📖 अष्टम अध्याय — अक्षरपरब्रह्मयोग
🔹 श्लोकवार सरल भावार्थ
🔹 श्लोक 1
अर्जुन पूछते हैं — हे पुरुषोत्तम! ब्रह्म क्या है? अध्यात्म क्या है? कर्म क्या है? अधिभूत और अधिदैव किसे कहते हैं?
🔹 श्लोक 2
हे मधुसूदन! इस शरीर में अधियज्ञ कौन है और मृत्यु के समय संयमी लोग आपको कैसे जानते हैं?
🔹 श्लोक 3
भगवान कहते हैं — परम अक्षर तत्त्व ब्रह्म है। जीव का स्वभाव अध्यात्म है और प्राणियों की उत्पत्ति का कारण जो त्याग या सृष्टि-क्रिया है, वही कर्म कहलाता है।
🔹 श्लोक 4
नश्वर जगत अधिभूत है, पुरुष (हिरण्यगर्भ) अधिदैव है, और हे अर्जुन! इस शरीर में अधियज्ञ मैं स्वयं हूँ।
🔹 श्लोक 5
जो मनुष्य अंत समय में मुझे स्मरण करते हुए शरीर त्यागता है, वह मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है — इसमें कोई संदेह नहीं।
🔹 श्लोक 6
मनुष्य अंत समय में जिस भाव का स्मरण करता है, उसी को प्राप्त होता है, क्योंकि वह जीवन भर उसी भाव में स्थित रहता है।
🔹 श्लोक 7
इसलिए हर समय मेरा स्मरण करते हुए अपना कर्तव्य (युद्ध) करो। मन और बुद्धि मुझे अर्पित करने से तुम मुझे ही प्राप्त करोगे।
🔹 श्लोक 8
अभ्यासयोग से युक्त और अन्य विषयों में न जाने वाला मनुष्य परम दिव्य पुरुष को प्राप्त होता है।
🔹 श्लोक 9
जो सर्वज्ञ, सनातन, सबका नियंता, सूक्ष्म से भी सूक्ष्म, सबका धारणकर्ता, अचिंत्य रूप और सूर्य के समान प्रकाशमान है — उसका स्मरण करना चाहिए।
🔹 श्लोक 10
जो व्यक्ति मृत्यु के समय अचल मन से, भक्ति और योगबल से भ्रूमध्य में प्राण स्थापित करके परम पुरुष का स्मरण करता है, वह उसे प्राप्त होता है।
🔹 श्लोक 11
जिस अक्षर ब्रह्म को वेदज्ञ लोग कहते हैं और जिसे पाने के लिए विरक्त योगी ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं, उस पद को मैं संक्षेप में बताता हूँ।
🔹 श्लोक 12
सभी इन्द्रियों को रोककर, मन को हृदय में स्थिर करके और प्राण को सिर में स्थापित कर योगधारणा करनी चाहिए।
🔹 श्लोक 13
जो “ॐ” का उच्चारण करते हुए मेरा स्मरण कर शरीर त्यागता है, वह परम गति को प्राप्त होता है।
🔹 श्लोक 14
जो योगी निरंतर अनन्य भाव से मेरा स्मरण करता है, उसके लिए मैं सहज उपलब्ध हूँ।
🔹 श्लोक 15
मुझे प्राप्त होकर महात्मा इस दुःखमय और नश्वर संसार में पुनर्जन्म नहीं लेते।
🔹 श्लोक 16
ब्रह्मलोक तक सभी लोक पुनर्जन्म के अधीन हैं, पर मुझे प्राप्त होने पर पुनर्जन्म नहीं होता।
🔹 श्लोक 17
जो लोग ब्रह्मा का एक दिन हजार युगों के बराबर जानते हैं, वे ब्रह्मा के दिन और रात का तत्त्व जानते हैं।
🔹 श्लोक 18
ब्रह्मा के दिन में सब प्राणी प्रकट होते हैं और रात में पुनः अव्यक्त में लीन हो जाते हैं।
🔹 श्लोक 19
यह जीवसमूह बार-बार उत्पन्न होकर रात में लीन हो जाता है और दिन में फिर प्रकट होता है।
🔹 श्लोक 20
इस अव्यक्त से भी परे एक सनातन तत्त्व है, जो सबके नष्ट होने पर भी नष्ट नहीं होता।
🔹 श्लोक 21
उसी अव्यक्त अक्षर को परम गति कहा गया है। उसे प्राप्त करके जीव फिर संसार में नहीं लौटता।
🔹 श्लोक 22
वह परम पुरुष अनन्य भक्ति से प्राप्त होता है, जिसमें यह समस्त जगत स्थित है।
🔹 श्लोक 23
अब मैं वह समय बताता हूँ, जिसमें शरीर त्यागने वाले योगी पुनर्जन्म लेते हैं या नहीं लेते।
🔹 श्लोक 24
अग्नि, प्रकाश, दिन, शुक्ल पक्ष और उत्तरायण मार्ग से जाने वाले ब्रह्मज्ञानी ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।
🔹 श्लोक 25
धूम, रात्रि, कृष्ण पक्ष और दक्षिणायन मार्ग से जाने वाले योगी चंद्रलोक को प्राप्त होकर पुनः लौटते हैं।
🔹 श्लोक 26
ये दोनों मार्ग शाश्वत हैं — एक से मुक्ति मिलती है, दूसरे से पुनर्जन्म।
🔹 श्लोक 27
इन मार्गों को जानने वाला योगी मोह में नहीं पड़ता, इसलिए हर समय योगयुक्त रहना चाहिए।
🔹 श्लोक 28
वेद, यज्ञ, तप और दान से मिलने वाले सभी पुण्यफल से ऊपर उठकर योगी परम स्थान को प्राप्त होता है।
अध्याय का सार (10 मुख्य सूत्र) 1️⃣ ब्रह्म परम और अविनाशी तत्त्व है, जो सबका आधार है। 2️⃣ मनुष्य मृत्यु समय जिस भाव का स्मरण करता है, उसी को प्राप्त होता है। 3️⃣ इसलिए जीवनभर भगवान का स्मरण और कर्तव्य कर्म साथ-साथ करना चाहिए। 4️⃣ अभ्यासयोग और एकाग्र मन से परम पुरुष की प्राप्ति होती है। 5️⃣ “ॐ” का स्मरण और भगवान का चिंतन परम गति का मार्ग है। 6️⃣ भगवान को प्राप्त करने पर पुनर्जन्म नहीं होता। 7️⃣ सम्पूर्ण सृष्टि उत्पत्ति और प्रलय के चक्र में चलती रहती है। 8️⃣ अव्यक्त से भी परे एक सनातन परम तत्त्व है — वही परम धाम है। 9️⃣ दो मार्ग बताए गए हैं — एक मुक्ति का, दूसरा पुनर्जन्म का। 🔟 योगी वेद, यज्ञ, तप और दान के फलों से ऊपर उठकर परम स्थिति को प्राप्त करता है।