।। श्रीमहाविद्या कवचम् ।

।। श्रीमहाविद्या कवचम् ।।

🔱 विनियोग :
ॐ अस्य श्रीमहाविद्या-कवचस्य
नारद ऋषिः ।
अनुष्टुप् छन्दः ।
महाविद्याः देवताः ।
सर्वभय-निवारणार्थे
सर्वशत्रु-उपशमनार्थे
सर्वरक्षा-सिद्ध्यर्थे
पाठे विनियोगः ॥

करन्यासः

ॐ तारा अङ्गुष्ठाभ्यां नमः
ॐ षोडशी तर्जनीभ्यां नमः
ॐ भुवनेश्वरी मध्यमाभ्यां नमः
ॐ भैरवी अनामिकाभ्यां नमः
ॐ छिन्नमस्ता कनिष्ठिकाभ्यां नमः
ॐ कमला करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः

हृदयादि न्यासः

ॐ तारा हृदयाय नमः
ॐ भुवनेश्वरी शिरसे स्वाहा
ॐ छिन्नमस्ता शिखायै वषट्
ॐ भैरवी कवचाय हुम्
ॐ धूमावती नेत्रत्रयाय वौषट्
ॐ कमला अस्त्राय फट्

कवचम्:

ॐ प्राच्यां रक्षतु मे ताराकामरुप निवासिनी।
आग्नेयां षोडशी पातु, याम्यां धूमावती स्वयम ।।१।।

नैर्ॠत्यां भैरवी पातु, वारुण्यां भुवनेश्वरी।
वायव्यां सततं पातु, छिन्नमस्ता महेश्वरी ।।२।।

कौबेर्यां पातु मे देवी, श्रीविधा बगला-मुखी ।
ऐशान्यां पातु मे नित्यं महात्रिपुर सुन्दरी ।।३।।

उर्ध्वं रक्षतु मे विधा, मातङ्गी पीठ वासिनी ।
सर्वत: पातु मे नित्यं, कामाख्या कालिका स्वयम ।।४।।

ब्रह्म-रुपा-महा-विधा, सर्वविधा-मयी स्वयम ।
शिर्षे रक्षतु मे दुर्गा, भालं श्रीभव-गेहिनी ।।५।।

त्रिपुरा भ्रुयुगे पातु, शर्वाणी पातु नासिकाम ।
चक्षुषी चण्डिका पातु, श्रीत्रे नीलसरस्वती ।।६।।

मुखं सौम्य-मुखी पातु, ग्रिवां रक्षतु पार्वती ।
जिह्वां रक्षतु मे देवी, जिह्वा-ललन भीषणा ।।७।।

वाग्-देवी वदनं पातु वक्ष: पातु महेश्वरी।
बाहु महा-भुजा पातु, करांगुली: सुरेश्वरी ।।८।।

पृष्‍ठत: पातु भिमास्या, कट्यां देवी दिगम्बरी।
उदरं पातु मे नित्यं, महाविधा महोदरी ।।९।।

उग्र-तारा महा-देवी, जंघोरु परी-रक्षतु ।
गूदं मुष्कं च मेढुं च, नाभीं च सुर-सुन्दरी ।।१०।।

पदांगुली: सदा पातु, भवानी त्रिदशेश्वरी।
रक्तं-मांसास्थी-मज्जादिन, पातु देवी शवासना ।।११।।

महाभयेषु घोरेषु, महाभय-निवारिणी।
पातु देवी महामाया,कामाख्या पीठवासिनी ।।१२।।

भस्माचल-गता दिव्य-सिंहासन-कृताश्रया ।
पातु श्रीकालिका-देवी, सर्वोत्पातेषु सर्वदा ।।१३।।

रक्षाहीनं तु यत स्थानं, कवचेनापि वर्जितम ।
तत्-सर्व सर्वदा पातु, सर्वरक्षण-कारिणी ।।१४।।

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भावार्थ

🔱 हिंदी अर्थ (सम्पूर्ण)
श्लोक 1
पूर्व दिशा में कामरूप में निवास करने वाली माँ तारा मेरी रक्षा करें। अग्नि दिशा में षोडशी, दक्षिण में स्वयं धूमावती मेरी रक्षा करें।

श्लोक 2
नैऋत्य दिशा में भैरवी, पश्चिम में भुवनेश्वरी,
वायव्य दिशा में महेश्वरी छिन्नमस्ता मेरी निरंतर रक्षा करें।

श्लोक 3
उत्तर दिशा में श्रीविद्या बगलामुखी,
ईशान कोण में महात्रिपुरसुन्दरी मेरी रक्षा करें।

श्लोक 4
ऊर्ध्व दिशा में पीठवासिनी मातंगी मेरी रक्षा करें,
चारों ओर से स्वयं कामाख्या कालिका मेरी रक्षा करें।

श्लोक 5
ब्रह्मस्वरूपिणी, समस्त विद्याओं से युक्त महाविद्या, मेरे सिर की रक्षा दुर्गा करें और ललाट की रक्षा श्रीभवगेहिनी करें।

श्लोक 6
भौंहों के मध्य त्रिपुरा, नासिका की शर्वाणी,
नेत्रों की चण्डिका और कानों की नीलसरस्वती रक्षा करें।

श्लोक 7
मुख की रक्षा सौम्यमुखी, ग्रीवा की पार्वती,
जिह्वा की रक्षा जिह्वाललनभीषणा देवी करें।

श्लोक 8
वाणी और मुख की रक्षा वाग्देवी, वक्षस्थल की महेश्वरी, भुजाओं की महाभुजा और उंगलियों की सुरेश्वरी रक्षा करें।

श्लोक 9
पीठ की भीमास्या, कटि की दिगम्बरी,
उदर की महोदरी महाविद्या रक्षा करें।

श्लोक 10
जंघा और जांघों की उग्रतारा, गुदा, मुष्क, मेढ्र और नाभि की सुरसुन्दरी रक्षा करें।

श्लोक 11
पैरों की उंगलियों की भवानी, रक्त, मांस, अस्थि, मज्जा की शवासना देवी रक्षा करें।

श्लोक 12
भयंकर महाभयों में महामाया कामाख्या मेरी रक्षा करें।

श्लोक 13
भस्माचल पर दिव्य सिंहासन पर स्थित श्रीकालिका सभी उत्पातों से सदा मेरी रक्षा करें।

श्लोक 14
जो स्थान कवच से भी रहित हो, उसकी भी सर्वदा सर्वरक्षणकारिणी महाविद्या रक्षा करें।

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पूजन विधि

🔱 कवच-पाठ की विधि (सरल लेकिन सिद्ध):

प्रातः या रात्रि, शुद्ध होकर
लाल / पीले आसन पर पूर्व या उत्तर मुख बैठें
दीपक और धूप अनिवार्य
यदि संभव हो तो कुमकुम, लाल पुष्प, पीला पुष्प अर्पित करें
पहले 1 बार मूल बीज (यदि जानते हों)
फिर पूरा कवच एक बार या 3 बार
👉 यह कवच बिना दीक्षा भी पढ़ा जा सकता है
👉 लेकिन श्रद्धा और नियम अनिवार्य हैं

🔱 जप-संख्या (अनुभवसिद्ध):

सामान्य रक्षा हेतु → 1 पाठ प्रतिदिन
भय / शत्रु / बाधा में → 3 पाठ प्रतिदिन
तांत्रिक बाधा / उपद्रव में → 9 पाठ (विशेष दिन)

🔱 केवल कवच-पाठ के प्रमुख लाभ:

✔️ दिशागत, ग्रहगत, तांत्रिक भय से रक्षा
✔️ शत्रु, विरोधी, ईर्ष्या, षड्यंत्र का शमन
✔️ आकस्मिक दुर्घटना, उपद्रव, उत्पात से सुरक्षा
✔️ साधक के शरीर, प्राण, मन और स्थान की रक्षा
✔️ महाविद्याओं की सामूहिक कवच-शक्ति
⚠️ यह कवच आक्रमण के लिए नहीं,
पूर्ण रक्षा और स्थैर्य के लिए है।

🔱 सावधानियाँ (बहुत आवश्यक):

❌ मज़ाक, परीक्षण या दिखावे हेतु न पढ़ें
❌ अशुद्ध अवस्था, नशे में, क्रोध में न पढ़ें
❌ अपवित्र स्थान (शौचालय आदि) में वर्जित
✔️ श्रद्धा
✔️ नियम
✔️ संयम
— यही सिद्धि का मूल है