।।श्रीमद्भगवद्गीता तृतीयोऽध्यायः।।

।।श्रीमद्भगवद्गीता तृतीयोऽध्यायः।।

📖 अथ तृतीयोऽध्यायः

कर्मयोगः

श्लोक 1
अर्जुन उवाच:
ज्यायसी — चेत् — कर्मणः — ते — मता — बुद्धिः — जनार्दन ।
तत् — किम् — कर्मणि — घोरे — माम् — नियोजयसि — केशव ॥

श्लोक 2
व्यामिश्रेण — इव — वाक्येन — बुद्धिम् — मोहयसि — इव — मे ।
तत् — एकम् — वद — निश्चित्य — येन — श्रेयः — अहम् — आप्नुयाम् ॥

श्लोक 3
श्रीभगवानुवाच:
लोके — अस्मिन् — द्विविधा — निष्ठा — पुरा — प्रोक्ता — मया — अनघ ।
ज्ञानयोगेन — सांख्यानाम् — कर्मयोगेन — योगिनाम् ॥

श्लोक 4
न — कर्मणाम् — अनारम्भात् — नैष्कर्म्यम् — पुरुषः — अश्नुते ।
न — च — संन्यसनात् — एव — सिद्धिम् — समधिगच्छति ॥

श्लोक 5
न — हि — कश्चित् — क्षणम् — अपि — जातु — तिष्ठति — अकर्मकृत् ।
कार्यते — हि — अवशः — कर्म — सर्वः — प्रकृतिजैः — गुणैः ॥

श्लोक 6
कर्मेंद्रियाणि — संयम्य — यः — आस्ते — मनसा — स्मरन् ।
इंद्रियार्थान् — विमूढात्मा — मिथ्याचारः — सः — उच्यते ॥

श्लोक 7
यः — तु — इंद्रियाणि — मनसा — नियम्य — आरभते — अर्जुन ।
कर्मेंद्रियैः — कर्मयोगम् — असक्तः — सः — विशिष्यते ॥

श्लोक 8
नियतं — कुरु — कर्म — त्वम् ।
कर्म — ज्यायः — हि — अकर्मणः ।
शरीरयात्रा — अपि — च — ते — न — प्रसिद्ध्येत् — अकर्मणः ॥

श्लोक 9
यज्ञार्थात् — कर्मणः — अन्यत्र — लोकः — अयम् — कर्मबन्धनः ।
तत् — अर्थम् — कर्म — कौंतेय — मुक्तसंगः — समाचर ॥

श्लोक 10
सह — यज्ञाः — प्रजाः — सृष्ट्वा — पुरा — उवाच — प्रजापतिः ।
अनेन — प्रसविष्यध्वम् — एषः — वः — अस्तु — इष्टकामधुक् ॥

श्लोक 11
देवान् — भावयत — अनेन — ते — देवाः — भावयन्तु — वः ।
परस्परम् — भावयन्तः — श्रेयः — परम् — अवाप्स्यथ ॥
श्लोक 12

इष्टान् — भोगान् — हि — वः — देवाः — दास्यन्ते — यज्ञभाविताः ।
तैः — दत्तान् — अप्रदाय — एभ्यः — यः — भुङ्क्ते — स्तेनः — एव — सः ॥

श्लोक 13
यज्ञशिष्टाशिनः — सन्तः — मुच्यन्ते — सर्वकिल्बिषैः ।
भुञ्जते — ते — तु — अघम् — पापाः — ये — पचन्ति — आत्मकारणात् ॥

श्लोक 14
अन्नात् — भवन्ति — भूतानि ।
पर्जन्यात् — अन्नसम्भवः ।
यज्ञात् — भवति — पर्जन्यः ।
यज्ञः — कर्मसमुद्भवः ॥

श्लोक 15
कर्म — ब्रह्मोद्भवम् — विद्धि ।
ब्रह्म — अक्षरसमुद्भवम् ।
तस्मात् — सर्वगतम् — ब्रह्म — नित्यम् — यज्ञे — प्रतिष्ठितम् ॥

श्लोक 16
एवम् — प्रवर्तितम् — चक्रम् — न — अनुवर्तयति — इह — यः ।
अघायुः — इंद्रियारामः — मोघम् — पार्थ — सः — जीवति ॥

श्लोक 17
यः — तु — आत्मरति: — एव — स्यात् ।
आत्मतृप्तः — च — मानवः ।
आत्मनि — एव — च — सन्तुष्टः — तस्य — कार्यम् — न — विद्यते ॥

श्लोक 18
न — एव — तस्य — कृतेन — अर्थः ।
न — अकृतेन — इह — कश्चन ।
न — च — अस्य — सर्वभूतेषु — कश्चित् — अर्थव्यपाश्रयः ॥

श्लोक 19
तस्मात् — असक्तः — सततम् — कार्यम् — कर्म — समाचर ।
असक्तः — हि — आचरन् — कर्म — परम — आप्नोति — पुरुषः ॥

श्लोक 20
कर्मणा — एव — हि — संसिद्धिम् — आस्थिताः — जनकादयः ।
लोकसंग्रहम् — एव — अपि — सम्पश्यन् — कर्तुम् — अर्हसि ॥

श्लोक 21
यत् — यत् — आचरति — श्रेष्ठः — तत् — तत् — एव — इतरः — जनः ।
सः — यत् — प्रमाणम् — कुरुते — लोकः — तत् — अनुवर्तते ॥

श्लोक 22
न — मे — पार्थ — अस्ति — कर्तव्यम् — त्रिषु — लोकेषु — किञ्चन ।
न — अनवाप्तम् — अवाप्तव्यम् ।
वर्ते — एव — च — कर्मणि ॥

श्लोक 23
यदि — हि — अहम् — न — वर्तेयम् — जातु — कर्मणि — अतन्द्रितः ।
मम — वर्त्म — अनुवर्तन्ते — मनुष्याः — पार्थ — सर्वशः ॥

श्लोक 24
उत्सीदेयुः — इमे — लोकाः — न — कुर्याम् — कर्म — चेत् — अहम् ।
संकरस्य — च — कर्ता — स्याम् — उपहन्याम् — इमाः — प्रजाः ॥

श्लोक 25
सक्ताः — कर्मणि — अविद्वांसः — यथा — कुर्वन्ति — भारत ।
कुर्यात् — विद्वान् — तथा — असक्तः — चिकीर्षुः — लोकसंग्रहम् ॥

श्लोक 26
न — बुद्धिभेदम् — जनयेत् — अज्ञानाम् — कर्मसंगिनाम् ।
जोषयेत् — सर्वकर्माणि — विद्वान् — युक्तः — समाचरन् ॥

श्लोक 27
प्रकृतेः — क्रियमाणानि — गुणैः — कर्माणि — सर्वशः ।
अहंकार — विमूढ — आत्मा — कर्ता — अहम् — इति — मन्यते ॥

श्लोक 28
तत्त्ववित् — तु — महाबाहो — गुणकर्म — विभागयोः ।
गुणाः — गुणेषु — वर्तन्ते — इति — मत्वा — न — सज्जते ॥

श्लोक 29
प्रकृतेः — गुण — सम्मूढाः — सज्जन्ते — गुणकर्मसु ।
तान् — अकृत्स्न — विदः — मन्दान् — कृत्स्नवित् — न — विचालयेत् ॥

श्लोक 30
मयि — सर्वाणि — कर्माणि — संन्यस्य — अध्यात्म — चेतसा ।
निराशीः — निर्ममः — भूत्वा — युध्यस्व — विगतज्वरः ॥

श्लोक 31
ये — मे — मतम् — इदम् — नित्यम् — अनुतिष्ठन्ति — मानवाः ।
श्रद्धावन्तः — अनसूयन्तः — मुच्यन्ते — ते — अपि — कर्मभिः ॥

श्लोक 32
ये — तु — एतत् — अभ्यसूयन्तः — न — अनुतिष्ठन्ति — मे — मतम् ।
सर्वज्ञान — विमूढान् — तान् — विद्धि — नष्टान् — अचेतसः ॥

श्लोक 33
सदृशम् — चेष्टते — स्वस्याः — प्रकृतेः — ज्ञानवान् — अपि ।
प्रकृतिम् — यान्ति — भूतानि — निग्रहः — किम् — करिष्यति ॥

श्लोक 34
इन्द्रियस्य — इन्द्रियस्य — अर्थे — राग — द्वेषौ — व्यवस्थितौ ।
तयोः — न — वशम् — आगच्छेत् — तौ — हि — अस्य — परिपन्थिनौ ॥

श्लोक 35
श्रेयान् — स्वधर्मः — विगुणः — परधर्मात् — स्वनुष्ठितात् ।
स्वधर्मे — निधनम् — श्रेयः — परधर्मः — भयावहः ॥

श्लोक 36
अर्जुन उवाच:
अथ — केन — प्रयुक्तः — अयम् — पापम् — चरति — पुरुषः ।
अनिच्छन् — अपि — वार्ष्णेय — बलात् — इव — नियोजितः ॥

श्लोक 37
श्रीभगवानुवाच:
कामः — एषः — क्रोधः — एषः — रजोगुण — समुद्भवः ।
महाशनः — महापाप्मा — विद्धि — एनम् — इह — वैरिणम् ॥

श्लोक 38
धूमेन — आव्रियते — वह्निः — यथा — आदर्शः — मलेन — च ।
यथा — उल्बेन — आवृतः — गर्भः — तथा — तेन — इदम् — आवृतम् ॥

श्लोक 39
आवृतम् — ज्ञानम् — एतेन — ज्ञानिनः — नित्यवैरिणा ।
कामरूपेण — कौन्तेय — दुष्पूरेण — अनलेन — च ॥

श्लोक 40
इन्द्रियाणि — मनः — बुद्धिः — अस्य — अधिष्ठानम् — उच्यते ।
एतैः — विमोहयति — एषः — ज्ञानम् — आवृत्य — देहिनम् ॥

श्लोक 41
तस्मात् — त्वम् — इन्द्रियाणि — आदौ — नियम्य — भरतर्षभ ।
पाप्मानम् — प्रजहि — हि — एनम् — ज्ञान — विज्ञान — नाशनम् ॥

श्लोक 42
इन्द्रियाणि — पराणि — आहुः ।
इन्द्रियेभ्यः — परम् — मनः ।
मनसः — तु — परा — बुद्धिः ।
यः — बुद्धेः — परतः — तु — सः ॥

श्लोक 43
एवम् — बुद्धेः — परम् — बुद्ध्वा — संस्तभ्य — आत्मानम् — आत्मना ।
जहि — शत्रुम् — महाबाहो — कामरूपम् — दुरासदम् ॥

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे

कर्मयोगो नाम तृतीयोऽध्यायः ॥3 ॥...

भावार्थ

📖 तृतीयोऽध्यायः — कर्मयोगः
🔹 श्लोकानुसार भावार्थ
1. अर्जुन कहते हैं — यदि ज्ञान (बुद्धि) कर्म से श्रेष्ठ है, तो हे कृष्ण! मुझे इस भयानक युद्ध में क्यों लगा रहे हैं?
2. आपके मिले-जुले वचनों से मेरी बुद्धि भ्रमित हो रही है। कृपया निश्चित रूप से एक मार्ग बताइए जिससे मेरा कल्याण हो।
3. भगवान कहते हैं — इस संसार में दो प्रकार की निष्ठाएँ पहले बताई गई हैं — ज्ञानयोग (ज्ञानमार्ग) और कर्मयोग (निष्काम कर्म का मार्ग)।
4. कर्मों को प्रारम्भ न करने से मनुष्य कर्मरहित नहीं होता और केवल संन्यास लेने से सिद्धि प्राप्त नहीं होती।
5. कोई भी व्यक्ति क्षणभर भी बिना कर्म किए नहीं रह सकता, क्योंकि प्रकृति के गुणों से सभी कर्म करने को बाध्य होते हैं।
6. जो बाहर से इन्द्रियों को रोककर मन में विषयों का चिंतन करता है, वह मिथ्याचारी (दिखावटी) कहलाता है।
7. जो मन से इन्द्रियों को वश में करके आसक्ति रहित होकर कर्म करता है, वही श्रेष्ठ है।
8. तू अपना कर्तव्य कर्म कर, क्योंकि कर्म करना अकर्म (कुछ न करने) से श्रेष्ठ है; शरीर की यात्रा भी कर्म बिना नहीं चल सकती।
9. यज्ञ (उच्च उद्देश्य) के लिए किए गए कर्मों को छोड़कर अन्य कर्म बंधन का कारण बनते हैं, इसलिए आसक्ति त्यागकर कर्म कर।
10. सृष्टि के प्रारम्भ में प्रजापति ने यज्ञ सहित प्रजाओं को उत्पन्न कर कहा — इससे तुम उन्नति करोगे और यह तुम्हारी इच्छाओं को पूर्ण करेगा।
11. यज्ञ द्वारा देवताओं को प्रसन्न करो, वे तुम्हें प्रसन्न करेंगे; इस प्रकार परस्पर सहयोग से कल्याण होगा।
12. देवताओं द्वारा दिए गए पदार्थों को बिना अर्पण किए जो स्वयं भोगता है, वह चोर है।
13. यज्ञ से शुद्ध अन्न खाने वाले पापों से मुक्त होते हैं, परन्तु केवल अपने लिए पकाने वाले पाप ही खाते हैं।
14. अन्न से प्राणी उत्पन्न होते हैं, वर्षा से अन्न होता है, यज्ञ से वर्षा होती है और यज्ञ कर्म से उत्पन्न होता है।
15. कर्म ब्रह्म से उत्पन्न है और ब्रह्म अक्षर (परमात्मा) से; इसलिए ब्रह्म सदा यज्ञ में स्थित है।
16. जो इस सृष्टि-चक्र का पालन नहीं करता और इन्द्रियों में ही रमता है, उसका जीवन व्यर्थ है।
17. जो आत्मा में ही आनंद पाता है और आत्मा में ही संतुष्ट है, उसके लिए कोई कर्तव्य शेष नहीं रहता।
18. ऐसे ज्ञानी के लिए न कर्म करने से कोई हानि है और न कर्म करने से कोई लाभ; वह किसी पर आश्रित नहीं रहता।
19. इसलिए आसक्ति रहित होकर निरंतर कर्तव्य कर्म करो; ऐसा करने से मनुष्य परम अवस्था प्राप्त करता है।
20. जनक आदि राजाओं ने कर्म करके ही सिद्धि प्राप्त की; लोक-संग्रह (दूसरों के हित) के लिए भी कर्म करना चाहिए।
21. श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करता है, अन्य लोग भी वैसा ही करते हैं।
22. हे अर्जुन! तीनों लोकों में मेरे लिए कोई कर्तव्य नहीं है, फिर भी मैं कर्म करता हूँ।
23. यदि मैं कर्म न करूँ, तो लोग मेरे मार्ग का अनुसरण करते हुए कर्म करना छोड़ देंगे।
24. तब संसार का नाश हो जाएगा और मैं प्रजाओं के विनाश का कारण बन जाऊँगा।
25. अज्ञानी लोग आसक्ति से कर्म करते हैं; ज्ञानी को बिना आसक्ति के लोककल्याण के लिए कर्म करना चाहिए।
26. ज्ञानी को अज्ञानी लोगों की बुद्धि में भ्रम नहीं उत्पन्न करना चाहिए, बल्कि स्वयं कर्म करते हुए उन्हें प्रेरित करना चाहिए।
27. वास्तव में प्रकृति के गुण ही सभी कर्म करते हैं, परंतु अहंकार से मोहित व्यक्ति स्वयं को कर्ता मानता है।
28. तत्त्व को जानने वाला समझता है कि गुण ही गुणों में प्रवृत्त हैं, इसलिए वह आसक्त नहीं होता।
29. प्रकृति के गुणों से मोहित लोग कर्मों में आसक्त रहते हैं; ज्ञानी को उन्हें विचलित नहीं करना चाहिए।
30. सभी कर्म मुझे अर्पित करके, आशा और ममता छोड़कर, मानसिक व्याकुलता रहित होकर अपना कर्तव्य कर।
31. जो लोग श्रद्धा से मेरे इस मत का पालन करते हैं, वे कर्मबंधन से मुक्त हो जाते हैं।
32. जो दोष-दृष्टि करके इस उपदेश का पालन नहीं करते, वे अज्ञान से नष्ट हो जाते हैं।
33. ज्ञानी भी अपनी प्रकृति के अनुसार ही आचरण करता है; प्रकृति को बलपूर्वक दबाना कठिन है।
34. इन्द्रियों के विषयों में राग और द्वेष स्थित रहते हैं; इनके वश में नहीं होना चाहिए, क्योंकि ये बाधक हैं।
35. अपना धर्म (कर्तव्य) दोषयुक्त भी हो तो श्रेष्ठ है; दूसरे का धर्म भली प्रकार करने पर भी भयावह है।
36. अर्जुन पूछते हैं — मनुष्य इच्छा न होते हुए भी पाप क्यों करता है, मानो किसी बल से प्रेरित हो?
37. भगवान कहते हैं — यह काम और क्रोध है, जो रजोगुण से उत्पन्न होते हैं; यह मनुष्य का महान शत्रु है।
38. जैसे धुएँ से अग्नि, धूल से दर्पण और गर्भ आवरण से ढका रहता है, वैसे ही ज्ञान काम से ढक जाता है।
39. यह कामरूप अग्नि ज्ञान को ढक देता है और ज्ञानियों का भी शत्रु है।
40. इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि — यही काम के निवास स्थान हैं; इनके द्वारा यह ज्ञान को ढककर जीव को मोहित करता है।
41. इसलिए पहले इन्द्रियों को वश में करके इस ज्ञान-विज्ञान को नष्ट करने वाले शत्रु को नष्ट करो।
42. इन्द्रियाँ शरीर से श्रेष्ठ हैं, मन इन्द्रियों से श्रेष्ठ है, बुद्धि मन से श्रेष्ठ है और आत्मा बुद्धि से भी श्रेष्ठ है।
43. इस प्रकार आत्मा को जानकर, बुद्धि से मन को स्थिर कर, इस कठिन कामरूपी शत्रु का नाश करो।...

लाभ एवं महत्व

🔹 अध्याय 3 का सार (10 मुख्य सूत्र) 1️⃣ ज्ञान और कर्म दोनों मार्ग हैं भगवान ने बताया कि दो निष्ठाएँ हैं — ज्ञानयोग (वैराग्य और आत्मचिंतन का मार्ग) कर्मयोग (निष्काम कर्म का मार्ग) पर सामान्य मनुष्य के लिए कर्मयोग अधिक उपयुक्त है। 2️⃣ कर्म से बचकर मुक्ति नहीं मिलती केवल कर्म त्याग देने से या बाहरी संन्यास लेने से सिद्धि नहीं मिलती। प्रकृति के गुण हमें कर्म करने के लिए बाध्य करते हैं। 3️⃣ निष्काम भाव से कर्म ही मुक्ति का साधन है फल की इच्छा छोड़कर कर्तव्य कर्म करने से बंधन नहीं होता। “कर्मण्येवाधिकारस्ते…” का विस्तार यहाँ व्यवहार में समझाया गया है। 4️⃣ यज्ञ भावना का सिद्धांत हर कर्म यदि उच्च उद्देश्य (यज्ञ) के लिए हो, तो वह पवित्र हो जाता है। स्वार्थ के लिए किया गया कर्म बंधन है। 5️⃣ सृष्टि एक सहयोग-चक्र है अन्न → वर्षा → यज्ञ → कर्म → ब्रह्म — इस चक्र का पालन करना ही धर्म है। 6️⃣ श्रेष्ठ पुरुष का आदर्श प्रभाव समाज श्रेष्ठ व्यक्ति का अनुसरण करता है। इसलिए ज्ञानी को भी लोकसंग्रह (समाज के हित) के लिए कर्म करना चाहिए। 7️⃣ कर्ता कौन है? वास्तव में प्रकृति के गुण कर्म करते हैं। अहंकारवश मनुष्य स्वयं को कर्ता मान लेता है — यही अज्ञान है। 8️⃣ स्वधर्म का महत्व अपना कर्तव्य (स्वधर्म) दोषयुक्त हो तो भी श्रेष्ठ है। दूसरे का धर्म अपनाना भयावह है। 9️⃣ पाप का कारण — काम और क्रोध रजोगुण से उत्पन्न काम (अतृप्त इच्छा) ही क्रोध बनकर ज्ञान को ढक देता है। यही मनुष्य का मुख्य शत्रु है। 🔟 आत्मा सर्वोच्च है इन्द्रियाँ < मन < बुद्धि < आत्मा जब बुद्धि से मन को नियंत्रित कर आत्मा में स्थित होते हैं, तब काम रूपी शत्रु पर विजय मिलती है। 🔹 अध्याय 3 का संक्षिप्त संदेश 👉 जीवन से भागो मत — उसे योग बना दो। 👉 कर्म करो, पर आसक्ति मत रखो। 👉 अपने धर्म में स्थिर रहो। 👉 काम और अहंकार से सावधान रहो। 👉 सब कर्म भगवान को अर्पित करो।