📖 तृतीयोऽध्यायः — कर्मयोगः
🔹 श्लोकानुसार भावार्थ
1. अर्जुन कहते हैं — यदि ज्ञान (बुद्धि) कर्म से श्रेष्ठ है, तो हे कृष्ण! मुझे इस भयानक युद्ध में क्यों लगा रहे हैं?
2. आपके मिले-जुले वचनों से मेरी बुद्धि भ्रमित हो रही है। कृपया निश्चित रूप से एक मार्ग बताइए जिससे मेरा कल्याण हो।
3. भगवान कहते हैं — इस संसार में दो प्रकार की निष्ठाएँ पहले बताई गई हैं — ज्ञानयोग (ज्ञानमार्ग) और कर्मयोग (निष्काम कर्म का मार्ग)।
4. कर्मों को प्रारम्भ न करने से मनुष्य कर्मरहित नहीं होता और केवल संन्यास लेने से सिद्धि प्राप्त नहीं होती।
5. कोई भी व्यक्ति क्षणभर भी बिना कर्म किए नहीं रह सकता, क्योंकि प्रकृति के गुणों से सभी कर्म करने को बाध्य होते हैं।
6. जो बाहर से इन्द्रियों को रोककर मन में विषयों का चिंतन करता है, वह मिथ्याचारी (दिखावटी) कहलाता है।
7. जो मन से इन्द्रियों को वश में करके आसक्ति रहित होकर कर्म करता है, वही श्रेष्ठ है।
8. तू अपना कर्तव्य कर्म कर, क्योंकि कर्म करना अकर्म (कुछ न करने) से श्रेष्ठ है; शरीर की यात्रा भी कर्म बिना नहीं चल सकती।
9. यज्ञ (उच्च उद्देश्य) के लिए किए गए कर्मों को छोड़कर अन्य कर्म बंधन का कारण बनते हैं, इसलिए आसक्ति त्यागकर कर्म कर।
10. सृष्टि के प्रारम्भ में प्रजापति ने यज्ञ सहित प्रजाओं को उत्पन्न कर कहा — इससे तुम उन्नति करोगे और यह तुम्हारी इच्छाओं को पूर्ण करेगा।
11. यज्ञ द्वारा देवताओं को प्रसन्न करो, वे तुम्हें प्रसन्न करेंगे; इस प्रकार परस्पर सहयोग से कल्याण होगा।
12. देवताओं द्वारा दिए गए पदार्थों को बिना अर्पण किए जो स्वयं भोगता है, वह चोर है।
13. यज्ञ से शुद्ध अन्न खाने वाले पापों से मुक्त होते हैं, परन्तु केवल अपने लिए पकाने वाले पाप ही खाते हैं।
14. अन्न से प्राणी उत्पन्न होते हैं, वर्षा से अन्न होता है, यज्ञ से वर्षा होती है और यज्ञ कर्म से उत्पन्न होता है।
15. कर्म ब्रह्म से उत्पन्न है और ब्रह्म अक्षर (परमात्मा) से; इसलिए ब्रह्म सदा यज्ञ में स्थित है।
16. जो इस सृष्टि-चक्र का पालन नहीं करता और इन्द्रियों में ही रमता है, उसका जीवन व्यर्थ है।
17. जो आत्मा में ही आनंद पाता है और आत्मा में ही संतुष्ट है, उसके लिए कोई कर्तव्य शेष नहीं रहता।
18. ऐसे ज्ञानी के लिए न कर्म करने से कोई हानि है और न कर्म करने से कोई लाभ; वह किसी पर आश्रित नहीं रहता।
19. इसलिए आसक्ति रहित होकर निरंतर कर्तव्य कर्म करो; ऐसा करने से मनुष्य परम अवस्था प्राप्त करता है।
20. जनक आदि राजाओं ने कर्म करके ही सिद्धि प्राप्त की; लोक-संग्रह (दूसरों के हित) के लिए भी कर्म करना चाहिए।
21. श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करता है, अन्य लोग भी वैसा ही करते हैं।
22. हे अर्जुन! तीनों लोकों में मेरे लिए कोई कर्तव्य नहीं है, फिर भी मैं कर्म करता हूँ।
23. यदि मैं कर्म न करूँ, तो लोग मेरे मार्ग का अनुसरण करते हुए कर्म करना छोड़ देंगे।
24. तब संसार का नाश हो जाएगा और मैं प्रजाओं के विनाश का कारण बन जाऊँगा।
25. अज्ञानी लोग आसक्ति से कर्म करते हैं; ज्ञानी को बिना आसक्ति के लोककल्याण के लिए कर्म करना चाहिए।
26. ज्ञानी को अज्ञानी लोगों की बुद्धि में भ्रम नहीं उत्पन्न करना चाहिए, बल्कि स्वयं कर्म करते हुए उन्हें प्रेरित करना चाहिए।
27. वास्तव में प्रकृति के गुण ही सभी कर्म करते हैं, परंतु अहंकार से मोहित व्यक्ति स्वयं को कर्ता मानता है।
28. तत्त्व को जानने वाला समझता है कि गुण ही गुणों में प्रवृत्त हैं, इसलिए वह आसक्त नहीं होता।
29. प्रकृति के गुणों से मोहित लोग कर्मों में आसक्त रहते हैं; ज्ञानी को उन्हें विचलित नहीं करना चाहिए।
30. सभी कर्म मुझे अर्पित करके, आशा और ममता छोड़कर, मानसिक व्याकुलता रहित होकर अपना कर्तव्य कर।
31. जो लोग श्रद्धा से मेरे इस मत का पालन करते हैं, वे कर्मबंधन से मुक्त हो जाते हैं।
32. जो दोष-दृष्टि करके इस उपदेश का पालन नहीं करते, वे अज्ञान से नष्ट हो जाते हैं।
33. ज्ञानी भी अपनी प्रकृति के अनुसार ही आचरण करता है; प्रकृति को बलपूर्वक दबाना कठिन है।
34. इन्द्रियों के विषयों में राग और द्वेष स्थित रहते हैं; इनके वश में नहीं होना चाहिए, क्योंकि ये बाधक हैं।
35. अपना धर्म (कर्तव्य) दोषयुक्त भी हो तो श्रेष्ठ है; दूसरे का धर्म भली प्रकार करने पर भी भयावह है।
36. अर्जुन पूछते हैं — मनुष्य इच्छा न होते हुए भी पाप क्यों करता है, मानो किसी बल से प्रेरित हो?
37. भगवान कहते हैं — यह काम और क्रोध है, जो रजोगुण से उत्पन्न होते हैं; यह मनुष्य का महान शत्रु है।
38. जैसे धुएँ से अग्नि, धूल से दर्पण और गर्भ आवरण से ढका रहता है, वैसे ही ज्ञान काम से ढक जाता है।
39. यह कामरूप अग्नि ज्ञान को ढक देता है और ज्ञानियों का भी शत्रु है।
40. इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि — यही काम के निवास स्थान हैं; इनके द्वारा यह ज्ञान को ढककर जीव को मोहित करता है।
41. इसलिए पहले इन्द्रियों को वश में करके इस ज्ञान-विज्ञान को नष्ट करने वाले शत्रु को नष्ट करो।
42. इन्द्रियाँ शरीर से श्रेष्ठ हैं, मन इन्द्रियों से श्रेष्ठ है, बुद्धि मन से श्रेष्ठ है और आत्मा बुद्धि से भी श्रेष्ठ है।
43. इस प्रकार आत्मा को जानकर, बुद्धि से मन को स्थिर कर, इस कठिन कामरूपी शत्रु का नाश करो।...
🔹 अध्याय 3 का सार (10 मुख्य सूत्र) 1️⃣ ज्ञान और कर्म दोनों मार्ग हैं भगवान ने बताया कि दो निष्ठाएँ हैं — ज्ञानयोग (वैराग्य और आत्मचिंतन का मार्ग) कर्मयोग (निष्काम कर्म का मार्ग) पर सामान्य मनुष्य के लिए कर्मयोग अधिक उपयुक्त है। 2️⃣ कर्म से बचकर मुक्ति नहीं मिलती केवल कर्म त्याग देने से या बाहरी संन्यास लेने से सिद्धि नहीं मिलती। प्रकृति के गुण हमें कर्म करने के लिए बाध्य करते हैं। 3️⃣ निष्काम भाव से कर्म ही मुक्ति का साधन है फल की इच्छा छोड़कर कर्तव्य कर्म करने से बंधन नहीं होता। “कर्मण्येवाधिकारस्ते…” का विस्तार यहाँ व्यवहार में समझाया गया है। 4️⃣ यज्ञ भावना का सिद्धांत हर कर्म यदि उच्च उद्देश्य (यज्ञ) के लिए हो, तो वह पवित्र हो जाता है। स्वार्थ के लिए किया गया कर्म बंधन है। 5️⃣ सृष्टि एक सहयोग-चक्र है अन्न → वर्षा → यज्ञ → कर्म → ब्रह्म — इस चक्र का पालन करना ही धर्म है। 6️⃣ श्रेष्ठ पुरुष का आदर्श प्रभाव समाज श्रेष्ठ व्यक्ति का अनुसरण करता है। इसलिए ज्ञानी को भी लोकसंग्रह (समाज के हित) के लिए कर्म करना चाहिए। 7️⃣ कर्ता कौन है? वास्तव में प्रकृति के गुण कर्म करते हैं। अहंकारवश मनुष्य स्वयं को कर्ता मान लेता है — यही अज्ञान है। 8️⃣ स्वधर्म का महत्व अपना कर्तव्य (स्वधर्म) दोषयुक्त हो तो भी श्रेष्ठ है। दूसरे का धर्म अपनाना भयावह है। 9️⃣ पाप का कारण — काम और क्रोध रजोगुण से उत्पन्न काम (अतृप्त इच्छा) ही क्रोध बनकर ज्ञान को ढक देता है। यही मनुष्य का मुख्य शत्रु है। 🔟 आत्मा सर्वोच्च है इन्द्रियाँ < मन < बुद्धि < आत्मा जब बुद्धि से मन को नियंत्रित कर आत्मा में स्थित होते हैं, तब काम रूपी शत्रु पर विजय मिलती है। 🔹 अध्याय 3 का संक्षिप्त संदेश 👉 जीवन से भागो मत — उसे योग बना दो। 👉 कर्म करो, पर आसक्ति मत रखो। 👉 अपने धर्म में स्थिर रहो। 👉 काम और अहंकार से सावधान रहो। 👉 सब कर्म भगवान को अर्पित करो।