।। द्वितीयोऽध्यायः।।
📖 द्वितीयोऽध्यायः
( पदविच्छेदः)
सूतः उवाच :
अथ अन्यत् सम्प्रवक्ष्यामि शृणुध्वम् मुनि-सत्तमाः ।
पुरा काशी-पुरे रम्ये हि आसीत् विप्रः अति-निर्धनः ॥
क्षुत्-तृड्भ्याम् व्याकुलः भूत्वा नित्यम् बभ्राम भूतले ।
दुःखितम् ब्राह्मणम् दृष्ट्वा भगवान् ब्राह्मण-प्रियः ॥
वृद्ध-ब्राह्मण-रूपेण तम् पप्रच्छ द्विजम् आदरात् ।
किम् अर्थम् भ्रमसे विप्र महीम् नित्यम् सुदुःखितः ॥
तत् सर्वम् श्रोतुम् इच्छामि कथ्यताम् द्विज-सत्तम ॥
ब्राह्मणः उवाच ।
ब्राह्मणः अति-दरिद्रः अहम् भिक्षा-अर्थम् वै भ्रमामि अहम् ॥
उपायम् यदि जानासि कृपया कथय प्रभो ॥
वृद्ध-ब्राह्मणः उवाच ।
सत्य-नारायणः विष्णुः वाञ्छित-अर्थ-फल-प्रदः ॥
तस्य त्वम् पूजनम् विप्र कुरुष्व व्रतम् उत्तमम् ।
यत् कृत्वा सर्व-दुःखेभ्यः मुक्तः भवति मानवः ॥
विधानम् च व्रतस्य अपि विप्राय अभाष्य यत्नतः ।
सत्य-नारायणः वृद्धः तत्र एव अन्तरधीयत ॥
तत् वाक्यम् मनसा धृत्वा ब्राह्मणः नृप-सत्तम ।
रात्रौ निद्राम् न लब्ध्वा सः प्रातः स्नात्वा यथा-विधि ॥
सत्य-नारायण-व्रतम् करिष्ये इति निश्चितः ।
भिक्षा-अर्थम् सः जगाम अथ द्विजः हृष्ट-मनाः सुधीः ॥
तस्मिन् एव दिने विप्रः प्रचुरम् द्रव्यम् आप्तवान् ।
बन्धुभिः स्व-जनैः सार्धम् व्रतम् तेन समाचरन् ॥
सर्व-दुःख-विनिर्मुक्तः सर्व-सम्पत्-समन्वितः ।
बभूव द्विज-शार्दूलः व्रतस्य अस्य प्रभावतः ॥
ततः प्रभृति कालम् च मासि मासि व्रतम् कृतम् ।
सत्य-नारायण-देवस्य प्रीति-अर्थम् द्विज-सत्तमः ॥
सर्व-पाप-विनिर्मुक्तः दुर्लभम् मोक्षम् आप्तवान् ।
व्रतस्य अस्य प्रभावेन सत्य-देव-प्रसादतः ॥
एवम् नारायणेन उक्तम् नारदाय महात्मने ।
मया तु कथितम् विप्राः किम् अन्यत् श्रोतुम् इच्छथ ॥
ऋषयः ऊचुः ।
श्रुतम् द्विजस्य चरितम् अद्भुतम् पाप-नाशनम् ।
अन्यत् अपि अस्य माहात्म्यम् कथयस्व महा-मुने ॥
॥ इति द्वितीयोऽध्यायः — पदविच्छेदः ॥भावार्थ
📖 द्वितीय अध्याय — श्लोकानुसार विस्तृत भावार्थ
श्लोक 1
सूतजी बोले — अब मैं एक और पवित्र कथा सुनाता हूँ, ध्यानपूर्वक सुनिए।
श्लोक 2
काशी नगर में एक अत्यंत निर्धन ब्राह्मण रहता था।
श्लोक 3
वह भूख और प्यास से व्याकुल होकर पृथ्वी पर इधर-उधर भिक्षा के लिए भटकता रहता था।
श्लोक 4
भगवान, जो ब्राह्मणों के प्रिय हैं, उस दुःखी ब्राह्मण को देखकर दयालु हुए।
श्लोक 5
वे वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण करके उसके पास गए और उससे पूछने लगे।
श्लोक 6
उन्होंने कहा — हे विप्र! तुम इतने दुःखी होकर क्यों भटक रहे हो?
श्लोक 7
ब्राह्मण ने उत्तर दिया — मैं अत्यंत गरीब हूँ, भिक्षा के लिए भटकता हूँ।
श्लोक 8
यदि आप कोई उपाय जानते हों तो कृपा करके बताइए।
श्लोक 9
वृद्ध ब्राह्मण (भगवान) ने कहा — सत्यनारायण भगवान वांछित फल देने वाले हैं।
श्लोक 10
तुम उनका व्रत करो; इससे मनुष्य सभी दुःखों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 11
ऐसा कहकर भगवान ने उसे व्रत की विधि समझाई।
श्लोक 12
फिर वे वहीं से अदृश्य हो गए।
श्लोक 13
ब्राह्मण ने उस वचन को मन में धारण किया और निश्चय किया कि वह व्रत करेगा।
श्लोक 14
अगले दिन वह भिक्षा के लिए गया।
श्लोक 15
उस दिन उसे पहले से अधिक धन प्राप्त हुआ।
श्लोक 16
उसने अपने बंधुओं के साथ मिलकर सत्यनारायण व्रत किया।
श्लोक 17
व्रत के प्रभाव से वह सभी दुःखों से मुक्त होकर सुखी और समृद्ध हो गया।
श्लोक 18
उसने प्रत्येक मास श्रद्धा से यह व्रत करना आरम्भ किया।
श्लोक 19
वह पापों से मुक्त होकर अंत में मोक्ष को प्राप्त हुआ।
श्लोक 20
सूतजी बोले — इस प्रकार सत्यनारायण व्रत का प्रभाव है।