॥ श्रीवराहस्तोत्रम् ॥ १ चित्-आनन्द-घनम् शुद्धम् विश्व-मङ्गल-कारकम् ॥ मोक्ष-हेतुम् हि तम् विष्णुम् वन्दे वाराह-रूपिणम् ॥१॥ २ नेति नेति श्रुतिः ब्रूते यस्य रूपम् अवर्णनीयम् ॥ पर-ब्रह्म हि तम् विष्णुम् वन्दे वाराह-रूपिणम् ॥२॥ ३ तत्त्वम् असि इति वक्तारम् आविर्भूतम् जगत्-पतिम् ॥ श्री-सद्-गुरुम् हि तम् विष्णुम् वन्दे वाराह-रूपिणम् ॥३॥ ४ रसातल-गताम् भूमिम् गजः कमलिनीम् इव ॥ उद्धदार हि तम् विष्णुम् वन्दे वाराह-रूपिणम् ॥४॥ ५ अवधीत् यः हिरण्याक्षम् विश्व-कण्टक-राक्षसम् ॥ विश्व-पालम् हि तम् विष्णुम् वन्दे वाराह-रूपिणम् ॥५॥ ६ धर्म-उद्धार-अवतारः अयम् सज्जन-अवन-हेतुकम् ॥ जगत्-पतिम् हि तम् विष्णुम् वन्दे वाराह-रूपिणम् ॥६॥ ७ अत्यन्त-करुणा-सान्द्रम् जगत्-उद्धारकम् परम् ॥ भव-तारम् हि तम् विष्णुम् वन्दे वाराह-रूपिणम् ॥७॥ ८ सदैव अक्लिष्ट-कर्माणम् जगत्-स्थिति-हेतवे ॥ भव-नौकाम् हि तम् विष्णुम् वन्दे वाराह-रूपिणम् ॥८॥ ॥ इति श्रीधरस्वामि-विरचितम् श्रीवराहस्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥ *******************************