् ।
यथा । नः । व्यवसाययात् ॥

मन्त्र ४
भेषजम् । असि । भेषजम् । गवे । अश्वाय । पुरुषाय । भेषजम् ।
सुखम् । मेषाय । मेष्यै ॥

मन्त्र ५
त्र्यम्बकम् । यजामहे । सुगन्धिम् । पुष्टिवर्धनम् ।
उर्वारुकम् । इव । बन्धनात् । मृत्योः । मुक्षीय । मा । अमृतात् ।
त्र्यम्बकम् । यजामहे । सुगन्धिम् । पतिवेदनम् ।
उर्वारुकम् । इव । बन्धनात् । इतः । मुक्षीय । मा । अमुतः ॥

मन्त्र ६
एतत् । ते । रुद्र । आवसम् । तेन । परः । मूजवतः । अतीहि ।
अवतत-धन्वा । पिनाक-आवसः । कृत्तिवासाः । अहिंसन् । नः । शिवः । अतीहि ॥

मन्त्र ७
त्रि-आयुषम् । जमदग्नेः । कश्यपस्य । त्रि-आयुषम् ।
यत् । देवेषु । त्रि-आयुषम् । तत् । नः । अस्तु । त्रि-आयुषम् ॥

मन्त्र ८
शिवः । नाम । असि । स्वधितिः । ते । पिता । नमः । ते । अस्तु । मा । मा । हिंसीः ।
निवर्तयामि । आयुषे । अन्नाद्याय । प्रजननाय । रायः-पोषाय ।
सु-प्रजास्त्वाय । सु-वीर्याय ॥

इति: महच्छिर / सोमस्तवन / त्र्यम्बक यजनम् नामरुद्री षष्ठोऽध्यायः ॥

भावार्थ

॥ श्रीशुक्लयजुर्वेदीय श्रीरुद्राष्टाध्यायी — षष्ठोऽध्यायः ॥

🔱 श्लोकवार भावार्थ 🔱

मन्त्र १
हम लोग, हे सोमदेव! आपके व्रत में स्थित होकर, आपके मन को अपनी देहों में धारण करते हुए, संतानों से सम्पन्न होकर आपके साथ संगति करें — ऐसा हमारा संकल्प है।
मन्त्र २
हे रुद्र! यह आपका भाग है, जो आपकी भगिनी अम्बिका के साथ है — आप इसे स्वीकार करें। स्वाहा। यह आपका अंश है; यह मूषक (या यज्ञ का प्रतीक पशु) आपका पशु है — इसे भी स्वीकार करें।
मन्त्र ३
हम रुद्र देव, त्र्यम्बक भगवान की स्तुति करते हैं। वे हमें ऐश्वर्य प्रदान करें, कल्याण प्रदान करें और हमारे कर्मों को सफल बनाएं — ऐसा हमारा निवेदन है।
मन्त्र ४
आप औषधि स्वरूप हैं। गौ के लिए, अश्व के लिए और मनुष्य के लिए आप औषधि हैं। मेष (भेड़) और मेषी (भेड़नी) के लिए भी आप सुखदायक औषधि हैं।
मन्त्र ५
हम त्र्यम्बक (तीन नेत्रों वाले शिव) की उपासना करते हैं, जो सुगन्धित हैं और पुष्टि को बढ़ाने वाले हैं। जैसे पक चुका खरबूजा डंठल से सहज छूट जाता है, वैसे ही हम मृत्यु के बन्धन से मुक्त हों, पर अमृतत्व से वंचित न हों।
(द्वितीय भाग:)
हम उसी त्र्यम्बक भगवान की उपासना करते हैं, जो जीवन-संरक्षक और पालनकर्ता हैं। जैसे फल डंठल से अलग होता है, वैसे ही हम यहाँ और परलोक दोनों स्थानों में बन्धनों से मुक्त हों।
मन्त्र ६
हे रुद्र! यह आपका आश्रय है — इससे आगे मूजवन्त पर्वत की ओर जाइए। हे धनुषधारी, पिनाकधारी, कृत्तिवासा (व्याघ्रचर्मधारी) प्रभु! हमें हिंसा न करते हुए, शिवस्वरूप होकर आगे बढ़ें।
मन्त्र ७
जमदग्नि और कश्यप का जो त्रिगुणित आयुष्य है, तथा देवताओं में जो त्रिविध आयुष्य है — वही त्रिविध आयु हमें भी प्राप्त हो।
मन्त्र ८
हे रुद्रदेव! आपका नाम शिव है — आप कल्याणकारी हैं।
आपके अस्त्र के भी आप ही स्वामी हैं।
आपको नमस्कार है, मुझे कष्ट न दें।
मैं आपकी उग्र शक्ति को शांत करता हूँ, ताकि —
मेरी आयु बढ़े,
अन्न और भोग की प्राप्ति हो,
संतान की वृद्धि हो,
धन और पोषण प्राप्त हो,
उत्तम संतान और श्रेष्ठ बल-वीर्य प्राप्त हो।
🔱 षष्ठोऽध्यायः — श्लोकवार भावार्थ पूर्ण।