॥ श्री नारायणाष्टकम् ॥

॥ श्री नारायणाष्टकम् ॥

🔸 संस्कृत पाठ (पद-विच्छेद सहित)

ॐ अस्य श्रीनारायणाष्टकस्तोत्रस्य कूरेशस्वामी ऋषिः अनुष्टुप् छन्दः श्रीमहाविष्णुर्नारायणो देवता
आर्तत्राणपरायणः इति बीजम् शरणागतरक्षणः इति शक्तिः भक्तवत्सलः इति कीलकम् सर्वभयदुःखनिवारणार्थं भक्तिवैराग्यवृद्ध्यर्थं
नारायणप्रीत्यर्थं पाठे विनियोगः ॥

ध्यान:
शान्तं पद्मासनस्थं शशिधरमुकुटं
पीतवस्त्रं चतुर्भुजम्
शङ्खचक्रगदापद्मैः अलंकृतकरं
नारायणं चिन्तयामि

स्त्रोत:

वात्सल्यात् अभयप्रदानसमयात्
आर्तिनिर्वापणात्
औदार्यात् अघशोषणात्
अगणितश्रेयःपदप्रापणात्
सेव्यः श्रीपतिः एक एव
जगताम् एते अभवन् साक्षिणः
प्रह्लादः च विभीषणः च
करिराट् पाञ्चाली अहल्या ध्रुवः ॥ १ ॥

प्रह्लादः अस्ति यदि ईश्वरः वद
हरिः सर्वत्र मे दर्शय
स्तम्भे च एवम् इति ब्रुवन्तम्
असुरम् तत्र आविरासीत् हरिः
वक्षः तस्य विदारयन्
निजनखैः वात्सल्यम् आपादयन्
आर्तत्राणपरायणः सः
भगवान् नारायणः मे गतिः ॥ २ ॥

श्रीराम अत्र विभीषणः अयम् अनघः
रक्षोभयात् आगतः
सुग्रीव आनय पालय एनम् अधुना
पौलस्त्यः एव आगतः
इति उक्त्वा अभयम् अस्य
सर्वविदितम् यः राघवः दत्तवान्
आर्तत्राणपरायणः सः
भगवान् नारायणः मे गतिः ॥ ३ ॥

नक्रग्रस्तपदम् समुद्धतकरम्
ब्रह्मादयः भो सुराः
पाल्यन्ताम् इति दीनवाक्यकरिणम्
देवेषु अशक्तेषु यः
मा भैषीः इति यस्य
नक्रहनने चक्रायुधः श्रीधरः
आर्तत्राणपरायणः सः
भगवान् नारायणः मे गतिः ॥ ४ ॥

भो कृष्ण अच्युत भो कृपालय हरे
भो पाण्डवानां सखे
क्व असि क्व असि सुयोधनात् अपहृताम्
भो रक्ष माम् आतुराम्
इति उक्तः अक्षयवस्त्रसंभृततनुम्
यः अपालयत् द्रौपदीम्
आर्तत्राणपरायणः सः
भगवान् नारायणः मे गतिः ॥ ५ ॥

यत् पादाब्जनखोदकम् त्रिजगताम्
पापौघविध्वंसनम्
यत् नाम अमृतपूरकम् च
पिबताम् संसारसन्तारकम्
पाषाणः अपि यत् अङ्घ्रिपद्मरजसा
शापात् मुनेः मोचितः
आर्तत्राणपरायणः सः
भगवान् नारायणः मे गतिः ॥ ६ ॥

पित्रा भ्रातरम् उत्तमासनगतम्
चौत्तानपादिः ध्रुवः दृष्ट्वा
तत्समम् आरुरुक्षुः अधृतः
मात्रा अवमानम् गतः
यम् गत्वा शरणम्
तपसा हेमाद्रिसिंहासनम् आप
आर्तत्राणपरायणः सः
भगवान् नारायणः मे गतिः ॥ ७ ॥

आर्ताः विषण्णाः शिथिलाः च भीताः
घोरेषु च व्याधिषु वर्तमानाः
सङ्कीर्त्य नारायणशब्दमात्रम्
विमुक्तदुःखाः सुखिनः भवन्ति ॥ ८ ॥

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भावार्थ

🔹 श्लोक १ – भावार्थ
भगवान नारायण अपने वात्सल्य से अभय देने वाले हैं, दुःखियों की पीड़ा हरने वाले हैं
उदारता से पापों का नाश करते हैं
असंख्य कल्याण प्रदान करते हैं
इसी कारण केवल वही श्रीपति पूज्य हैं
इस सत्य के साक्षी प्रह्लाद, विभीषण, गजेंद्र, द्रौपदी, अहल्या और ध्रुव हैं

🔹 श्लोक २ – भावार्थ
प्रह्लाद के वचनों पर
खंभे से प्रकट होकर
नृसिंह रूप में हरि ने
हिरण्यकशिपु का वध किया
और भक्त की रक्षा की
ऐसे आर्तत्राण नारायण ही मेरी शरण हैं

🔹 श्लोक ३ – भावार्थ
विभीषण शत्रु होकर भी
शरणागत हुआ
श्रीराम ने उसे अभय दिया
और स्वीकार किया
वह शरणागत-रक्षक नारायण मेरी गति हैं

🔹 श्लोक ४ – भावार्थ
गजेंद्र को मगर से मुक्त कर
हरि ने चक्र से रक्षा की
देव भी असहाय थे
वह भय-हरण नारायण मेरी शरण हैं

🔹 श्लोक ५ – भावार्थ
द्रौपदी की पुकार पर
कृष्ण ने अक्षय वस्त्र दिया
और लज्जा बचाई
वह करुणामय नारायण मेरी गति हैं

🔹 श्लोक ६ – भावार्थ
जिनके चरणामृत से पाप नष्ट होते हैं
जिनका नाम संसार से तारता है
जिनकी चरण-रज से अहल्या मुक्त हुई
वह नारायण मेरी शरण हैं

🔹 श्लोक ७ – भावार्थ
ध्रुव ने अपमान सहकर
नारायण की शरण ली
और अचल पद प्राप्त किया
वह भक्तवत्सल नारायण मेरी गति हैं

🔹 श्लोक ८ – भावार्थ
जो भयभीत, रोगी, दुःखी हैं
वे केवल “नारायण” नाम के कीर्तन से
दुःख से मुक्त होकर सुखी हो जाते हैं

पूजन विधि

🔱 पाठ-विधि (साधारण एवं शुद्ध)

🔸 समय
प्रातः ब्रह्ममुहूर्त
या सायंकाल संध्या
संकट, भय, रोग में कभी भी

🔸 आसन
कुशासन या ऊनी आसन
उत्तर या पूर्व मुख

🔸 पूर्वकर्म
आचमन
प्राणायाम (ॐ नमो नारायणाय 3 बार)
दीप प्रज्वलन
श्रीनारायण का ध्यान

🔸 ध्यान (संक्षिप्त)
शान्तं पद्मासनस्थं शशिधरमुकुटं
पीतवस्त्रं चतुर्भुजम्
शङ्खचक्रगदापद्मैः अलंकृतकरं
नारायणं चिन्तयामि

🔸 पाठ
स्तोत्र का १, ३ या ८ बार पाठ
अंत में ॐ नमो नारायणाय 11 या 108 बार

🔱 प्रयोग (विशेष फल हेतु)

🔹 1. भय-निवारण प्रयोग
शनिवार या एकादशी
11 दिन
प्रतिदिन 8 पाठ
➡️ अकाल भय, शत्रु, मानसिक त्रास नष्ट होता है

🔹 2. रोग-शान्ति प्रयोग
रोगी के सामने दीप रखकर
7 दिन
प्रतिदिन 3 पाठ
➡️ विशेषतः मानसिक रोग, भयजन्य रोगों में फलदायी

🔹 3. संकट-मोचन प्रयोग
जल पात्र सामने रखें
8 पाठ कर जल पर फूँकें
उस जल को ग्रहण करें
➡️ आकस्मिक संकट, मुकदमे, अपमान से रक्षा

🔹 4. भक्ति-वैराग्य सिद्धि
एकादशी व्रत में
21 या 41 दिन
प्रतिदिन 1 पाठ
➡️ हृदय में नारायण-भक्ति स्थिर होती है

लाभ एवं महत्व

🔱 रहस्य (तत्त्वार्थ)

🔸 यह स्तोत्र मंत्र नहीं, भाव-प्रधान शरणागति स्तोत्र है

🔸 हर श्लोक में इतिहासिक प्रमाण है—
प्रह्लाद → अहंकार नाश
विभीषण → शरणागत रक्षा
गजेंद्र → अकाल संकट
द्रौपदी → मान-रक्षा
अहल्या → पाप-मोचन
ध्रुव → अचल पद

🔸 अंतिम श्लोक बताता है—
केवल “नारायण” नाम-स्मरण से
घोर दुःख भी नष्ट हो जाते हैं