🔹 भावार्थ (श्लोक संख्या सहित)
श्लोक 1
यह संसार एक उल्टे पीपल वृक्ष के समान है, जिसका मूल ऊपर (परमात्मा) में है और शाखाएँ नीचे फैली हैं। जो इस रहस्य को जानता है, वही वेदों का वास्तविक ज्ञाता है।
श्लोक 2
इस संसार-वृक्ष की शाखाएँ ऊपर और नीचे तीन गुणों से बढ़ती हैं और विषय-भोग इसकी कोपलें हैं। इसके मूल कर्मों के कारण मनुष्य लोक में फैलते रहते हैं।
श्लोक 3
इस वृक्ष का वास्तविक स्वरूप यहाँ स्पष्ट नहीं दिखता — इसका आदि, अंत और आधार समझ में नहीं आता। इस दृढ़ मूल वाले संसार-वृक्ष को वैराग्य रूपी शस्त्र से काटना चाहिए।
श्लोक 4
इसके बाद उस परम पद की खोज करनी चाहिए जहाँ पहुँचकर जीव फिर लौटकर नहीं आता। वही आदि पुरुष है जिससे यह संसार की पुरानी प्रवृत्ति चली है।
श्लोक 5
जो अहंकार और मोह से रहित हैं, आसक्ति को जीत चुके हैं, आत्मचिंतन में स्थित हैं और सुख-दुःख से ऊपर उठ चुके हैं — वे उस अविनाशी पद को प्राप्त करते हैं।
श्लोक 6
जिस परम धाम को सूर्य, चन्द्र या अग्नि प्रकाशित नहीं करते, जहाँ जाकर जीव लौटकर नहीं आता — वही मेरा परम धाम है।
श्लोक 7
यह जीव मेरा ही सनातन अंश है, जो मन और इन्द्रियों के साथ प्रकृति में संघर्ष करता रहता है।
श्लोक 8
जैसे वायु सुगंध को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाती है, वैसे ही जीव शरीर छोड़ते समय इन्द्रियों और मन को साथ ले जाता है।
श्लोक 9
जीव मन और इन्द्रियों के माध्यम से विषयों का अनुभव करता है।
श्लोक 10
अज्ञानी लोग जीव के शरीर में प्रवेश, निवास या त्याग को नहीं देख पाते, परंतु ज्ञान-दृष्टि वाले इसे समझ लेते हैं।
श्लोक 11
योगी प्रयास करके आत्मा को अपने भीतर देखते हैं, परंतु अशुद्ध अंतःकरण वाले प्रयास करने पर भी नहीं देख पाते।
श्लोक 12
सूर्य, चन्द्र और अग्नि का जो प्रकाश संसार को प्रकाशित करता है, वह मेरा ही तेज है।
श्लोक 13
मैं पृथ्वी में प्रवेश कर सब प्राणियों को धारण करता हूँ और चन्द्रमा बनकर औषधियों को पुष्ट करता हूँ।
श्लोक 14
मैं ही प्राणियों के शरीर में वैश्वानर अग्नि बनकर चार प्रकार के अन्न को पचाता हूँ।
श्लोक 15
मैं सबके हृदय में स्थित हूँ। स्मृति, ज्ञान और विस्मरण मुझसे ही होते हैं। वेदों द्वारा मैं ही जानने योग्य हूँ।
श्लोक 16
इस संसार में दो प्रकार के पुरुष हैं — क्षर (नश्वर) और अक्षर (अविनाशी आत्मा)।
श्लोक 17
इन दोनों से परे एक उत्तम पुरुष है, जिसे परमात्मा कहा जाता है, जो तीनों लोकों में प्रवेश कर सबका पालन करता है।
श्लोक 18
मैं क्षर और अक्षर दोनों से श्रेष्ठ हूँ, इसलिए वेद और संसार में पुरुषोत्तम कहलाता हूँ।
श्लोक 19
जो मुझे पुरुषोत्तम रूप में जान लेता है, वह सब कुछ जानने वाला होकर सम्पूर्ण भाव से मेरी भक्ति करता है।
श्लोक 20
यह अत्यंत गोपनीय शास्त्र मैंने कहा है। इसे जानकर मनुष्य बुद्धिमान और कृतार्थ हो जाता है।
🔹 सार (अध्याय का निष्कर्ष) पंद्रहवाँ अध्याय संसार को एक उल्टे वृक्ष के रूप में समझाता है, जिसका मूल परमात्मा में है। मनुष्य कर्म और आसक्ति के कारण इस वृक्ष में बंधा रहता है। वैराग्य, ज्ञान और भक्ति के द्वारा इस संसार बंधन को काटकर परम पद प्राप्त किया जा सकता है। भगवान बताते हैं कि जीव उनका ही अंश है और वही परम पुरुष — पुरुषोत्तम — सबका आधार और अंतिम लक्ष्य है।