।।श्री देव्यथर्वशीर्षम्।

📖 श्री देव्यथर्वशीर्षम् ।।

ॐ सर्वे-वै-देवाः-देवीम्-उपतस्थुः-का-असि-त्वं-महादेवि-इति ॥1॥

सा-अब्रवीत्-अहम्-ब्रह्म-स्वरूपिणी।
मत्तः-प्रकृति-पुरुष-आत्मकम्-जगत्।
शून्यम्-च-अशून्यम्-च ॥2॥

अहम्-आनन्द-अनानन्दौ।
अहम्-विज्ञान-अविज्ञाने।
अहम्-ब्रह्म-अब्रह्मणि-वेदितव्ये।
अहम्-पञ्च-भूतानि-अ-पञ्च-भूतानि।
अहम्-अखिलम्-जगत् ॥3॥

वेदः-अहम्-अवेदः-अहम्।
विद्या-अहम्-अविद्या-अहम्।
अजा-अहम्-अनजा-अहम्।
अधः-च-ऊर्ध्वम्-च-तिर्यक्-च-अहम् ॥4॥

अहम्-रुद्रेभिः-वसुभिः-च-चरामि।
अहम्-आदित्यैः-उत-विश्वदेवैः।
अहम्-मित्रावरुणौ-उभौ-बिभर्मि।
अहम्-इन्द्राग्नी-अहम्-अश्विनौ-उभौ ॥5॥

अहम्-सोमम्-त्वष्टारम्-पूषणम्-भगम्-दधामि।
अहम्-विष्णुम्-उरुक्रमम्-ब्रह्माणम्-उत-प्रजापतिम्-दधामि ॥6॥

अहम्-दधामि-द्रविणम्-हविष्मते-सुप्राव्ये-यजमानाय-सुन्वते।
अहम्-राष्ट्रि-संगमनी-वसूनाम्-चिकितुषी-प्रथमा-यज्ञियानाम्।
अहम्-सुवे-पितरम्-अस्य-मूर्धन्-मम-योनिः-अप्सु-अन्तः-समुद्रे।
यः-एवम्-वेद-सः-देवीम्-सम्पदम्-आप्नोति ॥7॥

ते-देवाः-अब्रुवन्।
नमः-देव्यै-महादेव्यै-शिवायै-सततम्-नमः।
नमः-प्रकृत्यै-भद्रायै-नियताः-प्रणताः-स्म-ताम् ॥8॥

ताम्-अग्नि-वर्णाम्-तपसा-ज्वलन्तीम्-वैरोचनीम्-कर्म-फलेषु-जुष्टाम्।
दुर्गाम्-देवीम्-शरणम्-प्रपद्यामहे-असुरान्-नाशयित्र्यै-ते-नमः ॥9॥

देवीम्-वाचम्-अजनयन्त-देवाः-ताम्-विश्व-रूपाः-पशवः-वदन्ति।
सा-नः-मन्द्रा-ईषम्-ऊर्जम्-दुहाना-धेनुः-वाक्-अस्मान्-उप-सुष्टुत-एतु ॥10॥

कालरात्रिम्-ब्रह्म-स्तुताम्-वैष्णवीम्-स्कन्द-मातरम्।
सरस्वतीम्-अदितिम्-दक्ष-दुहितरम्-नमामः-पावनाम्-शिवाम् ॥11॥

महालक्ष्म्यै-च-विद्महे-सर्वशक्त्यै-च-धीमहि।
तत्-नः-देवी-प्रचोदयात् ॥12॥

अदितिः-हि-अजनिष्ट-दक्ष-या-दुहिता-तव।
ताम्-देवाः-अन्वजायन्त-भद्राः-अमृत-बन्धवः ॥13॥

कामः-योनिः-कमला-वज्रपाणिः-गुहा-हसा-मातरिश्वा-अभ्रम्-इन्द्रः।
पुनः-गुहा-सकला-मायया-च-पुरूचा-एषा-विश्वमाता-दिवि-इद्यम् ॥14॥

एषा-आत्म-शक्तिः।
एषा-विश्व-मोहिनी।
पाश-अङ्कुश-धनुः-बाण-धरा।
एषा-श्री-महा-विद्या।
यः-एवम्-वेद-सः-शोकम्-तरति ॥15॥

नमः-ते-अस्तु-भगवति-मातर्-अस्मान्-पाहि-सर्वतः ॥16॥

सा-एषा-अष्टौ-वसवः।
सा-एषा-एकादश-रुद्राः।
सा-एषा-द्वादश-आदित्याः।
सा-एषा-विश्वे-देवाः-सोमपाः-असोमपाः-च।
सा-एषा-यातुधानाः-असुराः-रक्षांसि-पिशाचाः-यक्षाः-सिद्धाः।
सा-एषा-सत्त्व-रजस्-तमांसि।
सा-एषा-ब्रह्म-विष्णु-रुद्र-रूपिणी।
सा-एषा-प्रजापति-इन्द्र-मनवः।
सा-एषा-ग्रह-नक्षत्र-ज्योतींषि-कलाकाष्ठ-आदि-काल-रूपिणी।
ताम्-अहम्-प्रणौमि-नित्यम्।
पाप-अपहारिणीम्-देवीम्-भुक्ति-मुक्ति-प्रदायिनीम्।
अनन्ताम्-विजयाम्-शुद्धाम्-शरण्याम्-शिवदाम्-शिवाम् ॥17॥

वियत्-ईकार-संयुक्तम्-वीति-होत्र-समन्वितम्।
अर्ध-इन्दु-लसितम्-देव्याः-बीजम्-सर्व-अर्थ-साधकम् ॥18॥

एवम्-एक-अक्षरम्-ब्रह्म-यतयः-शुद्ध-चेतसः।
ध्यायन्ति-परम-आनन्द-मयाः-ज्ञान-अम्बु-राशयः ॥19॥

वाक्-माया-ब्रह्म-सूः-तस्मात्-षष्ठम्-वक्त्र-समन्वितम्।
सूर्यः-अवाम-श्रोत्र-बिन्दु-संयुक्तः-अष्टात्-तृतीयकः।
नारायणेन-सम्मिश्रः-वायुः-च-अधर-युक्ततः।
विच्चे-नव-अर्णकः-अर्णः-स्यात्-महत्-आनन्द-दायकः ॥20॥

हृत्-पुण्डरीक-मध्य-स्थाम्-प्रातः-सूर्य-सम-प्रभाम्।
पाश-अङ्कुश-धराम्-सौम्याम्-वरद-अभय-हस्त-काम्।
त्रि-नेत्राम्-रक्त-वसनाम्-भक्त-काम-दुघाम्-भजे ॥21॥

नमामि-त्वाम्-महा-देवीम्-महा-भय-विनाशिनीम्।
महा-दुर्ग-प्रशमनीम्-महा-कारुण्य-रूपिणीम् ॥22॥

यस्याः-स्वरूपम्-ब्रह्म-आदयः-न-जानन्ति-तस्मात्-उच्यते-अज्ञेया।
यस्याः-अन्तः-न-लभ्यते-तस्मात्-उच्यते-अनन्ता।
यस्याः-लक्ष्यम्-न-उपलक्ष्यते-तस्मात्-उच्यते-अलक्ष्या।
यस्याः-जननम्-न-उपलभ्यते-तस्मात्-उच्यते-अजा।
एका-एव-सर्वत्र-वर्तते-तस्मात्-उच्यते-एका।
एका-एव-विश्व-रूपिणी-तस्मात्-उच्यते-नैका।
अतः-एव-उच्यते-अज्ञेया-अनन्ता-अलक्ष्या-अजा-एका-नैका-इति ॥23॥

मन्त्राणाम्-मातृका-देवी-शब्दानाम्-ज्ञान-रूपिणी।
ज्ञानानाम्-चिन्मया-अतीता-शून्यानाम्-शून्य-साक्षिणी।
यस्याः-परतरम्-न-अस्ति-सा-एषा-दुर्गा-प्रकीर्तिता ॥24॥

ताम्-दुर्गाम्-दुर्गमाम्-देवीम्-दुराचार-विघातिनीम्।
नमामि-भव-भीतः-अहम्-संसार-अर्णव-तारिणीम् ॥25॥

इदम्-अथर्व-शीर्षम्-यः-अधीते-सः-पञ्च-अथर्व-शीर्ष-जप-फलम्-आप्नोति।
इदम्-अथर्व-शीर्षम्-अज्ञात्वा-यः-अर्चाम्-स्थापयति।
शत-लक्षम्-प्रजप्त्वा-अपि-सः-अर्चा-सिद्धिम्-न-विन्दति।
शतम्-अष्ट-उत्तरम्-च-अस्य-पुरश्चर्या-विधिः-स्मृतः।
दश-वारम्-पठेत्-यः-तु-सद्यः-पापैः-प्रमुच्यते।
महा-दुर्गाणि-तरति-महा-देव्याः-प्रसादतः ॥26॥

सायम्-अधीयानः-दिवस-कृतम्-पापम्-नाशयति।
प्रातः-अधीयानः-रात्रि-कृतम्-पापम्-नाशयति।
सायम्-प्रातः-प्रयुञ्जानः-अपापः-भवति।
निशीथे-तुरीय-संध्यायाम्-जप्त्वा-वाक्-सिद्धिः-भवति।
नूतनायाम्-प्रतिमायाम्-जप्त्वा-देवता-सान्निध्यम्-भवति।
प्राण-प्रतिष्ठायाम्-जप्त्वा-प्राणानाम्-प्रतिष्ठा-भवति।
भौम-अश्विन्याम्-महा-देवी-सन्निधौ-जप्त्वा-महा-मृत्युम्-तरति।
सः-महा-मृत्युम्-तरति।
यः-एवम्-वेद।
इति-उपनिषत् ॥27॥

इति देव्यथर्वशीर्षम् ।

भावार्थ

📖 श्री देव्यथर्वशीर्षम् श्लोकानुसार भावार्थ।।

श्लोक 1
देवता देवी से पूछते हैं — हे महादेवी! आप कौन हैं?
भावार्थ: देवगण आदिशक्ति के वास्तविक स्वरूप को जानना चाहते हैं।
श्लोक 2
देवी कहती हैं — मैं ब्रह्मस्वरूपिणी हूँ। मुझसे ही प्रकृति और पुरुषात्मक यह सारा जगत उत्पन्न हुआ है। मैं शून्य और अशून्य दोनों हूँ।
भावार्थ: देवी ही सृष्टि की मूल शक्ति हैं — वे ही साकार-निर्गुण और शून्य-पूर्ण सब कुछ हैं।
श्लोक 3
मैं आनंद और अनानंद, ज्ञान और अज्ञान, ब्रह्म और अभ्रह्म, पंचमहाभूत और उनसे परे सब कुछ हूँ।
भावार्थ: देवी ही समस्त द्वंद्वों से परे परम सत्ता हैं — वे ही सब रूपों में व्याप्त हैं।
श्लोक 4
मैं वेद और अवेद, विद्या और अविद्या, अजन्मा और जन्मरूप, ऊपर-नीचे और चारों ओर हूँ।
भावार्थ: देवी सर्वव्यापक हैं — ज्ञान-अज्ञान, सृष्टि-स्थिति सब उन्हीं में है।
श्लोक 5–6
मैं रुद्रों, वसुओं, आदित्यों, विश्वदेवों, मित्र-वरुण, इन्द्र-अग्नि, अश्विनीकुमारों, सोम, विष्णु, ब्रह्मा और प्रजापति को धारण करती हूँ।
भावार्थ: सभी देवशक्तियाँ देवी से ही प्रकट हैं — वे ही देवताओं की भी आधारशक्ति हैं।
श्लोक 7
मैं यज्ञ करने वालों को धन देती हूँ, राष्ट्र की संगमनी शक्ति हूँ, सबका पोषण करती हूँ। जो इस रहस्य को जानता है वह देवी की संपदा को प्राप्त करता है।
भावार्थ: देवी ही समृद्धि, राष्ट्रशक्ति और कल्याण की मूलाधार हैं।
श्लोक 8
देवगण कहते हैं — हे महादेवी! आपको बार-बार नमस्कार है। हम प्रकृति और कल्याणमयी देवी को प्रणाम करते हैं।
भावार्थ: देवी ही शिवा, भद्रा और कल्याणमयी शक्ति हैं।
श्लोक 9
हम अग्निवर्णा, तपस्विनी, कर्मफल देने वाली दुर्गा देवी की शरण लेते हैं जो असुरों का नाश करती हैं।
भावार्थ: संकटों से रक्षा करने वाली दुर्गा ही परम शरण हैं।
श्लोक 10
देवी वाणी रूप में प्रकट होती हैं। वे हमें मधुर वाणी और शक्ति प्रदान करें।
भावार्थ: वाणी, ज्ञान और प्रेरणा की शक्ति भी देवी से ही आती है।
श्लोक 11
हम कालरात्रि, वैष्णवी, स्कंदमाता, सरस्वती, अदिति — उन पवित्र शिवा देवी को नमस्कार करते हैं।
भावार्थ: सभी देवियों के रूप एक ही आदिशक्ति के विविध स्वरूप हैं।
श्लोक 12
हम महालक्ष्मी और सर्वशक्ति स्वरूपा देवी का ध्यान करते हैं; वे हमारी बुद्धि को प्रेरित करें।
भावार्थ: देवी ही बुद्धि और समृद्धि की दात्री हैं।
श्लोक 13–14
देवी अदिति रूप में समस्त देवताओं की जननी हैं; वे ही विश्वमाता हैं।
भावार्थ: संपूर्ण सृष्टि की मूल जननी आदिशक्ति ही हैं।
श्लोक 15
वे आत्मशक्ति, विश्वमोहिनी और महाविद्या हैं। जो इसे जानता है वह शोक से पार हो जाता है।
भावार्थ: देवी ज्ञान देने वाली और मोह दूर करने वाली हैं।
श्लोक 16
हे भगवती माता! हमें सर्वत्र से रक्षा करें।
भावार्थ: देवी से सर्वांगिण संरक्षण की प्रार्थना।
श्लोक 17
वे ही वसु, रुद्र, आदित्य, देवता, ग्रह-नक्षत्र, ब्रह्मा-विष्णु-रुद्र सब हैं। वे भुक्ति और मुक्ति देने वाली हैं।
भावार्थ: समस्त देवशक्तियाँ और कालचक्र भी देवी का ही रूप हैं।
श्लोक 18–20
देवी का बीजमंत्र सर्वार्थसाधक है। ज्ञानीजन उसका ध्यान करके परम आनंद प्राप्त करते हैं।
भावार्थ: मंत्र और ध्यान के द्वारा देवी की अनुभूति संभव है।
श्लोक 21–22
हृदय कमल में स्थित, सूर्य के समान प्रकाशमान, त्रिनेत्रा, वरद-अभयदायिनी देवी को प्रणाम।
भावार्थ: देवी करुणामयी और भय का नाश करने वाली हैं।
श्लोक 23
देवी अज्ञेया, अनंता, अलक्ष्या, अजा, एक और अनेक — सब कुछ हैं।
भावार्थ: देवी का स्वरूप अनंत और अवर्णनीय है।
श्लोक 24–25
वे मंत्रों की मातृका, ज्ञानरूपिणी और दुर्गा हैं जो संसार सागर से पार लगाती हैं।
भावार्थ: संसारिक दुखों से मुक्ति देने वाली शक्ति दुर्गा ही हैं।
श्लोक 26–27 (फलश्रुति)
जो इस अथर्वशीर्ष का पाठ करता है वह पापों से मुक्त होता है, संकटों को पार करता है, वाक्सिद्धि प्राप्त करता है और देवी की कृपा से महान मृत्यु को भी जीत लेता है।
भावार्थ: श्रद्धा से पाठ करने पर पापक्षय, संकटमोचन, वाक्सिद्धि और मोक्ष प्राप्त होता है।

पूजन विधि

🔶 पाठ विधि 🔶
1️⃣ शुद्धि एवं तैयारी
प्रातः स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
लाल या पीले आसन पर पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके बैठें।
माँ दुर्गा की मूर्ति, चित्र या यंत्र स्थापित करें।
दीपक (घी का), धूप, पुष्प, अक्षत, नैवेद्य अर्पित करें।
2️⃣ संकल्प
हाथ में जल लेकर मनोकामना या साधना का संकल्प करें।
संकल्प के बाद जल पृथ्वी पर छोड़ दें।
3️⃣ ध्यान
माँ दुर्गा का ध्यान करें — उन्हें तेजस्विनी, त्रिनेत्री, सिंहवाहिनी रूप में स्मरण करें।
4️⃣ पाठ
श्रद्धा और शुद्ध उच्चारण के साथ श्री देव्यथर्वशीर्ष का पाठ करें।
नित्य 1 बार, विशेष साधना में 3, 5 या 11 बार पाठ करें।
नवरात्रि, अष्टमी, चतुर्दशी या शुक्रवार को विशेष फलदायी।
5️⃣ समापन
पाठ के बाद देवी से क्षमा प्रार्थना करें।
आरती करें और प्रसाद वितरित करें।
🌺 विशेष अवसर 🌺
नवरात्रि में प्रतिदिन पाठ अत्यंत शुभ।
संकट या भय की स्थिति में 11 दिन तक निरंतर पाठ करें।
प्राण-प्रतिष्ठा, नई प्रतिमा स्थापना, या गृहप्रवेश में पाठ अत्यंत मंगलकारी।
मध्यरात्रि (निशीथ) में जप करने से वाक्-सिद्धि की प्राप्ति बताई गई है।

लाभ एवं महत्व

🔶 पाठ के लाभ 🔶
🌼 आध्यात्मिक लाभ
आत्मशुद्धि और चित्त की शांति
वाक्-सिद्धि (वाणी में प्रभाव)
आध्यात्मिक जागृति
मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त
🌼 सांसारिक लाभ
भय और संकट से रक्षा
पापों का क्षय
ग्रहबाधा शमन
परिवार में सुख-शांति
साहस और आत्मबल की वृद्धि
🌼 विशेष फल (फलश्रुति अनुसार)
सुबह पाठ से रात्रिकृत पापों का नाश
शाम पाठ से दिवसकृत पापों का नाश
नियमित पाठ से महादुर्ग (बड़े संकट) से मुक्ति
देवी कृपा से अकाल मृत्यु से रक्षा
✨ सार ✨
श्री देव्यथर्वशीर्षम् केवल स्तुति नहीं, बल्कि आदिशक्ति के ब्रह्मस्वरूप का उपनिषद् है। श्रद्धा, शुद्धता और नियमितता से किया गया पाठ जीवन में आध्यात्मिक एवं सांसारिक दोनों प्रकार का कल्याण करता है।