🔱 श्लोकानुसार अर्थ
(पूरा संस्कृत पाठ समाप्त होने के बाद)
१.
जो शुद्ध चैतन्य और आनंदस्वरूप हैं, सम्पूर्ण विश्व का मंगल करने वाले और मोक्ष का कारण हैं — उन भगवान विष्णु के वराह रूप को मैं नमन करता हूँ।
२.
जिनका स्वरूप “नेति-नेति” कहकर वेद भी पूर्णतः वर्णन नहीं कर पाते, जो परब्रह्मस्वरूप हैं — उन वराह रूप विष्णु को मैं प्रणाम करता हूँ।
३.
जो “तत्त्वमसि” का उपदेश देने वाले, स्वयं प्रकट हुए जगत् के स्वामी और सच्चे सद्गुरु हैं — उन वराह रूप विष्णु को मैं वन्दन करता हूँ।
४.
जिन्होंने रसातल में गिरी हुई पृथ्वी को हाथी द्वारा कमलिनी उठाने की भाँति ऊपर उठाया — उन वराह रूप विष्णु को मैं प्रणाम करता हूँ।
५.
जिन्होंने विश्व में काँटे समान उपद्रवकारी राक्षस हिरण्याक्ष का वध किया और जो जगत् के रक्षक हैं — उन वराह रूप विष्णु को मैं नमन करता हूँ।
६.
यह अवतार धर्म की स्थापना और सज्जनों की रक्षा के लिए हुआ — ऐसे जगत्-स्वामी वराह रूप विष्णु को मैं प्रणाम करता हूँ।
७.
जो अपार करुणा से परिपूर्ण, समस्त संसार का उद्धार करने वाले और भवसागर से तारने वाले हैं — उन वराह रूप विष्णु को मैं वन्दन करता हूँ।
८.
जो सदा निष्कलुष कर्म करने वाले, जगत् की स्थिति बनाए रखने वाले और संसार रूपी नौका हैं — उन वराह रूप विष्णु को मैं प्रणाम करता हूँ।
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🕉 पाठ विधि:
प्रातः स्नान के बाद या प्रदोष काल में
विष्णु या वराह मूर्ति/चित्र के सामने
1, 3 या 8 बार पाठ
शनिवार, एकादशी या वराह जयंती विशेष फलदायी
🔔 विशेष प्रयोग:
भूमि-सम्बन्धी दोष, भय, भारी कर्म-बन्धन
आध्यात्मिक साधना में स्थिरता हेतु
संकट काल में 11 दिन नित्य पाठ
✨ मुख्य लाभ:
संसारिक और आध्यात्मिक उद्धार
धर्म-रक्षा और अधर्म-नाश
गहन संकटों से भवसागर-तारण
गुरु-कृपा और तत्त्वज्ञान की प्राप्ति
पृथ्वी-तत्व, स्थिरता और जीवन-संतुलन