।। सुंदरकांड : तुलसीदास कृत्य।।
।। ॐ श्री गणेशाय नमः।।
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🙏 श्रीजानकीनाथ जी की आरती🙏
जय जानकीनाथ, हो प्रभु जय श्री रघुनाथा।
दोऊ कर जोड़ विनवौं, प्रभु मेरी सुनो बाता॥
तुम रघुनाथ हमारे, प्राण पिता माता।
तुम हो सज्जन संगाती, भक्ति मुक्ति दाता॥
चौरासी प्रभु फंद छुड़ाओ, मिटाओ यम त्रासा।
निश दिन प्रभु मोहि राखो, अपने संग साथा॥
सीताराम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न संग चारों भैया।
जगमग ज्योति विराजत, शोभा अति लहिया॥
हनुमत नाद बजावत, नेवर ठुमकाता।
कंचन थाल आरती, करत कौशल्या माता॥
किरिट मुकुट कर धनुष विराजत, शोभा अति भारी।
तुलसीदास दर्शन कर, पल-पल बलिहारी॥
जय जानकीनाथ, हो प्रभु जय श्री रघुनाथा।
हो प्रभु जय सीता माता, हो प्रभु जय लक्ष्मण भ्राता॥
हो प्रभु जय चारों भ्राता, हो प्रभु जय हनुमत दासा।
दोऊ कर जोड़ विनवौं, प्रभु मेरी सुनो बाता॥
प्रनवउँ पवनकुमार खल बन पावक ग्यानघन ।
जासु ह्रदय आगार बसहिं राम सर चाप धर ॥
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📖 पारायण-विधि
🙏 अथ आवाहन मंत्र
🔸 आवाहन मंत्र
तुलसीक नमस्तुभ्यमिहागच्छ शुचिव्रत।
नैऋत्ये उपविश्येदं पूजनं प्रतिगृह्यताम्॥ १॥
॥ तुलसीदासाय नमः ॥
श्रीवाल्मीके नमस्तुभ्यमिहागच्छ शुभप्रद।
उत्तरपूर्वयोर्मध्ये तिष्ठ गृहाण मेऽर्चनम्॥ २॥
॥ वाल्मीकेय नमः ॥
गौरीपते नमस्तुभ्यमिहागच्छ महेश्वर।
पूर्वदक्षिणयोर्मध्ये तिष्ठ पूजां गृहाण मे॥ ३॥
॥ गौरीपतये नमः ॥
श्रीलक्ष्मण नमस्तुभ्यमिहागच्छ सहप्रिय।
याम्यभागे समातिष्ठ पूजनं संगृहाण मे॥ ४॥
॥ श्रीसपत्नीका लक्ष्मणाय नमः ॥
श्रीशत्रुघ्न नमस्तुभ्यमिहागच्छ सहप्रिय।
पीठस्य पश्चिमे भागे पूजनं स्वीकुरुष्व मे॥ ५॥
॥ श्रीसपत्नीका शत्रुघ्नाय नमः ॥
श्रीभरत नमस्तुभ्यमिहागच्छ सहप्रिय।
पीठकस्योत्तरे भागे तिष्ठ पूजां गृहाण मे॥ ६॥
॥ श्रीसपत्नीका भरताय नमः ॥
श्रीहनुमन्नमस्तुभ्यमिहागच्छ कृपानिधे।
पूर्वभागे समातिष्ठ पूजनं स्वीकुरु प्रभो॥ ७॥
॥ हनुमते नमः ॥
🔸 ध्यान श्लोक
रक्ताम्भोजदलाभिरामनयनं पीताम्बरालंकृतम्।
श्यामाङ्गं द्विभुजं प्रसन्नवदनं श्रीसीतया शोभितम्॥
कारुण्यामृतसागरं प्रियगणैर्भ्रात्रादिभिर्भावितम्।
वन्दे विष्णुशिवादिसेव्यमनिशं भक्तेष्टसिद्धिप्रदम्॥
आगच्छ जानकीनाथ जानक्या सह राघव।
गृहाण मम पूजां च वायुपुत्रादिभिर्युत॥
(इत्यावाहनम्)
🔸 आसन समर्पण
सुवर्णरचितं राम दिव्यास्तरणशोभितम्।
आसनं हि मया दत्तं गृहाण मणिचित्रितम्॥ ११॥
(इति षोडशोपचारैः पूजयेत्)
अस्य श्रीमन्मानस-रामायण-श्रीरामचरितस्य
श्रीशिव-काकभुशुण्डि-याज्ञवल्क्य-गोस्वामी तुलसीदास ऋषयः।
श्रीसीतारामो देवता। श्रीरामनाम बीजम्। भव-रोग-हरी शक्तिः।
मम नियन्त्रिताशेष-विघ्नतया श्रीसीताराम-प्रीत्यर्थं
सकल-मनोरथ-सिद्ध्यर्थं पाठे विनियोगः॥
🔸 आचमन
श्रीसीतारामाभ्यां नमः।
श्रीरामचन्द्राय नमः।
श्रीरामभद्राय नमः।
(इति मन्त्रत्रयेण आचमनं कुर्यात्)
🔸 प्राणायाम
श्रीयुगल-बीजमन्त्रेण प्राणायामं कुर्यात्।
🔸 करन्यास
जग मंगल गुणग्राम राम के।
दानि मुकुति धन धरम धाम के॥
अंगुष्ठाभ्यां नमः।
राम राम कहि जे जमुहाहीं।
तिन्हहि न पाप पुंज समुहाहीं॥
तर्जनीभ्यां नमः।
राम सकल नामन्ह ते अधिका।
होउ नाथ अघ खग गण बधिका॥
तर्जनीभ्यां नमः।
उमा दारु जोषित की नाई।
सबहि नचावत रामु गोसाईं॥
मध्यामाभ्यां नमः।
सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं।
जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥
अनामिकाभ्यां नमः।
मामभिरक्षय रघुकुलनायक।
धृत वर चाप रुचिर कर सायक॥
कनिष्ठिकाभ्यां नमः।
करतल-करपृष्ठाभ्यां नमः।
इति करन्यासः।
🔸 हृदयादि न्यास
जग मंगल गुणग्राम राम के।
दानि मुकुति धन धरम धाम के॥
हृदयाय नमः।
राम राम कहि जे जमुहाहीं।
तिन्हहि न पाप पुंज समुहाहीं॥
शिरसे स्वाहा।
राम सकल नामन्ह ते अधिका।
होउ नाथ अघ खग गण बधिका॥
शिखायै वषट्।
उमा दारु जोषित की नाई।
सबहि नचावत रामु गोसाईं॥
कवचाय हुं।
सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं।
जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥
नेत्राभ्यां वौषट्।
मामभिरक्षय रघुकुलनायक।
धृत वर चाप रुचिर कर सायक॥
अस्त्राय फट्।
इति हृदयादि न्यासः।
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🔸 अथ ध्यानम्
मामवलोक्य पंकज लोचन।
कृपा बिलोकनि सोच बिमोचन॥
नील तामरस श्याम काम अरि।
हृदय कंज मकरंद मधुप हरि॥
जातुधान बरूथ बल भंजन।
मुनि सज्जन रंजन अघ गंजन॥
भूसुर ससि नव बृंद बलाहक।
असरण सरन दीन जन गाहक॥
भुज बल बिपुल भार महि खंडित।
खर दूषण विराध बध पंडित॥
रावणारि सुखरूप भूपबर।
जय दशरथ कुल कुमुद सुधाकर॥
सुजस पुरान बिदित निगमागम।
गावत सुर मुनि संत समागम॥
कारुणीक बलीक मद खंडन।
सब बिधि कुशल कोसला मंडन॥
कलि मल मथन नाम ममताहन।
तुलसीदास प्रभु पाहि प्रणत जन॥
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मनोजवं मारुततुल्यवेगं,
जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं,
श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये॥
मंगल-मूरति मारुत-नंदन। सकल-अमंगल-मूल-निकंदन ॥ १ ॥
पवनतनय संतन हितकारी। ह्रदय बिराजत अवध-बिहारी ॥ २ ॥
मातु-पिता,गुरु,गनपति,सारद। सिवा समेत संभु,सुक,नारद ॥ ३ ॥
चरन बंदि बिनवौं सब काहू। देहु रामपद-नेह-निबाहू ॥ ४ ॥
बंदौं राम-लखन-बैदेही। जे तुलसीके परम सनेही ॥ ५ ॥
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।।किष्किन्धाकाण्ड।।
दोहा : बलि बाँधत प्रभु बाढेउ सो तनु बरनि न जाई।
उभय धरी महँ दीन्ही सात प्रदच्छिन धाइ ॥ 29 ॥
अंगद कहि जाउँ मैं पारा। जियँ संसय कछु फिरती बारा ॥
जामवंत कह तुम्ह सब लायक। पठिअ किमि सब ही कर नायक ॥
कहि रीछपति सुनु हनुमाना। का चुप साधि रहेहु बलवाना ॥
पवन तनय बल पवन समाना। बुधि बिबेक बिग्यान निधाना ॥
कवन सो काज कठिन जग माहीं। जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीम् ॥
राम काज लगि तब अवतारा। सुनतहिं भयु पर्वताकारा ॥
कनक बरन तन तेज बिराजा। मानहु अपर गिरिन्ह कर राजा ॥
सिंहनाद करि बारहिं बारा। लीलहीं नाषुँ जलनिधि खारा ॥
सहित सहाय रावनहि मारी। आनुँ इहाँ त्रिकूट उपारी ॥
जामवंत मैं पूँछुँ तोही। उचित सिखावनु दीजहु मोही ॥
एतना करहु तात तुम्ह जाई। सीतहि देखि कहहु सुधि आई ॥
तब निज भुज बल राजिव नैना। कौतुक लागि संग कपि सेना ॥
छं. -कपि सेन संग सँघारि निसिचर रामु सीतहि आनिहैं।
त्रैलोक पावन सुजसु सुर मुनि नारदादि बखानिहैम् ॥
जो सुनत गावत कहत समुझत परम पद नर पावी।
रघुबीर पद पाथोज मधुकर दास तुलसी गावी ॥
दो. भव भेषज रघुनाथ जसु सुनहि जे नर अरु नारि।
तिन्ह कर सकल मनोरथ सिद्ध करिहि त्रिसिरारि ॥ 30(क) ॥
सो. नीलोत्पल तन स्याम काम कोटि सोभा अधिक।
सुनिअ तासु गुन ग्राम जासु नाम अघ खग बधिक ॥ 30(ख) ॥
।। सुंदरकांड।।
(श्रीजानकीवल्लभो विजयते
श्रीरामचरितमानस
पंचम सोपान)
(सुंदरकांड)
शान्तम्-शाश्वतम्-अप्रमेयम्-अनघम्-निर्वाण-शान्ति-प्रदम् ब्रह्मा-शम्भु-फणीन्द्र-सेव्यम्-अनिशम् वेदान्त-वेद्यम्-विभुम्
राम-आख्यम्-जगत्-ईश्वरम्-सुर-गुरुम्-माया-मनुष्यं-हरिम् वन्दे-अहम्-करुणा-करम्-रघु-वरम्-भूपाल-चूडामणिम् ॥ 1 ॥
न-अन्या-स्पृहा-रघु-पते-हृदये-अस्मदीये सत्यं-वदामि-च-भवान्-अखिल-अन्तर-आत्मा
भक्तिं-प्रयच्छ-रघु-पुंगव-निर्भराम्-मे काम-आदि-दोष-रहितं-कुरु-मानसं-च ॥ 2 ॥
अतुलित-बल-धामम्-हेम-शैल-आभ-देहम् दनुज-वन-कृशानुम्-ज्ञानिनाम्-अग्र-गण्यम्
सकल-गुण-निधानम्-वानराणाम्-अधीशम् रघुपति-प्रिय-भक्तम्-वात-जातम्-नमामि ॥ 3 ॥
जामवंत के बचन सुहाए। सुनि हनुमंत हृदय अति भाए ॥
तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई। सहि दुख कंद मूल फल खाई ॥
जब लगि आवौं सीतहि देखी। होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी ॥
यह कहि नाइ सबन्हि कहुँ माथा। चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा ॥
सिंधु तीर एक भूधर सुंदर। कौतुक कूदि चढ़एउ ता ऊपर ॥
बार बार रघुबीर सँभारी। तरकेउ पवनतनय बल भारी ॥
जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता। चलेउ सो गा पाताल तुरंता ॥
जिमि अमोघ रघुपति कर बाना। एही भाँति चलेउ हनुमाना ॥
जलनिधि रघुपति दूत बिचारी। तैं मैनाक होहि श्रमहारी ॥
दो. हनूमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम।
राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम ॥ 1 ॥
जात पवनसुत देवन्ह देखा। जानैं कहुँ बल बुद्धि बिसेषा ॥
सुरसा नाम अहिन्ह कै माता। पठिन्हि आइ कही तेहिं बाता ॥
आजु सुरन्ह मोहि दीन्ह अहारा। सुनत बचन कह पवनकुमारा ॥
राम काजु करि फिरि मैं आवौं। सीता कि सुधि प्रभुहि सुनावौम् ॥
तब तव बदन पैठिहुँ आई। सत्य कहुँ मोहि जान दे माई ॥
कबनेहुँ जतन देइ नहिं जाना। ग्रससि न मोहि कहेउ हनुमाना ॥
जोजन भरि तेहिं बदनु पसारा। कपि तनु कीन्ह दुगुन बिस्तारा ॥
सोरह जोजन मुख तेहिं ठयू। तुरत पवनसुत बत्तिस भयू ॥
जस जस सुरसा बदनु बढ़आवा। तासु दून कपि रूप देखावा ॥
सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा। अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा ॥
बदन पिठि पुनि बाहेर आवा। मागा बिदा ताहि सिरु नावा ॥
मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा। बुधि बल मरमु तोर मै पावा ॥
दो. राम काजु सबु करिहहु तुम्ह बल बुद्धि निधान।
आसिष देह गी सो हरषि चलेउ हनुमान ॥ 2 ॥
निसिचरि एक सिंधु महुँ रही। करि माया नभु के खग गही ॥
जीव जंतु जे गगन उड़आहीं। जल बिलोकि तिन्ह कै परिछाहीम् ॥
गहि छाहँ सक सो न उड़आई। एहि बिधि सदा गगनचर खाई ॥
सोइ छल हनूमान कहँ कीन्हा। तासु कपटु कपि तुरतहिं चीन्हा ॥
ताहि मारि मारुतसुत बीरा। बारिधि पार गयु मतिधीरा ॥
तहाँ जाइ देखी बन सोभा। गुंजत चंचरीक मधु लोभा ॥
नाना तरु फल फूल सुहाए। खग मृग बृंद देखि मन भाए ॥
सैल बिसाल देखि एक आगें। ता पर धाइ चढेउ भय त्यागेम् ॥
उमा न कछु कपि कै अधिकाई। प्रभु प्रताप जो कालहि खाई ॥
गिरि पर चढि लंका तेहिं देखी। कहि न जाइ अति दुर्ग बिसेषी ॥
अति उतंग जलनिधि चहु पासा। कनक कोट कर परम प्रकासा ॥
छं=कनक कोट बिचित्र मनि कृत सुंदरायतना घना।
चुहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथीं चारु पुर बहु बिधि बना ॥
गज बाजि खच्चर निकर पदचर रथ बरूथिन्ह को गनै ॥
बहुरूप निसिचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहिं बनै ॥ 1 ॥
बन बाग उपबन बाटिका सर कूप बापीं सोहहीं।
नर नाग सुर गंधर्ब कन्या रूप मुनि मन मोहहीम् ॥
कहुँ माल देह बिसाल सैल समान अतिबल गर्जहीं।
नाना अखारेन्ह भिरहिं बहु बिधि एक एकन्ह तर्जहीम् ॥ 2 ॥
करि जतन भट कोटिन्ह बिकट तन नगर चहुँ दिसि रच्छहीं।
कहुँ महिष मानषु धेनु खर अज खल निसाचर भच्छहीम् ॥
एहि लागि तुलसीदास इन्ह की कथा कछु एक है कही।
रघुबीर सर तीरथ सरीरन्हि त्यागि गति पैहहिं सही ॥ 3 ॥
दो. पुर रखवारे देखि बहु कपि मन कीन्ह बिचार।
अति लघु रूप धरौं निसि नगर करौं पिसार ॥ 3 ॥
मसक समान रूप कपि धरी। लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी ॥
नाम लंकिनी एक निसिचरी। सो कह चलेसि मोहि निंदरी ॥
जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा। मोर अहार जहाँ लगि चोरा ॥
मुठिका एक महा कपि हनी। रुधिर बमत धरनीं ढनमनी ॥
पुनि संभारि उठि सो लंका। जोरि पानि कर बिनय संसका ॥
जब रावनहि ब्रह्म बर दीन्हा। चलत बिरंचि कहा मोहि चीन्हा ॥
बिकल होसि तैं कपि कें मारे। तब जानेसु निसिचर संघारे ॥
तात मोर अति पुन्य बहूता। देखेउँ नयन राम कर दूता ॥
दो. तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग।
तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग ॥ 4 ॥
प्रबिसि नगर कीजे सब काजा। हृदयँ राखि कौसलपुर राजा ॥
गरल सुधा रिपु करहिं मिताई। गोपद सिंधु अनल सितलाई ॥
गरुड़ सुमेरु रेनू सम ताही। राम कृपा करि चितवा जाही ॥
अति लघु रूप धरेउ हनुमाना। पैठा नगर सुमिरि भगवाना ॥
मंदिर मंदिर प्रति करि सोधा। देखे जहँ तहँ अगनित जोधा ॥
गयु दसानन मंदिर माहीं। अति बिचित्र कहि जात सो नाहीम् ॥
सयन किए देखा कपि तेही। मंदिर महुँ न दीखि बैदेही ॥
भवन एक पुनि दीख सुहावा। हरि मंदिर तहँ भिन्न बनावा ॥
दो. रामायुध अंकित गृह सोभा बरनि न जाइ।
नव तुलसिका बृंद तहँ देखि हरषि कपिराइ ॥ 5 ॥
लंका निसिचर निकर निवासा। इहाँ कहाँ सज्जन कर बासा ॥
मन महुँ तरक करै कपि लागा। तेहीं समय बिभीषनु जागा ॥
राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा। हृदयँ हरष कपि सज्जन चीन्हा ॥
एहि सन हठि करिहुँ पहिचानी। साधु ते होइ न कारज हानी ॥
बिप्र रुप धरि बचन सुनाए। सुनत बिभीषण उठि तहँ आए ॥
करि प्रनाम पूँछी कुसलाई। बिप्र कहहु निज कथा बुझाई ॥
की तुम्ह हरि दासन्ह महँ कोई। मोरें हृदय प्रीति अति होई ॥
की तुम्ह रामु दीन अनुरागी। आयहु मोहि करन बड़भागी ॥
दो. तब हनुमंत कही सब राम कथा निज नाम।
सुनत जुगल तन पुलक मन मगन सुमिरि गुन ग्राम ॥ 6 ॥
सुनहु पवनसुत रहनि हमारी। जिमि दसनन्हि महुँ जीभ बिचारी ॥
तात कबहुँ मोहि जानि अनाथा। करिहहिं कृपा भानुकुल नाथा ॥
तामस तनु कछु साधन नाहीं। प्रीति न पद सरोज मन माहीम् ॥
अब मोहि भा भरोस हनुमंता। बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता ॥
जौ रघुबीर अनुग्रह कीन्हा। तौ तुम्ह मोहि दरसु हठि दीन्हा ॥
सुनहु बिभीषन प्रभु कै रीती। करहिं सदा सेवक पर प्रीती ॥
कहहु कवन मैं परम कुलीना। कपि चंचल सबहीं बिधि हीना ॥
प्रात लेइ जो नाम हमारा। तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा ॥
दो. अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर।
कीन्ही कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर ॥ 7 ॥
जानतहूँ अस स्वामि बिसारी। फिरहिं ते काहे न होहिं दुखारी ॥
एहि बिधि कहत राम गुन ग्रामा। पावा अनिर्बाच्य बिश्रामा ॥
पुनि सब कथा बिभीषन कही। जेहि बिधि जनकसुता तहँ रही ॥
तब हनुमंत कहा सुनु भ्राता। देखी चहुँ जानकी माता ॥
जुगुति बिभीषन सकल सुनाई। चलेउ पवनसुत बिदा कराई ॥
करि सोइ रूप गयु पुनि तहवाँ। बन असोक सीता रह जहवाँ ॥
देखि मनहि महुँ कीन्ह प्रनामा। बैठेहिं बीति जात निसि जामा ॥
कृस तन सीस जटा एक बेनी। जपति हृदयँ रघुपति गुन श्रेनी ॥
दो. निज पद नयन दिएँ मन राम पद कमल लीन।
परम दुखी भा पवनसुत देखि जानकी दीन ॥ 8 ॥
तरु पल्लव महुँ रहा लुकाई। करि बिचार करौं का भाई ॥
तेहि अवसर रावनु तहँ आवा। संग नारि बहु किएँ बनावा ॥
बहु बिधि खल सीतहि समुझावा। साम दान भय भेद देखावा ॥
कह रावनु सुनु सुमुखि सयानी। मंदोदरी आदि सब रानी ॥
तव अनुचरीं करुँ पन मोरा। एक बार बिलोकु मम ओरा ॥
तृन धरि ओट कहति बैदेही। सुमिरि अवधपति परम सनेही ॥
सुनु दसमुख खद्योत प्रकासा। कबहुँ कि नलिनी करि बिकासा ॥
अस मन समुझु कहति जानकी। खल सुधि नहिं रघुबीर बान की ॥
सठ सूने हरि आनेहि मोहि। अधम निलज्ज लाज नहिं तोही ॥
दो. आपुहि सुनि खद्योत सम रामहि भानु समान।
परुष बचन सुनि काढ़इ असि बोला अति खिसिआन ॥ 9 ॥
सीता तैं मम कृत अपमाना। कटिहुँ तव सिर कठिन कृपाना ॥
नाहिं त सपदि मानु मम बानी। सुमुखि होति न त जीवन हानी ॥
स्याम सरोज दाम सम सुंदर। प्रभु भुज करि कर सम दसकंधर ॥
सो भुज कंठ कि तव असि घोरा। सुनु सठ अस प्रवान पन मोरा ॥
चंद्रहास हरु मम परितापं। रघुपति बिरह अनल संजातम् ॥
सीतल निसित बहसि बर धारा। कह सीता हरु मम दुख भारा ॥
सुनत बचन पुनि मारन धावा। मयतनयाँ कहि नीति बुझावा ॥
कहेसि सकल निसिचरिन्ह बोलाई। सीतहि बहु बिधि त्रासहु जाई ॥
मास दिवस महुँ कहा न माना। तौ मैं मारबि काढ़इ कृपाना ॥
दो. भवन गयु दसकंधर इहाँ पिसाचिनि बृंद।
सीतहि त्रास देखावहि धरहिं रूप बहु मंद ॥ 10 ॥
त्रिजटा नाम राच्छसी एका। राम चरन रति निपुन बिबेका ॥
सबन्हौ बोलि सुनाएसि सपना। सीतहि सेइ करहु हित अपना ॥
सपनें बानर लंका जारी। जातुधान सेना सब मारी ॥
खर आरूढ़ नगन दससीसा। मुंडित सिर खंडित भुज बीसा ॥
एहि बिधि सो दच्छिन दिसि जाई। लंका मनहुँ बिभीषन पाई ॥
नगर फिरी रघुबीर दोहाई। तब प्रभु सीता बोलि पठाई ॥
यह सपना में कहुँ पुकारी। होइहि सत्य गेँ दिन चारी ॥
तासु बचन सुनि ते सब डरीं। जनकसुता के चरनन्हि परीम् ॥
दो. जहँ तहँ गीं सकल तब सीता कर मन सोच।
मास दिवस बीतें मोहि मारिहि निसिचर पोच ॥ 11 ॥
त्रिजटा सन बोली कर जोरी। मातु बिपति संगिनि तैं मोरी ॥
तजौं देह करु बेगि उपाई। दुसहु बिरहु अब नहिं सहि जाई ॥
आनि काठ रचु चिता बनाई। मातु अनल पुनि देहि लगाई ॥
सत्य करहि मम प्रीति सयानी। सुनै को श्रवन सूल सम बानी ॥
सुनत बचन पद गहि समुझाएसि। प्रभु प्रताप बल सुजसु सुनाएसि ॥
निसि न अनल मिल सुनु सुकुमारी। अस कहि सो निज भवन सिधारी ॥
कह सीता बिधि भा प्रतिकूला। मिलहि न पावक मिटिहि न सूला ॥
देखिअत प्रगट गगन अंगारा। अवनि न आवत एकु तारा ॥
पावकमय ससि स्त्रवत न आगी। मानहुँ मोहि जानि हतभागी ॥
सुनहि बिनय मम बिटप असोका। सत्य नाम करु हरु मम सोका ॥
नूतन किसलय अनल समाना। देहि अगिनि जनि करहि निदाना ॥
देखि परम बिरहाकुल सीता। सो छन कपिहि कलप सम बीता ॥
सो. कपि करि हृदयँ बिचार दीन्हि मुद्रिका डारी तब।
जनु असोक अंगार दीन्हि हरषि उठि कर गहेउ ॥ 12 ॥
तब देखी मुद्रिका मनोहर। राम नाम अंकित अति सुंदर ॥
चकित चितव मुदरी पहिचानी। हरष बिषाद हृदयँ अकुलानी ॥
जीति को सकि अजय रघुराई। माया तें असि रचि नहिं जाई ॥
सीता मन बिचार कर नाना। मधुर बचन बोलेउ हनुमाना ॥
रामचंद्र गुन बरनैं लागा। सुनतहिं सीता कर दुख भागा ॥
लागीं सुनैं श्रवन मन लाई। आदिहु तें सब कथा सुनाई ॥
श्रवनामृत जेहिं कथा सुहाई। कहि सो प्रगट होति किन भाई ॥
तब हनुमंत निकट चलि गयू। फिरि बैंठीं मन बिसमय भयू ॥
राम दूत मैं मातु जानकी। सत्य सपथ करुनानिधान की ॥
यह मुद्रिका मातु मैं आनी। दीन्हि राम तुम्ह कहँ सहिदानी ॥
नर बानरहि संग कहु कैसें। कहि कथा भि संगति जैसेम् ॥
दो. कपि के बचन सप्रेम सुनि उपजा मन बिस्वास ॥
जाना मन क्रम बचन यह कृपासिंधु कर दास ॥ 13 ॥
हरिजन जानि प्रीति अति गाढ़ई। सजल नयन पुलकावलि बाढ़ई ॥
बूड़त बिरह जलधि हनुमाना। भयु तात मों कहुँ जलजाना ॥
अब कहु कुसल जाउँ बलिहारी। अनुज सहित सुख भवन खरारी ॥
कोमलचित कृपाल रघुराई। कपि केहि हेतु धरी निठुराई ॥
सहज बानि सेवक सुख दायक। कबहुँक सुरति करत रघुनायक ॥
कबहुँ नयन मम सीतल ताता। होइहहि निरखि स्याम मृदु गाता ॥
बचनु न आव नयन भरे बारी। अहह नाथ हौं निपट बिसारी ॥
देखि परम बिरहाकुल सीता। बोला कपि मृदु बचन बिनीता ॥
मातु कुसल प्रभु अनुज समेता। तव दुख दुखी सुकृपा निकेता ॥
जनि जननी मानहु जियँ ऊना। तुम्ह ते प्रेमु राम कें दूना ॥
दो. रघुपति कर संदेसु अब सुनु जननी धरि धीर।
अस कहि कपि गद गद भयु भरे बिलोचन नीर ॥ 14 ॥
कहेउ राम बियोग तव सीता। मो कहुँ सकल भे बिपरीता ॥
नव तरु किसलय मनहुँ कृसानू। कालनिसा सम निसि ससि भानू ॥
कुबलय बिपिन कुंत बन सरिसा। बारिद तपत तेल जनु बरिसा ॥
जे हित रहे करत तेइ पीरा। उरग स्वास सम त्रिबिध समीरा ॥
कहेहू तें कछु दुख घटि होई। काहि कहौं यह जान न कोई ॥
तत्त्व प्रेम कर मम अरु तोरा। जानत प्रिया एकु मनु मोरा ॥
सो मनु सदा रहत तोहि पाहीं। जानु प्रीति रसु एतेनहि माहीम् ॥
प्रभु संदेसु सुनत बैदेही। मगन प्रेम तन सुधि नहिं तेही ॥
कह कपि हृदयँ धीर धरु माता। सुमिरु राम सेवक सुखदाता ॥
उर आनहु रघुपति प्रभुताई। सुनि मम बचन तजहु कदराई ॥
दो. निसिचर निकर पतंग सम रघुपति बान कृसानु।
जननी हृदयँ धीर धरु जरे निसाचर जानु ॥ 15 ॥
जौं रघुबीर होति सुधि पाई। करते नहिं बिलंबु रघुराई ॥
रामबान रबि उएँ जानकी। तम बरूथ कहँ जातुधान की ॥
अबहिं मातु मैं जाउँ लवाई। प्रभु आयसु नहिं राम दोहाई ॥
कछुक दिवस जननी धरु धीरा। कपिन्ह सहित ऐहहिं रघुबीरा ॥
निसिचर मारि तोहि लै जैहहिं। तिहुँ पुर नारदादि जसु गैहहिम् ॥
हैं सुत कपि सब तुम्हहि समाना। जातुधान अति भट बलवाना ॥
मोरें हृदय परम संदेहा। सुनि कपि प्रगट कीन्ह निज देहा ॥
कनक भूधराकार सरीरा। समर भयंकर अतिबल बीरा ॥
सीता मन भरोस तब भयू। पुनि लघु रूप पवनसुत लयू ॥
दो. सुनु माता साखामृग नहिं बल बुद्धि बिसाल।
प्रभु प्रताप तें गरुड़हि खाइ परम लघु ब्याल ॥ 16 ॥
मन संतोष सुनत कपि बानी। भगति प्रताप तेज बल सानी ॥
आसिष दीन्हि रामप्रिय जाना। होहु तात बल सील निधाना ॥
अजर अमर गुननिधि सुत होहू। करहुँ बहुत रघुनायक छोहू ॥
करहुँ कृपा प्रभु अस सुनि काना। निर्भर प्रेम मगन हनुमाना ॥
बार बार नाएसि पद सीसा। बोला बचन जोरि कर कीसा ॥
अब कृतकृत्य भयुँ मैं माता। आसिष तव अमोघ बिख्याता ॥
सुनहु मातु मोहि अतिसय भूखा। लागि देखि सुंदर फल रूखा ॥
सुनु सुत करहिं बिपिन रखवारी। परम सुभट रजनीचर भारी ॥
तिन्ह कर भय माता मोहि नाहीं। जौं तुम्ह सुख मानहु मन माहीम् ॥
दो. देखि बुद्धि बल निपुन कपि कहेउ जानकीं जाहु।
रघुपति चरन हृदयँ धरि तात मधुर फल खाहु ॥ 17 ॥
चलेउ नाइ सिरु पैठेउ बागा। फल खाएसि तरु तोरैं लागा ॥
रहे तहाँ बहु भट रखवारे। कछु मारेसि कछु जाइ पुकारे ॥
नाथ एक आवा कपि भारी। तेहिं असोक बाटिका उजारी ॥
खाएसि फल अरु बिटप उपारे। रच्छक मर्दि मर्दि महि डारे ॥
सुनि रावन पठे भट नाना। तिन्हहि देखि गर्जेउ हनुमाना ॥
सब रजनीचर कपि संघारे। गे पुकारत कछु अधमारे ॥
पुनि पठयु तेहिं अच्छकुमारा। चला संग लै सुभट अपारा ॥
आवत देखि बिटप गहि तर्जा। ताहि निपाति महाधुनि गर्जा ॥
दो. कछु मारेसि कछु मर्देसि कछु मिलेसि धरि धूरि।
कछु पुनि जाइ पुकारे प्रभु मर्कट बल भूरि ॥ 18 ॥
सुनि सुत बध लंकेस रिसाना। पठेसि मेघनाद बलवाना ॥
मारसि जनि सुत बांधेसु ताही। देखिअ कपिहि कहाँ कर आही ॥
चला इंद्रजित अतुलित जोधा। बंधु निधन सुनि उपजा क्रोधा ॥
कपि देखा दारुन भट आवा। कटकटाइ गर्जा अरु धावा ॥
अति बिसाल तरु एक उपारा। बिरथ कीन्ह लंकेस कुमारा ॥
रहे महाभट ताके संगा। गहि गहि कपि मर्दि निज अंगा ॥
तिन्हहि निपाति ताहि सन बाजा। भिरे जुगल मानहुँ गजराजा।
मुठिका मारि चढ़आ तरु जाई। ताहि एक छन मुरुछा आई ॥
उठि बहोरि कीन्हिसि बहु माया। जीति न जाइ प्रभंजन जाया ॥
दो. ब्रह्म अस्त्र तेहिं साँधा कपि मन कीन्ह बिचार।
जौं न ब्रह्मसर मानुँ महिमा मिटि अपार ॥ 19 ॥
ब्रह्मबान कपि कहुँ तेहि मारा। परतिहुँ बार कटकु संघारा ॥
तेहि देखा कपि मुरुछित भयू। नागपास बाँधेसि लै गयू ॥
जासु नाम जपि सुनहु भवानी। भव बंधन काटहिं नर ग्यानी ॥
तासु दूत कि बंध तरु आवा। प्रभु कारज लगि कपिहिं बँधावा ॥
कपि बंधन सुनि निसिचर धाए। कौतुक लागि सभाँ सब आए ॥
दसमुख सभा दीखि कपि जाई। कहि न जाइ कछु अति प्रभुताई ॥
कर जोरें सुर दिसिप बिनीता। भृकुटि बिलोकत सकल सभीता ॥
देखि प्रताप न कपि मन संका। जिमि अहिगन महुँ गरुड़ असंका ॥
दो. कपिहि बिलोकि दसानन बिहसा कहि दुर्बाद।
सुत बध सुरति कीन्हि पुनि उपजा हृदयँ बिषाद ॥ 20 ॥
कह लंकेस कवन तैं कीसा। केहिं के बल घालेहि बन खीसा ॥
की धौं श्रवन सुनेहि नहिं मोही। देखुँ अति असंक सठ तोही ॥
मारे निसिचर केहिं अपराधा। कहु सठ तोहि न प्रान कि बाधा ॥
सुन रावन ब्रह्मांड निकाया। पाइ जासु बल बिरचित माया ॥
जाकें बल बिरंचि हरि ईसा। पालत सृजत हरत दससीसा।
जा बल सीस धरत सहसानन। अंडकोस समेत गिरि कानन ॥
धरि जो बिबिध देह सुरत्राता। तुम्ह ते सठन्ह सिखावनु दाता।
हर कोदंड कठिन जेहि भंजा। तेहि समेत नृप दल मद गंजा ॥
खर दूषन त्रिसिरा अरु बाली। बधे सकल अतुलित बलसाली ॥
दो. जाके बल लवलेस तें जितेहु चराचर झारि।
तासु दूत मैं जा करि हरि आनेहु प्रिय नारि ॥ 21 ॥
जानुँ मैं तुम्हारि प्रभुताई। सहसबाहु सन परी लराई ॥
समर बालि सन करि जसु पावा। सुनि कपि बचन बिहसि बिहरावा ॥
खायुँ फल प्रभु लागी भूँखा। कपि सुभाव तें तोरेउँ रूखा ॥
सब कें देह परम प्रिय स्वामी। मारहिं मोहि कुमारग गामी ॥
जिन्ह मोहि मारा ते मैं मारे। तेहि पर बाँधेउ तनयँ तुम्हारे ॥
मोहि न कछु बाँधे कि लाजा। कीन्ह चहुँ निज प्रभु कर काजा ॥
बिनती करुँ जोरि कर रावन। सुनहु मान तजि मोर सिखावन ॥
देखहु तुम्ह निज कुलहि बिचारी। भ्रम तजि भजहु भगत भय हारी ॥
जाकें डर अति काल डेराई। जो सुर असुर चराचर खाई ॥
तासों बयरु कबहुँ नहिं कीजै। मोरे कहें जानकी दीजै ॥
दो. प्रनतपाल रघुनायक करुना सिंधु खरारि।
गेँ सरन प्रभु राखिहैं तव अपराध बिसारि ॥ 22 ॥
राम चरन पंकज उर धरहू। लंका अचल राज तुम्ह करहू ॥
रिषि पुलिस्त जसु बिमल मंयका। तेहि ससि महुँ जनि होहु कलंका ॥
राम नाम बिनु गिरा न सोहा। देखु बिचारि त्यागि मद मोहा ॥
बसन हीन नहिं सोह सुरारी। सब भूषण भूषित बर नारी ॥
राम बिमुख संपति प्रभुताई। जाइ रही पाई बिनु पाई ॥
सजल मूल जिन्ह सरितन्ह नाहीं। बरषि गे पुनि तबहिं सुखाहीम् ॥
सुनु दसकंठ कहुँ पन रोपी। बिमुख राम त्राता नहिं कोपी ॥
संकर सहस बिष्नु अज तोही। सकहिं न राखि राम कर द्रोही ॥
दो. मोहमूल बहु सूल प्रद त्यागहु तम अभिमान।
भजहु राम रघुनायक कृपा सिंधु भगवान ॥ 23 ॥
जदपि कहि कपि अति हित बानी। भगति बिबेक बिरति नय सानी ॥
बोला बिहसि महा अभिमानी। मिला हमहि कपि गुर बड़ ग्यानी ॥
मृत्यु निकट आई खल तोही। लागेसि अधम सिखावन मोही ॥
उलटा होइहि कह हनुमाना। मतिभ्रम तोर प्रगट मैं जाना ॥
सुनि कपि बचन बहुत खिसिआना। बेगि न हरहुँ मूढ़ कर प्राना ॥
सुनत निसाचर मारन धाए। सचिवन्ह सहित बिभीषनु आए।
नाइ सीस करि बिनय बहूता। नीति बिरोध न मारिअ दूता ॥
आन दंड कछु करिअ गोसाँई। सबहीं कहा मंत्र भल भाई ॥
सुनत बिहसि बोला दसकंधर। अंग भंग करि पठिअ बंदर ॥
दो. कपि कें ममता पूँछ पर सबहि कहुँ समुझाइ।
तेल बोरि पट बाँधि पुनि पावक देहु लगाइ ॥ 24 ॥
पूँछहीन बानर तहँ जाइहि। तब सठ निज नाथहि लि आइहि ॥
जिन्ह कै कीन्हसि बहुत बड़आई। देखेउँûमैं तिन्ह कै प्रभुताई ॥
बचन सुनत कपि मन मुसुकाना। भि सहाय सारद मैं जाना ॥
जातुधान सुनि रावन बचना। लागे रचैं मूढ़ सोइ रचना ॥
रहा न नगर बसन घृत तेला। बाढ़ई पूँछ कीन्ह कपि खेला ॥
कौतुक कहँ आए पुरबासी। मारहिं चरन करहिं बहु हाँसी ॥
बाजहिं ढोल देहिं सब तारी। नगर फेरि पुनि पूँछ प्रजारी ॥
पावक जरत देखि हनुमंता। भयु परम लघु रुप तुरंता ॥
निबुकि चढ़एउ कपि कनक अटारीं। भी सभीत निसाचर नारीम् ॥
दो. हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास।
अट्टहास करि गर्ज़आ कपि बढ़इ लाग अकास ॥ 25 ॥
देह बिसाल परम हरुआई। मंदिर तें मंदिर चढ़ धाई ॥
जरि नगर भा लोग बिहाला। झपट लपट बहु कोटि कराला ॥
तात मातु हा सुनिअ पुकारा। एहि अवसर को हमहि उबारा ॥
हम जो कहा यह कपि नहिं होई। बानर रूप धरें सुर कोई ॥
साधु अवग्या कर फलु ऐसा। जरि नगर अनाथ कर जैसा ॥
जारा नगरु निमिष एक माहीं। एक बिभीषन कर गृह नाहीम् ॥
ता कर दूत अनल जेहिं सिरिजा। जरा न सो तेहि कारन गिरिजा ॥
उलटि पलटि लंका सब जारी। कूदि परा पुनि सिंधु मझारी ॥
दो. पूँछ बुझाइ खोइ श्रम धरि लघु रूप बहोरि।
जनकसुता के आगें ठाढ़ भयु कर जोरि ॥ 26 ॥
मातु मोहि दीजे कछु चीन्हा। जैसें रघुनायक मोहि दीन्हा ॥
चूड़आमनि उतारि तब दयू। हरष समेत पवनसुत लयू ॥
कहेहु तात अस मोर प्रनामा। सब प्रकार प्रभु पूरनकामा ॥
दीन दयाल बिरिदु संभारी। हरहु नाथ मम संकट भारी ॥
तात सक्रसुत कथा सुनाएहु। बान प्रताप प्रभुहि समुझाएहु ॥
मास दिवस महुँ नाथु न आवा। तौ पुनि मोहि जिअत नहिं पावा ॥
कहु कपि केहि बिधि राखौं प्राना। तुम्हहू तात कहत अब जाना ॥
तोहि देखि सीतलि भि छाती। पुनि मो कहुँ सोइ दिनु सो राती ॥
दो. जनकसुतहि समुझाइ करि बहु बिधि धीरजु दीन्ह।
चरन कमल सिरु नाइ कपि गवनु राम पहिं कीन्ह ॥ 27 ॥
चलत महाधुनि गर्जेसि भारी। गर्भ स्त्रवहिं सुनि निसिचर नारी ॥
नाघि सिंधु एहि पारहि आवा। सबद किलकिला कपिन्ह सुनावा ॥
हरषे सब बिलोकि हनुमाना। नूतन जन्म कपिन्ह तब जाना ॥
मुख प्रसन्न तन तेज बिराजा। कीन्हेसि रामचंद्र कर काजा ॥
मिले सकल अति भे सुखारी। तलफत मीन पाव जिमि बारी ॥
चले हरषि रघुनायक पासा। पूँछत कहत नवल इतिहासा ॥
तब मधुबन भीतर सब आए। अंगद संमत मधु फल खाए ॥
रखवारे जब बरजन लागे। मुष्टि प्रहार हनत सब भागे ॥
दो. जाइ पुकारे ते सब बन उजार जुबराज।
सुनि सुग्रीव हरष कपि करि आए प्रभु काज ॥ 28 ॥
जौं न होति सीता सुधि पाई। मधुबन के फल सकहिं कि खाई ॥
एहि बिधि मन बिचार कर राजा। आइ गे कपि सहित समाजा ॥
आइ सबन्हि नावा पद सीसा। मिलेउ सबन्हि अति प्रेम कपीसा ॥
पूँछी कुसल कुसल पद देखी। राम कृपाँ भा काजु बिसेषी ॥
नाथ काजु कीन्हेउ हनुमाना। राखे सकल कपिन्ह के प्राना ॥
सुनि सुग्रीव बहुरि तेहि मिलेऊ। कपिन्ह सहित रघुपति पहिं चलेऊ।
राम कपिन्ह जब आवत देखा। किएँ काजु मन हरष बिसेषा ॥
फटिक सिला बैठे द्वौ भाई। परे सकल कपि चरनन्हि जाई ॥
दो. प्रीति सहित सब भेटे रघुपति करुना पुंज।
पूँछी कुसल नाथ अब कुसल देखि पद कंज ॥ 29 ॥
जामवंत कह सुनु रघुराया। जा पर नाथ करहु तुम्ह दाया ॥
ताहि सदा सुभ कुसल निरंतर। सुर नर मुनि प्रसन्न ता ऊपर ॥
सोइ बिजी बिनी गुन सागर। तासु सुजसु त्रेलोक उजागर ॥
प्रभु कीं कृपा भयु सबु काजू। जन्म हमार सुफल भा आजू ॥
नाथ पवनसुत कीन्हि जो करनी। सहसहुँ मुख न जाइ सो बरनी ॥
पवनतनय के चरित सुहाए। जामवंत रघुपतिहि सुनाए ॥
सुनत कृपानिधि मन अति भाए। पुनि हनुमान हरषि हियँ लाए ॥
कहहु तात केहि भाँति जानकी। रहति करति रच्छा स्वप्रान की ॥
दो. नाम पाहरु दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट।
लोचन निज पद जंत्रित जाहिं प्रान केहिं बाट ॥ 30 ॥
चलत मोहि चूड़आमनि दीन्ही। रघुपति हृदयँ लाइ सोइ लीन्ही ॥
नाथ जुगल लोचन भरि बारी। बचन कहे कछु जनककुमारी ॥
अनुज समेत गहेहु प्रभु चरना। दीन बंधु प्रनतारति हरना ॥
मन क्रम बचन चरन अनुरागी। केहि अपराध नाथ हौं त्यागी ॥
अवगुन एक मोर मैं माना। बिछुरत प्रान न कीन्ह पयाना ॥
नाथ सो नयनन्हि को अपराधा। निसरत प्रान करिहिं हठि बाधा ॥
बिरह अगिनि तनु तूल समीरा। स्वास जरि छन माहिं सरीरा ॥
नयन स्त्रवहि जलु निज हित लागी। जरैं न पाव देह बिरहागी।
सीता के अति बिपति बिसाला। बिनहिं कहें भलि दीनदयाला ॥
दो. निमिष निमिष करुनानिधि जाहिं कलप सम बीति।
बेगि चलिय प्रभु आनिअ भुज बल खल दल जीति ॥ 31 ॥
सुनि सीता दुख प्रभु सुख अयना। भरि आए जल राजिव नयना ॥
बचन काँय मन मम गति जाही। सपनेहुँ बूझिअ बिपति कि ताही ॥
कह हनुमंत बिपति प्रभु सोई। जब तव सुमिरन भजन न होई ॥
केतिक बात प्रभु जातुधान की। रिपुहि जीति आनिबी जानकी ॥
सुनु कपि तोहि समान उपकारी। नहिं कौ सुर नर मुनि तनुधारी ॥
प्रति उपकार करौं का तोरा। सनमुख होइ न सकत मन मोरा ॥
सुनु सुत उरिन मैं नाहीं। देखेउँ करि बिचार मन माहीम् ॥
पुनि पुनि कपिहि चितव सुरत्राता। लोचन नीर पुलक अति गाता ॥
दो. सुनि प्रभु बचन बिलोकि मुख गात हरषि हनुमंत।
चरन परेउ प्रेमाकुल त्राहि त्राहि भगवंत ॥ 32 ॥
बार बार प्रभु चहि उठावा। प्रेम मगन तेहि उठब न भावा ॥
प्रभु कर पंकज कपि कें सीसा। सुमिरि सो दसा मगन गौरीसा ॥
सावधान मन करि पुनि संकर। लागे कहन कथा अति सुंदर ॥
कपि उठाइ प्रभु हृदयँ लगावा। कर गहि परम निकट बैठावा ॥
कहु कपि रावन पालित लंका। केहि बिधि दहेउ दुर्ग अति बंका ॥
प्रभु प्रसन्न जाना हनुमाना। बोला बचन बिगत अभिमाना ॥
साखामृग के बड़इ मनुसाई। साखा तें साखा पर जाई ॥
नाघि सिंधु हाटकपुर जारा। निसिचर गन बिधि बिपिन उजारा।
सो सब तव प्रताप रघुराई। नाथ न कछू मोरि प्रभुताई ॥
दो. ता कहुँ प्रभु कछु अगम नहिं जा पर तुम्ह अनुकुल।
तब प्रभावँ बड़वानलहिं जारि सकि खलु तूल ॥ 33 ॥
नाथ भगति अति सुखदायनी। देहु कृपा करि अनपायनी ॥
सुनि प्रभु परम सरल कपि बानी। एवमस्तु तब कहेउ भवानी ॥
उमा राम सुभाउ जेहिं जाना। ताहि भजनु तजि भाव न आना ॥
यह संवाद जासु उर आवा। रघुपति चरन भगति सोइ पावा ॥
सुनि प्रभु बचन कहहिं कपिबृंदा। जय जय जय कृपाल सुखकंदा ॥
तब रघुपति कपिपतिहि बोलावा। कहा चलैं कर करहु बनावा ॥
अब बिलंबु केहि कारन कीजे। तुरत कपिन्ह कहुँ आयसु दीजे ॥
कौतुक देखि सुमन बहु बरषी। नभ तें भवन चले सुर हरषी ॥
दो. कपिपति बेगि बोलाए आए जूथप जूथ।
नाना बरन अतुल बल बानर भालु बरूथ ॥ 34 ॥
प्रभु पद पंकज नावहिं सीसा। गरजहिं भालु महाबल कीसा ॥
देखी राम सकल कपि सेना। चिति कृपा करि राजिव नैना ॥
राम कृपा बल पाइ कपिंदा। भे पच्छजुत मनहुँ गिरिंदा ॥
हरषि राम तब कीन्ह पयाना। सगुन भे सुंदर सुभ नाना ॥
जासु सकल मंगलमय कीती। तासु पयान सगुन यह नीती ॥
प्रभु पयान जाना बैदेहीं। फरकि बाम अँग जनु कहि देहीम् ॥
जोइ जोइ सगुन जानकिहि होई। असगुन भयु रावनहि सोई ॥
चला कटकु को बरनैं पारा। गर्जहि बानर भालु अपारा ॥
नख आयुध गिरि पादपधारी। चले गगन महि इच्छाचारी ॥
केहरिनाद भालु कपि करहीं। डगमगाहिं दिग्गज चिक्करहीम् ॥
छं. चिक्करहिं दिग्गज डोल महि गिरि लोल सागर खरभरे।
मन हरष सभ गंधर्ब सुर मुनि नाग किन्नर दुख टरे ॥
कटकटहिं मर्कट बिकट भट बहु कोटि कोटिन्ह धावहीं।
जय राम प्रबल प्रताप कोसलनाथ गुन गन गावहीम् ॥ 1 ॥
सहि सक न भार उदार अहिपति बार बारहिं मोही।
गह दसन पुनि पुनि कमठ पृष्ट कठोर सो किमि सोही ॥
रघुबीर रुचिर प्रयान प्रस्थिति जानि परम सुहावनी।
जनु कमठ खर्पर सर्पराज सो लिखत अबिचल पावनी ॥ 2 ॥
दो. एहि बिधि जाइ कृपानिधि उतरे सागर तीर।
जहँ तहँ लागे खान फल भालु बिपुल कपि बीर ॥ 35 ॥
उहाँ निसाचर रहहिं ससंका। जब ते जारि गयु कपि लंका ॥
निज निज गृहँ सब करहिं बिचारा। नहिं निसिचर कुल केर उबारा ॥
जासु दूत बल बरनि न जाई। तेहि आएँ पुर कवन भलाई ॥
दूतन्हि सन सुनि पुरजन बानी। मंदोदरी अधिक अकुलानी ॥
रहसि जोरि कर पति पग लागी। बोली बचन नीति रस पागी ॥
कंत करष हरि सन परिहरहू। मोर कहा अति हित हियँ धरहु ॥
समुझत जासु दूत कि करनी। स्त्रवहीं गर्भ रजनीचर धरनी ॥
तासु नारि निज सचिव बोलाई। पठवहु कंत जो चहहु भलाई ॥
तब कुल कमल बिपिन दुखदाई। सीता सीत निसा सम आई ॥
सुनहु नाथ सीता बिनु दीन्हें। हित न तुम्हार संभु अज कीन्हेम् ॥
दो. -राम बान अहि गन सरिस निकर निसाचर भेक।
जब लगि ग्रसत न तब लगि जतनु करहु तजि टेक ॥ 36 ॥
श्रवन सुनी सठ ता करि बानी। बिहसा जगत बिदित अभिमानी ॥
सभय सुभाउ नारि कर साचा। मंगल महुँ भय मन अति काचा ॥
जौं आवि मर्कट कटकाई। जिअहिं बिचारे निसिचर खाई ॥
कंपहिं लोकप जाकी त्रासा। तासु नारि सभीत बड़इ हासा ॥
अस कहि बिहसि ताहि उर लाई। चलेउ सभाँ ममता अधिकाई ॥
मंदोदरी हृदयँ कर चिंता। भयु कंत पर बिधि बिपरीता ॥
बैठेउ सभाँ खबरि असि पाई। सिंधु पार सेना सब आई ॥
बूझेसि सचिव उचित मत कहहू। ते सब हँसे मष्ट करि रहहू ॥
जितेहु सुरासुर तब श्रम नाहीं। नर बानर केहि लेखे माही ॥
दो. सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस।
राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास ॥ 37 ॥
सोइ रावन कहुँ बनि सहाई। अस्तुति करहिं सुनाइ सुनाई ॥
अवसर जानि बिभीषनु आवा। भ्राता चरन सीसु तेहिं नावा ॥
पुनि सिरु नाइ बैठ निज आसन। बोला बचन पाइ अनुसासन ॥
जौ कृपाल पूँछिहु मोहि बाता। मति अनुरुप कहुँ हित ताता ॥
जो आपन चाहै कल्याना। सुजसु सुमति सुभ गति सुख नाना ॥
सो परनारि लिलार गोसाईं। तजु चुथि के चंद कि नाई ॥
चौदह भुवन एक पति होई। भूतद्रोह तिष्टि नहिं सोई ॥
गुन सागर नागर नर जोऊ। अलप लोभ भल कहि न कोऊ ॥
दो. काम क्रोध मद लोभ सब नाथ नरक के पंथ।
सब परिहरि रघुबीरहि भजहु भजहिं जेहि संत ॥ 38 ॥
तात राम नहिं नर भूपाला। भुवनेस्वर कालहु कर काला ॥
ब्रह्म अनामय अज भगवंता। ब्यापक अजित अनादि अनंता ॥
गो द्विज धेनु देव हितकारी। कृपासिंधु मानुष तनुधारी ॥
जन रंजन भंजन खल ब्राता। बेद धर्म रच्छक सुनु भ्राता ॥
ताहि बयरु तजि नाइअ माथा। प्रनतारति भंजन रघुनाथा ॥
देहु नाथ प्रभु कहुँ बैदेही। भजहु राम बिनु हेतु सनेही ॥
सरन गेँ प्रभु ताहु न त्यागा। बिस्व द्रोह कृत अघ जेहि लागा ॥
जासु नाम त्रय ताप नसावन। सोइ प्रभु प्रगट समुझु जियँ रावन ॥
दो. बार बार पद लागुँ बिनय करुँ दससीस।
परिहरि मान मोह मद भजहु कोसलाधीस ॥ 39(क) ॥
मुनि पुलस्ति निज सिष्य सन कहि पठी यह बात।
तुरत सो मैं प्रभु सन कही पाइ सुअवसरु तात ॥ 39(ख) ॥
माल्यवंत अति सचिव सयाना। तासु बचन सुनि अति सुख माना ॥
तात अनुज तव नीति बिभूषन। सो उर धरहु जो कहत बिभीषन ॥
रिपु उतकरष कहत सठ दोऊ। दूरि न करहु इहाँ हि कोऊ ॥
माल्यवंत गृह गयु बहोरी। कहि बिभीषनु पुनि कर जोरी ॥
सुमति कुमति सब कें उर रहहीं। नाथ पुरान निगम अस कहहीम् ॥
जहाँ सुमति तहँ संपति नाना। जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना ॥
तव उर कुमति बसी बिपरीता। हित अनहित मानहु रिपु प्रीता ॥
कालराति निसिचर कुल केरी। तेहि सीता पर प्रीति घनेरी ॥
दो. तात चरन गहि मागुँ राखहु मोर दुलार।
सीत देहु राम कहुँ अहित न होइ तुम्हार ॥ 40 ॥
बुध पुरान श्रुति संमत बानी। कही बिभीषन नीति बखानी ॥
सुनत दसानन उठा रिसाई। खल तोहि निकट मुत्यु अब आई ॥
जिअसि सदा सठ मोर जिआवा। रिपु कर पच्छ मूढ़ तोहि भावा ॥
कहसि न खल अस को जग माहीं। भुज बल जाहि जिता मैं नाही ॥
मम पुर बसि तपसिन्ह पर प्रीती। सठ मिलु जाइ तिन्हहि कहु नीती ॥
अस कहि कीन्हेसि चरन प्रहारा। अनुज गहे पद बारहिं बारा ॥
उमा संत कि इहि बड़आई। मंद करत जो करि भलाई ॥
तुम्ह पितु सरिस भलेहिं मोहि मारा। रामु भजें हित नाथ तुम्हारा ॥
सचिव संग लै नभ पथ गयू। सबहि सुनाइ कहत अस भयू ॥
दो0=रामु सत्यसंकल्प प्रभु सभा कालबस तोरि।
मै रघुबीर सरन अब जाउँ देहु जनि खोरि ॥ 41 ॥
अस कहि चला बिभीषनु जबहीं। आयूहीन भे सब तबहीम् ॥
साधु अवग्या तुरत भवानी। कर कल्यान अखिल कै हानी ॥
रावन जबहिं बिभीषन त्यागा। भयु बिभव बिनु तबहिं अभागा ॥
चलेउ हरषि रघुनायक पाहीं। करत मनोरथ बहु मन माहीम् ॥
देखिहुँ जाइ चरन जलजाता। अरुन मृदुल सेवक सुखदाता ॥
जे पद परसि तरी रिषिनारी। दंडक कानन पावनकारी ॥
जे पद जनकसुताँ उर लाए। कपट कुरंग संग धर धाए ॥
हर उर सर सरोज पद जेई। अहोभाग्य मै देखिहुँ तेई ॥
दो0= जिन्ह पायन्ह के पादुकन्हि भरतु रहे मन लाइ।
ते पद आजु बिलोकिहुँ इन्ह नयनन्हि अब जाइ ॥ 42 ॥
एहि बिधि करत सप्रेम बिचारा। आयु सपदि सिंधु एहिं पारा ॥
कपिन्ह बिभीषनु आवत देखा। जाना कौ रिपु दूत बिसेषा ॥
ताहि राखि कपीस पहिं आए। समाचार सब ताहि सुनाए ॥
कह सुग्रीव सुनहु रघुराई। आवा मिलन दसानन भाई ॥
कह प्रभु सखा बूझिऐ काहा। कहि कपीस सुनहु नरनाहा ॥
जानि न जाइ निसाचर माया। कामरूप केहि कारन आया ॥
भेद हमार लेन सठ आवा। राखिअ बाँधि मोहि अस भावा ॥
सखा नीति तुम्ह नीकि बिचारी। मम पन सरनागत भयहारी ॥
सुनि प्रभु बचन हरष हनुमाना। सरनागत बच्छल भगवाना ॥
दो0=सरनागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि।
ते नर पावँर पापमय तिन्हहि बिलोकत हानि ॥ 43 ॥
कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू। आएँ सरन तजुँ नहिं ताहू ॥
सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीम् ॥
पापवंत कर सहज सुभाऊ। भजनु मोर तेहि भाव न काऊ ॥
जौं पै दुष्टहृदय सोइ होई। मोरें सनमुख आव कि सोई ॥
निर्मल मन जन सो मोहि पावा। मोहि कपट छल छिद्र न भावा ॥
भेद लेन पठवा दससीसा।
तबहुँ न कछु भय हानि कपीसा ॥
जग महुँ सखा निसाचर जेते। लछिमनु हनि निमिष महुँ तेते ॥
जौं सभीत आवा सरनाई। रखिहुँ ताहि प्रान की नाई ॥
दो0=उभय भाँति तेहि आनहु हँसि कह कृपानिकेत।
जय कृपाल कहि चले अंगद हनू समेत ॥ 44 ॥
सादर तेहि आगें करि बानर। चले जहाँ रघुपति करुनाकर ॥
दूरिहि ते देखे द्वौ भ्राता। नयनानंद दान के दाता ॥
बहुरि राम छबिधाम बिलोकी। रहेउ ठटुकि एकटक पल रोकी ॥
भुज प्रलंब कंजारुन लोचन। स्यामल गात प्रनत भय मोचन ॥
सिंघ कंध आयत उर सोहा। आनन अमित मदन मन मोहा ॥
नयन नीर पुलकित अति गाता। मन धरि धीर कही मृदु बाता ॥
नाथ दसानन कर मैं भ्राता। निसिचर बंस जनम सुरत्राता ॥
सहज पापप्रिय तामस देहा। जथा उलूकहि तम पर नेहा ॥
दो. श्रवन सुजसु सुनि आयुँ प्रभु भंजन भव भीर।
त्राहि त्राहि आरति हरन सरन सुखद रघुबीर ॥ 45 ॥
अस कहि करत दंडवत देखा। तुरत उठे प्रभु हरष बिसेषा ॥
दीन बचन सुनि प्रभु मन भावा। भुज बिसाल गहि हृदयँ लगावा ॥
अनुज सहित मिलि ढिग बैठारी। बोले बचन भगत भयहारी ॥
कहु लंकेस सहित परिवारा। कुसल कुठाहर बास तुम्हारा ॥
खल मंडलीं बसहु दिनु राती। सखा धरम निबहि केहि भाँती ॥
मैं जानुँ तुम्हारि सब रीती।
अति नय निपुन न भाव अनीती ॥
बरु भल बास नरक कर ताता। दुष्ट संग जनि देइ बिधाता ॥
अब पद देखि कुसल रघुराया। जौं तुम्ह कीन्ह जानि जन दाया ॥
दो. तब लगि कुसल न जीव कहुँ सपनेहुँ मन बिश्राम।
जब लगि भजत न राम कहुँ सोक धाम तजि काम ॥ 46 ॥
तब लगि हृदयँ बसत खल नाना। लोभ मोह मच्छर मद माना ॥
जब लगि उर न बसत रघुनाथा। धरें चाप सायक कटि भाथा ॥
ममता तरुन तमी अँधिआरी। राग द्वेष उलूक सुखकारी ॥
तब लगि बसति जीव मन माहीं। जब लगि प्रभु प्रताप रबि नाहीम् ॥
अब मैं कुसल मिटे भय भारे। देखि राम पद कमल तुम्हारे ॥
तुम्ह कृपाल जा पर अनुकूला। ताहि न ब्याप त्रिबिध भव सूला ॥
मैं निसिचर अति अधम सुभाऊ। सुभ आचरनु कीन्ह नहिं काऊ ॥
जासु रूप मुनि ध्यान न आवा। तेहिं प्रभु हरषि हृदयँ मोहि लावा ॥
दो. -अहोभाग्य मम अमित अति राम कृपा सुख पुंज।
देखेउँ नयन बिरंचि सिब सेब्य जुगल पद कंज ॥ 47 ॥
सुनहु सखा निज कहुँ सुभाऊ। जान भुसुंडि संभु गिरजाऊ ॥
जौं नर होइ चराचर द्रोही। आवे सभय सरन तकि मोही ॥
तजि मद मोह कपट छल नाना। करुँ सद्य तेहि साधु समाना ॥
जननी जनक बंधु सुत दारा। तनु धनु भवन सुह्रद परिवारा ॥
सब कै ममता ताग बटोरी। मम पद मनहि बाँध बरि डोरी ॥
समदरसी इच्छा कछु नाहीं। हरष सोक भय नहिं मन माहीम् ॥
अस सज्जन मम उर बस कैसें। लोभी हृदयँ बसि धनु जैसेम् ॥
तुम्ह सारिखे संत प्रिय मोरें। धरुँ देह नहिं आन निहोरेम् ॥
दो. सगुन उपासक परहित निरत नीति दृढ़ नेम।
ते नर प्रान समान मम जिन्ह कें द्विज पद प्रेम ॥ 48 ॥
सुनु लंकेस सकल गुन तोरें। तातें तुम्ह अतिसय प्रिय मोरेम् ॥
राम बचन सुनि बानर जूथा। सकल कहहिं जय कृपा बरूथा ॥
सुनत बिभीषनु प्रभु कै बानी। नहिं अघात श्रवनामृत जानी ॥
पद अंबुज गहि बारहिं बारा। हृदयँ समात न प्रेमु अपारा ॥
सुनहु देव सचराचर स्वामी। प्रनतपाल उर अंतरजामी ॥
उर कछु प्रथम बासना रही।
प्रभु पद प्रीति सरित सो बही ॥
अब कृपाल निज भगति पावनी। देहु सदा सिव मन भावनी ॥
एवमस्तु कहि प्रभु रनधीरा। मागा तुरत सिंधु कर नीरा ॥
जदपि सखा तव इच्छा नाहीं। मोर दरसु अमोघ जग माहीम् ॥
अस कहि राम तिलक तेहि सारा। सुमन बृष्टि नभ भी अपारा ॥
दो. रावन क्रोध अनल निज स्वास समीर प्रचंड।
जरत बिभीषनु राखेउ दीन्हेहु राजु अखंड ॥ 49(क) ॥
जो संपति सिव रावनहि दीन्हि दिएँ दस माथ।
सोइ संपदा बिभीषनहि सकुचि दीन्ह रघुनाथ ॥ 49(ख) ॥
अस प्रभु छाड़इ भजहिं जे आना। ते नर पसु बिनु पूँछ बिषाना ॥
निज जन जानि ताहि अपनावा। प्रभु सुभाव कपि कुल मन भावा ॥
पुनि सर्बग्य सर्ब उर बासी। सर्बरूप सब रहित उदासी ॥
बोले बचन नीति प्रतिपालक। कारन मनुज दनुज कुल घालक ॥
सुनु कपीस लंकापति बीरा। केहि बिधि तरिअ जलधि गंभीरा ॥
संकुल मकर उरग झष जाती। अति अगाध दुस्तर सब भाँती ॥
कह लंकेस सुनहु रघुनायक। कोटि सिंधु सोषक तव सायक ॥
जद्यपि तदपि नीति असि गाई। बिनय करिअ सागर सन जाई ॥
दो. प्रभु तुम्हार कुलगुर जलधि कहिहि उपाय बिचारि।
बिनु प्रयास सागर तरिहि सकल भालु कपि धारि ॥ 50 ॥
सखा कही तुम्ह नीकि उपाई। करिअ दैव जौं होइ सहाई ॥
मंत्र न यह लछिमन मन भावा। राम बचन सुनि अति दुख पावा ॥
नाथ दैव कर कवन भरोसा। सोषिअ सिंधु करिअ मन रोसा ॥
कादर मन कहुँ एक अधारा। दैव दैव आलसी पुकारा ॥
सुनत बिहसि बोले रघुबीरा। ऐसेहिं करब धरहु मन धीरा ॥
अस कहि प्रभु अनुजहि समुझाई। सिंधु समीप गे रघुराई ॥
प्रथम प्रनाम कीन्ह सिरु नाई। बैठे पुनि तट दर्भ डसाई ॥
जबहिं बिभीषन प्रभु पहिं आए। पाछें रावन दूत पठाए ॥
दो. सकल चरित तिन्ह देखे धरें कपट कपि देह।
प्रभु गुन हृदयँ सराहहिं सरनागत पर नेह ॥ 51 ॥
प्रगट बखानहिं राम सुभाऊ। अति सप्रेम गा बिसरि दुराऊ ॥
रिपु के दूत कपिन्ह तब जाने। सकल बाँधि कपीस पहिं आने ॥
कह सुग्रीव सुनहु सब बानर। अंग भंग करि पठवहु निसिचर ॥
सुनि सुग्रीव बचन कपि धाए। बाँधि कटक चहु पास फिराए ॥
बहु प्रकार मारन कपि लागे। दीन पुकारत तदपि न त्यागे ॥
जो हमार हर नासा काना। तेहि कोसलाधीस कै आना ॥
सुनि लछिमन सब निकट बोलाए। दया लागि हँसि तुरत छोडाए ॥
रावन कर दीजहु यह पाती। लछिमन बचन बाचु कुलघाती ॥
दो. कहेहु मुखागर मूढ़ सन मम संदेसु उदार।
सीता देइ मिलेहु न त आवा काल तुम्हार ॥ 52 ॥
तुरत नाइ लछिमन पद माथा। चले दूत बरनत गुन गाथा ॥
कहत राम जसु लंकाँ आए। रावन चरन सीस तिन्ह नाए ॥
बिहसि दसानन पूँछी बाता। कहसि न सुक आपनि कुसलाता ॥
पुनि कहु खबरि बिभीषन केरी। जाहि मृत्यु आई अति नेरी ॥
करत राज लंका सठ त्यागी। होइहि जब कर कीट अभागी ॥
पुनि कहु भालु कीस कटकाई। कठिन काल प्रेरित चलि आई ॥
जिन्ह के जीवन कर रखवारा। भयु मृदुल चित सिंधु बिचारा ॥
कहु तपसिन्ह कै बात बहोरी। जिन्ह के हृदयँ त्रास अति मोरी ॥
दो. -की भि भेंट कि फिरि गे श्रवन सुजसु सुनि मोर।
कहसि न रिपु दल तेज बल बहुत चकित चित तोर ॥ 53 ॥
नाथ कृपा करि पूँछेहु जैसें। मानहु कहा क्रोध तजि तैसेम् ॥
मिला जाइ जब अनुज तुम्हारा। जातहिं राम तिलक तेहि सारा ॥
रावन दूत हमहि सुनि काना। कपिन्ह बाँधि दीन्हे दुख नाना ॥
श्रवन नासिका काटै लागे। राम सपथ दीन्हे हम त्यागे ॥
पूँछिहु नाथ राम कटकाई। बदन कोटि सत बरनि न जाई ॥
नाना बरन भालु कपि धारी। बिकटानन बिसाल भयकारी ॥
जेहिं पुर दहेउ हतेउ सुत तोरा। सकल कपिन्ह महँ तेहि बलु थोरा ॥
अमित नाम भट कठिन कराला। अमित नाग बल बिपुल बिसाला ॥
दो. द्विबिद मयंद नील नल अंगद गद बिकटासि।
दधिमुख केहरि निसठ सठ जामवंत बलरासि ॥ 54 ॥
ए कपि सब सुग्रीव समाना। इन्ह सम कोटिन्ह गनि को नाना ॥
राम कृपाँ अतुलित बल तिन्हहीं। तृन समान त्रेलोकहि गनहीम् ॥
अस मैं सुना श्रवन दसकंधर। पदुम अठारह जूथप बंदर ॥
नाथ कटक महँ सो कपि नाहीं। जो न तुम्हहि जीतै रन माहीम् ॥
परम क्रोध मीजहिं सब हाथा। आयसु पै न देहिं रघुनाथा ॥
सोषहिं सिंधु सहित झष ब्याला। पूरहीं न त भरि कुधर बिसाला ॥
मर्दि गर्द मिलवहिं दससीसा। ऐसेइ बचन कहहिं सब कीसा ॥
गर्जहिं तर्जहिं सहज असंका। मानहु ग्रसन चहत हहिं लंका ॥
दो. -सहज सूर कपि भालु सब पुनि सिर पर प्रभु राम।
रावन काल कोटि कहु जीति सकहिं संग्राम ॥ 55 ॥
राम तेज बल बुधि बिपुलाई। तब भ्रातहि पूँछेउ नय नागर ॥
तासु बचन सुनि सागर पाहीं। मागत पंथ कृपा मन माहीम् ॥
सुनत बचन बिहसा दससीसा। जौं असि मति सहाय कृत कीसा ॥
सहज भीरु कर बचन दृढ़आई। सागर सन ठानी मचलाई ॥
मूढ़ मृषा का करसि बड़आई। रिपु बल बुद्धि थाह मैं पाई ॥
सचिव सभीत बिभीषन जाकें। बिजय बिभूति कहाँ जग ताकेम् ॥
सुनि खल बचन दूत रिस बाढ़ई। समय बिचारि पत्रिका काढ़ई ॥
रामानुज दीन्ही यह पाती। नाथ बचाइ जुड़आवहु छाती ॥
बिहसि बाम कर लीन्ही रावन। सचिव बोलि सठ लाग बचावन ॥
दो. -बातन्ह मनहि रिझाइ सठ जनि घालसि कुल खीस।
राम बिरोध न उबरसि सरन बिष्नु अज ईस ॥ 56(क) ॥
की तजि मान अनुज इव प्रभु पद पंकज भृंग।
होहि कि राम सरानल खल कुल सहित पतंग ॥ 56(ख) ॥
सुनत सभय मन मुख मुसुकाई। कहत दसानन सबहि सुनाई ॥
भूमि परा कर गहत अकासा। लघु तापस कर बाग बिलासा ॥
कह सुक नाथ सत्य सब बानी। समुझहु छाड़इ प्रकृति अभिमानी ॥
सुनहु बचन मम परिहरि क्रोधा। नाथ राम सन तजहु बिरोधा ॥
अति कोमल रघुबीर सुभाऊ। जद्यपि अखिल लोक कर राऊ ॥
मिलत कृपा तुम्ह पर प्रभु करिही। उर अपराध न एकु धरिही ॥
जनकसुता रघुनाथहि दीजे। एतना कहा मोर प्रभु कीजे।
जब तेहिं कहा देन बैदेही। चरन प्रहार कीन्ह सठ तेही ॥
नाइ चरन सिरु चला सो तहाँ। कृपासिंधु रघुनायक जहाँ ॥
करि प्रनामु निज कथा सुनाई। राम कृपाँ आपनि गति पाई ॥
रिषि अगस्ति कीं साप भवानी। राछस भयु रहा मुनि ग्यानी ॥
बंदि राम पद बारहिं बारा। मुनि निज आश्रम कहुँ पगु धारा ॥
दो. बिनय न मानत जलधि जड़ गे तीन दिन बीति।
बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति ॥ 57 ॥
लछिमन बान सरासन आनू। सोषौं बारिधि बिसिख कृसानू ॥
सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीती। सहज कृपन सन सुंदर नीती ॥
ममता रत सन ग्यान कहानी। अति लोभी सन बिरति बखानी ॥
क्रोधिहि सम कामिहि हरि कथा। ऊसर बीज बेँ फल जथा ॥
अस कहि रघुपति चाप चढ़आवा। यह मत लछिमन के मन भावा ॥
संघानेउ प्रभु बिसिख कराला। उठी उदधि उर अंतर ज्वाला ॥
मकर उरग झष गन अकुलाने। जरत जंतु जलनिधि जब जाने ॥
कनक थार भरि मनि गन नाना। बिप्र रूप आयु तजि माना ॥
दो. काटेहिं पि कदरी फरि कोटि जतन कौ सींच।
बिनय न मान खगेस सुनु डाटेहिं पि नव नीच ॥ 58 ॥
सभय सिंधु गहि पद प्रभु केरे। छमहु नाथ सब अवगुन मेरे ॥
गगन समीर अनल जल धरनी। इन्ह कि नाथ सहज जड़ करनी ॥
तव प्रेरित मायाँ उपजाए। सृष्टि हेतु सब ग्रंथनि गाए ॥
प्रभु आयसु जेहि कहँ जस अही। सो तेहि भाँति रहे सुख लही ॥
प्रभु भल कीन्ही मोहि सिख दीन्ही। मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्ही ॥
ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी ॥
प्रभु प्रताप मैं जाब सुखाई। उतरिहि कटकु न मोरि बड़आई ॥
प्रभु अग्या अपेल श्रुति गाई। करौं सो बेगि जौ तुम्हहि सोहाई ॥
दो. सुनत बिनीत बचन अति कह कृपाल मुसुकाइ।
जेहि बिधि उतरै कपि कटकु तात सो कहहु उपाइ ॥ 59 ॥
नाथ नील नल कपि द्वौ भाई। लरिकाई रिषि आसिष पाई ॥
तिन्ह के परस किएँ गिरि भारे। तरिहहिं जलधि प्रताप तुम्हारे ॥
मैं पुनि उर धरि प्रभुताई। करिहुँ बल अनुमान सहाई ॥
एहि बिधि नाथ पयोधि बँधाइअ। जेहिं यह सुजसु लोक तिहुँ गाइअ ॥
एहि सर मम उत्तर तट बासी। हतहु नाथ खल नर अघ रासी ॥
सुनि कृपाल सागर मन पीरा। तुरतहिं हरी राम रनधीरा ॥
देखि राम बल पौरुष भारी। हरषि पयोनिधि भयु सुखारी ॥
सकल चरित कहि प्रभुहि सुनावा। चरन बंदि पाथोधि सिधावा ॥
छं. निज भवन गवनेउ सिंधु श्रीरघुपतिहि यह मत भायू।
यह चरित कलि मलहर जथामति दास तुलसी गायू ॥
सुख भवन संसय समन दवन बिषाद रघुपति गुन गना ॥
तजि सकल आस भरोस गावहि सुनहि संतत सठ मना ॥
दो. सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुन गान।
सादर सुनहिं ते तरहिं भव सिंधु बिना जलजान ॥ 60 ॥
मासपारायण, चौबीसवाँ विश्राम
इति श्रीमद्रामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने
पंचमः सोपानः समाप्तः ।
(सुंदरकांड समाप्त)
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श्री हनुमान चालीसा
॥ दोहा ॥
श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि।
बरनऊं रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि॥
बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार।
बल बुद्धि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार॥
॥ चौपाई ॥
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर।
जय कपीस तिहुं लोक उजागर॥
रामदूत अतुलित बल धामा।
अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा॥
महाबीर बिक्रम बजरंगी।
कुमति निवार सुमति के संगी॥
कंचन बरन बिराज सुबेसा।
कानन कुंडल कुंचित केसा॥
हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै।
कांधे मूंज जनेऊ साजै॥
शंकर सुवन केसरी नंदन।।
तेज प्रताप महा जगवंदन॥
विद्यावान गुनी अति चातुर।
राम काज करिबे को आतुर॥
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया।
राम लखन सीता मन बसिया॥
सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा।
बिकट रूप धरि लंक जरावा॥
भीम रूप धरि असुर संहारे।
रामचंद्र के काज संवारे॥
लाय सजीवन लखन जियाये।
श्रीरघुबीर हरषि उर लाये॥
रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई।
तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई॥
सहस बदन तुम्हरो जस गावैं।
अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं॥
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा।
नारद सारद सहित अहीसा॥
जम कुबेर दिगपाल जहां ते।
कबि कोबिद कहि सके कहां ते॥
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा।
राम मिलाय राज पद दीन्हा॥
तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना।
लंकेस्वर भए सब जग जाना॥
जुग सहस्र जोजन पर भानू।
लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं।
जलधि लांघि गये अचरज नाहीं॥
दुर्गम काज जगत के जेते।
सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥
राम दुआरे तुम रखवारे।
होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥
सब सुख लहै तुम्हारी सरना।
तुम रक्षक काहू को डर ना॥
आपन तेज सम्हारो आपै।
तीनों लोक हांक तें कांपै॥
भूत पिशाच निकट नहिं आवै ।।
महावीर जब नाम सुनावै ॥
नासै रोग हरै सब पीरा।
जपत निरंतर हनुमत बीरा॥
संकट तें हनुमान छुड़ावै।
मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥
सब पर राम तपस्वी राजा।
तिन के काज सकल तुम साजा॥
और मनोरथ जो कोई लावै।
सोइ अमित जीवन फल पावै॥
चारों जुग परताप तुम्हारा।
है परसिद्ध जगत उजियारा॥
साधु-संत के तुम रखवारे।
असुर निकंदन राम दुलारे॥
अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता।
अस बर दीन जानकी माता॥
राम रसायन तुम्हरे पासा।
सदा रहो रघुपति के दासा॥
तुम्हरे भजन राम को पावै।
जनम-जनम के दुख बिसरावै॥
अंतकाल रघुवरपुर जाई ।
जहां जन्म हरि-भक्त कहाई॥
और देवता चित्त न धरई।
हनुमत सेइ सर्ब सुख करई॥
संकट कटै मिटै सब पीरा।
जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥
जै जै जै हनुमान गोसाईं।
कृपा करहु गुरुदेव की नाईं॥
जो सत बार पाठ कर कोई।
छूटहि बंदि महा सुख होई॥
जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा।
होय सिद्धि साखी गौरीसा॥
तुलसीदास सदा हरि चेरा।
कीजै नाथ हृदय मह डेरा॥
॥ दोहा ॥
पवन तनय संकट हरन मंगल मूरति रूप।
राम लखन सीता सहित हृदय बसहु सुर भूप॥
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॥ हनुमानाष्टक ॥
बाल समय रवि भक्षी लियो तब,
तीनहुं लोक भयो अंधियारों ।
ताहि सों त्रास भयो जग को,
यह संकट काहु सों जात न टारो ।
देवन आनि करी बिनती तब,
छाड़ी दियो रवि कष्ट निवारो ।
को नहीं जानत है जग में कपि,
संकटमोचन नाम तिहारो ॥ १ ॥
बालि की त्रास कपीस बसैं गिरि,
जात महाप्रभु पंथ निहारो ।
चौंकि महामुनि साप दियो तब,
चाहिए कौन बिचार बिचारो ।
कैद्विज रूप लिवाय महाप्रभु,
सो तुम दास के सोक निवारो ॥ २ ॥
अंगद के संग लेन गए सिय,
खोज कपीस यह बैन उचारो ।
जीवत ना बचिहौ हम सो जु,
बिना सुधि लाये इहाँ पगु धारो ।
हेरी थके तट सिन्धु सबै तब,
लाए सिया-सुधि प्राण उबारो ॥ ३ ॥
रावण त्रास दई सिय को सब,
राक्षसी सों कही सोक निवारो ।
ताहि समय हनुमान महाप्रभु,
जाए महा रजनीचर मारो ।
चाहत सीय असोक सों आगि सु,
दै प्रभुमुद्रिका सोक निवारो ॥ ४ ॥
बान लग्यो उर लछिमन के तब,
प्राण तजे सुत रावन मारो ।
लै गृह बैद्य सुषेन समेत,
तबै गिरि द्रोण सु बीर उपारो ।
आनि सजीवन हाथ दई तब,
लछिमन के तुम प्रान उबारो ॥ ५ ॥
रावन युद्ध अजान कियो तब,
नाग कि फाँस सबै सिर डारो ।
श्रीरघुनाथ समेत सबै दल,
मोह भयो यह संकट भारो I
आनि खगेस तबै हनुमान जु,
बंधन काटि सुत्रास निवारो ॥ ६ ॥
बंधु समेत जबै अहिरावन,
लै रघुनाथ पताल सिधारो ।
देबिहिं पूजि भलि विधि सों बलि,
देउ सबै मिलि मन्त्र विचारो ।
जाय सहाय भयो तब ही,
अहिरावन सैन्य समेत संहारो ॥ ७ ॥
काज किये बड़ देवन के तुम,
बीर महाप्रभु देखि बिचारो ।
कौन सो संकट मोर गरीब को,
जो तुमसे नहिं जात है टारो ।
बेगि हरो हनुमान महाप्रभु,
जो कछु संकट होय हमारो ॥ ८ ॥
॥ दोहा ॥
लाल देह लाली लसे,
अरु धरि लाल लंगूर ।
वज्र देह दानव दलन,
जय जय जय कपि सूर ॥
************************************************
॥ श्री रामायणजी की आरती ॥
आरती श्री रामायण जी की।कीरति कलित ललित सिया-पी की॥
गावत ब्राह्मादिक मुनि नारद।बालमीक विज्ञान विशारद।
शुक सनकादि शेष अरु शारद।बरनि पवनसुत कीरति नीकी॥
आरती श्री रामायण जी की।
कीरति कलित ललित सिया-पी की॥
गावत वेद पुरान अष्टदस।छओं शास्त्र सब ग्रन्थन को रस।
मुनि-मन धन सन्तन को सरबस।सार अंश सम्मत सबही की॥
आरती श्री रामायण जी की।
कीरति कलित ललित सिया-पी की॥
गावत सन्तत शम्भू भवानी।अरु घट सम्भव मुनि विज्ञानी।
व्यास आदि कविबर्ज बखानी।कागभुषुण्डि गरुड़ के ही की॥
आरती श्री रामायण जी की।
कीरति कलित ललित सिया-पी की॥
कलिमल हरनि विषय रस फीकी।सुभग सिंगार मुक्ति जुबती की।
दलन रोग भव मूरि अमी की। तात मात सब विधि तुलसी की॥
आरती श्री रामायण जी की।
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।।श्री बजरंग बाण ।।
॥ दोहा ॥
निश्चय प्रेम प्रतीति ते, विनय करैं सनमान।
तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करैं हनुमान॥
॥ चौपाई ॥
जय हनुमन्त सन्त हितकारी। सुन लीजै प्रभु अरज हमारी॥
जन के काज विलम्ब न कीजै। आतुर दौरि महा सुख दीजै॥
जैसे कूदि सिन्धु महिपारा। सुरसा बदन पैठि विस्तारा॥
आगे जाय लंकिनी रोका। मारेहु लात गई सुर लोका॥
जाय विभीषन को सुख दीन्हा। सीता निरखि परमपद लीन्हा॥
बाग उजारि सिन्धु महँ बोरा। अति आतुर यम कातर तोरा॥
अक्षय कुमार को मारि संहारा। लूम लपेट लंक को जारा॥
लाह समान लंक जरि गई। जय जय धुनि सुरपुर में भई॥
अब विलम्ब केहि कारन स्वामी। कृपा करहु उर अन्तर्यामी॥
जय जय लखन प्राण के दाता। आतुर होय दुःख हरहु निपाता॥
जय गिरिधर जय जय सुख सागर। सुर समूह समरथ भटनागर॥
ॐ हनु हनु हनु हनुमंत हठीले। बैरिहि मारु बज्र की कीले॥
गदा बज्र लै बैरिहिं मारो। महाराज प्रभु दास उबारो॥
ओंकार हुँकार महाप्रभु धावो। बज्र गदा हनु विलम्ब न लावो॥
ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं हनुमंत कपीसा। ऊँ हुं हुं हुं हनु अरि उर शीशा॥
सत्य होहु हरि शपथ पायके। रामदूत धरु मारु जाय के॥
जय जय जय हनुमन्त अगाधा। दुःख पावत जन केहि अपराधा॥
पूजा जप तप नेम अचारा। नहिं जानत हौं दास तुम्हारा॥
वन उपवन मग गिरि गृह माहीं। तुम्हरे बल हम डरपत नाहीं॥
पांय परौं कर जोरि मनावौं। येहि अवसर अब केहि गोहरावौं॥
जय अंजनि कुमार बलवन्ता। शंकर सुवन वीर हनुमन्ता॥
बदन कराल काल कुल घालक। राम सहाय सदा प्रति पालक॥
भूत, प्रेत, पिशाच, निशाचर। अग्नि बेताल काल मारी मर॥
इन्हें मारु, तोहि शपथ राम की। राखउ नाथ मरजाद नाम की॥
जनकसुता हरि दास कहावो। ताकी शपथ विलम्ब ना लावो॥
जय जय जय धुनि होत अकासा। सुमिरत होत दुसह दुःख नाशा॥
चरण शरण कर जोरि मनावौं। यहि अवसर अब केहि गोहरावौं॥
उठु उठु चलु तोहि राम दुहाई। पांय परौं कर जोरि मनाई॥
ॐ चँ चँ चँ चँ चपत चलंता। ऊँ हनु हनु हनु हनु हनुमन्ता॥
ऊँ हँ हँ हाँक देत कपि चंचल। ऊँ सं सं सहमि पराने खल दल॥
अपने जन को तुरत उबारो। सुमिरत होय आनन्द हमारो॥
यह बजरंग बाण जेहि मारै। ताहि कहो फिर कौन उबारै॥
पाठ करै बजरंग बाण की। हनुमंत रक्षा करैं प्राण की॥
यह बजरंग बाण जो जापै। ताते भूत-प्रेत सब काँपै॥
धूप देय अरु जपै हमेशा। ताके तन नहिं रहै कलेशा॥
॥ दोहा ॥
प्रेम प्रतीतिहि कपि भजै, सदा धरै उर ध्यान।
तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करैं हनुमान॥
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श्री राम स्तुति :
॥दोहा॥
श्री रामचन्द्र कृपालु भजुमन
हरण भवभय दारुणं ।
नव कंज लोचन कंज मुख
कर कंज पद कंजारुणं ॥१॥
कन्दर्प अगणित अमित छवि
नव नील नीरद सुन्दरं ।
पटपीत मानहुँ तडित रुचि शुचि
नोमि जनक सुतावरं ॥२॥
भजु दीनबन्धु दिनेश दानव
दैत्य वंश निकन्दनं ।
रघुनन्द आनन्द कन्द कोशल
चन्द दशरथ नन्दनं ॥३॥
शिर मुकुट कुंडल तिलक
चारु उदारु अङ्ग विभूषणं ।
आजानु भुज शर चाप धर
संग्राम जित खरदूषणं ॥४॥
इति वदति तुलसीदास शंकर
शेष मुनि मन रंजनं ।
मम् हृदय कंज निवास कुरु
कामादि खलदल गंजनं ॥५॥
मन जाहि राच्यो मिलहि सो
वर सहज सुन्दर सांवरो ।
करुणा निधान सुजान शील
स्नेह जानत रावरो ॥६॥
एहि भांति गौरी असीस सुन सिय
सहित हिय हरषित अली।
तुलसी भवानिहि पूजी पुनि-पुनि
मुदित मन मन्दिर चली ॥७॥
॥सोरठा॥
जानी गौरी अनुकूल सिय
हिय हरषु न जाइ कहि ।
मंजुल मंगल मूल वाम
अङ्ग फरकन लगे।
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।।श्री रामावतार स्तुति ।।
भए प्रगट कृपाला दीनदयाला, कौसल्या हितकारी ।
हरषित महतारी, मुनि मन हारी, अद्भुत रूप बिचारी ॥
लोचन अभिरामा, तनु घनस्यामा, निज आयुध भुजचारी ।
भूषन बनमाला, नयन बिसाला, सोभासिंधु खरारी ॥
कह दुइ कर जोरी, अस्तुति तोरी, केहि बिधि करूं अनंता ।
माया गुन ग्यानातीत अमाना, वेद पुरान भनंता ॥
करुना सुख सागर, सब गुन आगर, जेहि गावहिं श्रुति संता ।
सो मम हित लागी, जन अनुरागी, भयउ प्रगट श्रीकंता ॥
ब्रह्मांड निकाया, निर्मित माया, रोम रोम प्रति बेद कहै ।
मम उर सो बासी, यह उपहासी, सुनत धीर मति थिर न रहै ॥
उपजा जब ग्याना, प्रभु मुसुकाना, चरित बहुत बिधि कीन्ह चहै ।
कहि कथा सुहाई, मातु बुझाई, जेहि प्रकार सुत प्रेम लहै ॥
माता पुनि बोली, सो मति डोली, तजहु तात यह रूपा ।
कीजै सिसुलीला, अति प्रियसीला, यह सुख परम अनूपा ॥
सुनि बचन सुजाना, रोदन ठाना, होइ बालक सुरभूपा ।
यह चरित जे गावहिं, हरिपद पावहिं, ते न परहिं भवकूपा ॥
दोहा:
बिप्र धेनु सुर संत हित, लीन्ह मनुज अवतार ।
निज इच्छा निर्मित तनु, माया गुन गो पार ॥
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श्री हनुमान जी की आरती:
॥ श्री हनुमंत स्तुति ॥
मनोजवं मारुत तुल्यवेगं,
जितेन्द्रियं, बुद्धिमतां वरिष्ठम् ॥
वातात्मजं वानरयुथ मुख्यं,
श्रीरामदुतं शरणम प्रपद्धे ॥
॥ आरती ॥
आरती कीजै हनुमान लला की ।
दुष्ट दलन रघुनाथ कला की ॥
जाके बल से गिरवर काँपे ।
रोग-दोष जाके निकट न झाँके ॥
अंजनि पुत्र महा बलदाई ।
संतन के प्रभु सदा सहाई ॥
आरती कीजै हनुमान लला की ॥
दे वीरा रघुनाथ पठाए ।
लंका जारि सिया सुधि लाये ॥
लंका सो कोट समुद्र सी खाई ।
जात पवनसुत बार न लाई ॥
आरती कीजै हनुमान लला की ॥
लंका जारि असुर संहारे ।
सियाराम जी के काज सँवारे ॥
लक्ष्मण मुर्छित पड़े सकारे ।
लाये संजिवन प्राण उबारे ॥
आरती कीजै हनुमान लला की ॥
पैठि पताल तोरि जमकारे ।
अहिरावण की भुजा उखारे ॥
बाईं भुजा असुर दल मारे ।
दाहिने भुजा संतजन तारे ॥
आरती कीजै हनुमान लला की ॥
सुर-नर-मुनि जन आरती उतरें ।
जय जय जय हनुमान उचारें ॥
कंचन थार कपूर लौ छाई ।
आरती करत अंजना माई ॥
आरती कीजै हनुमान लला की ॥
जो हनुमानजी की आरती गावे ।
बसहिं बैकुंठ परम पद पावे ॥
लंक विध्वंस किये रघुराई ।
तुलसीदास स्वामी कीर्ति गाई ॥
आरती कीजै हनुमान लला की ।
दुष्ट दलन रघुनाथ कला की ॥
॥ इति संपूर्णंम् ॥भावार्थ
चौपाई:
जाम्बवन्त हनुमान जी को उनका बल और सामर्थ्य स्मरण कराते हैं और कहते हैं कि इस कार्य को करने में आप ही समर्थ हैं।
चौपाई:
हनुमान जी को अपने वास्तविक बल का स्मरण हो जाता है और वे श्रीराम के कार्य के लिए उत्साहित हो उठते हैं।
चौपाई:
वे सब वानरों को प्रणाम करके श्रीराम का स्मरण करते हुए समुद्र पार करने के लिए पर्वत पर चढ़ते हैं।
चौपाई:
हनुमान जी अत्यंत वेग से समुद्र लाँघने के लिए छलांग लगाते हैं, जैसे श्रीराम का अचूक बाण लक्ष्य की ओर जाता है।
दोहा:
हनुमान जी मैनाक पर्वत को स्पर्श करके आगे बढ़ जाते हैं, क्योंकि वे श्रीराम का कार्य पूर्ण किए बिना विश्राम नहीं करना चाहते।
(दोहा 1)
चौपाई:
देवताओं द्वारा भेजी गई सुरसा हनुमान जी की परीक्षा लेने के लिए उनका मार्ग रोकती है।
चौपाई:
हनुमान जी बुद्धि से काम लेते हुए अपना रूप बड़ा करते हैं और फिर छोटा होकर उसके मुख में प्रवेश कर तुरंत बाहर आ जाते हैं।
चौपाई:
सुरसा प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वाद देती है और उनके कार्य की सफलता की कामना करती है।
दोहा:
हनुमान जी देवताओं का आशीर्वाद पाकर आगे बढ़ते हैं और अपने धैर्य और बुद्धि से मार्ग की बाधाओं को पार करते हैं।
(दोहा 2)
चौपाई:
सिंहिका नाम की राक्षसी उनकी छाया पकड़कर उन्हें रोकती है।
चौपाई:
हनुमान जी उसे मारकर आगे बढ़ते हैं और समुद्र पार कर लंका के समीप पहुँच जाते हैं।
चौपाई:
वे छोटा रूप धारण करके रात के समय लंका में प्रवेश करने का विचार करते हैं।
दोहा:
हनुमान जी लंका के द्वार पर पहुँचकर सावधानी से नगर में प्रवेश करने का निश्चय करते हैं।
(दोहा 3)
चौपाई:
लंका की रक्षक लंकिनी हनुमान जी को रोकती है, परंतु हनुमान जी उसे परास्त कर देते हैं।
चौपाई:
लंकिनी समझ जाती है कि अब राक्षसों का विनाश निकट है और वह उन्हें नगर में प्रवेश करने देती है।
चौपाई:
हनुमान जी लंका के महलों और वैभव को देखते हुए सीता जी की खोज प्रारम्भ करते हैं।
दोहा:
हनुमान जी अनेक स्थानों को देखते हुए भी सीता जी को न पाकर आगे खोज जारी रखते हैं।
(दोहा 4)
चौपाई:
हनुमान जी रावण के महल सहित अनेक भवनों में खोज करते हैं, पर सीता जी कहीं नहीं मिलतीं।
चौपाई:
वे विचार करते हैं कि सीता जी अवश्य किसी एकांत स्थान में होंगी।
चौपाई:
खोजते हुए वे अशोक वाटिका की ओर बढ़ते हैं।
दोहा:
हनुमान जी अशोक वाटिका में प्रवेश करते हैं और वहीं सीता जी के मिलने की आशा करते हैं।
(दोहा 5)
चौपाई:
हनुमान जी लंका में खोजते हुए विभीषण के घर पहुँचते हैं और देखते हैं कि वहाँ भगवान का स्मरण हो रहा है।
चौपाई:
हनुमान जी ब्राह्मण का रूप धारण कर विभीषण से मिलते हैं और दोनों के बीच भगवान श्रीराम की कथा होती है।
चौपाई:
विभीषण हनुमान जी को बताते हैं कि सीता जी अशोक वाटिका में राक्षसियों के बीच रहती हैं।
दोहा:
हनुमान जी विभीषण से पूरी जानकारी लेकर सीता जी की खोज के लिए अशोक वाटिका की ओर जाते हैं।
(दोहा 6)
चौपाई:
हनुमान जी अशोक वाटिका में पहुँचकर वृक्ष के ऊपर छिप जाते हैं और सीता जी को देखते हैं।
चौपाई:
सीता जी अत्यंत दुःखी होकर श्रीराम का स्मरण कर रही होती हैं और विरह से व्याकुल हैं।
चौपाई:
रावण वहाँ आता है और सीता जी को अनेक प्रकार से समझाकर अपने अधीन करने का प्रयास करता है।
दोहा:
सीता जी रावण को कठोर वचन कहकर उसके प्रस्ताव को अस्वीकार कर देती हैं।
(दोहा 7)
चौपाई:
रावण क्रोधित होकर सीता जी को एक महीने का समय देकर चला जाता है और राक्षसियों को उन्हें डराने का आदेश देता है।
चौपाई:
राक्षसियाँ सीता जी को भय दिखाती हैं, पर त्रिजटा नाम की राक्षसी उन्हें सांत्वना देती है।
चौपाई:
त्रिजटा अपने स्वप्न का वर्णन करती है जिसमें रावण का विनाश और श्रीराम की विजय दिखाई देती है।
दोहा:
त्रिजटा के वचनों से राक्षसियाँ भयभीत हो जाती हैं और सीता जी को कुछ शांति मिलती है।
(दोहा 8)
चौपाई:
सीता जी विरह से अत्यंत दुखी होकर जीवन त्यागने का विचार करती हैं।
चौपाई:
वे अशोक वृक्ष से प्रार्थना करती हैं कि उनके दुःख का अंत हो।
चौपाई:
हनुमान जी यह सब देखकर उचित समय की प्रतीक्षा करते हैं।
दोहा:
हनुमान जी विचार करते हैं कि अब श्रीराम का संदेश देकर सीता जी को आश्वस्त करना चाहिए।
(दोहा 9)
चौपाई:
हनुमान जी वृक्ष से श्रीराम की अंगूठी नीचे गिराते हैं।
चौपाई:
अंगूठी देखकर सीता जी आश्चर्य और आनंद से भर जाती हैं और सोचती हैं कि यह श्रीराम का ही चिन्ह है।
चौपाई:
हनुमान जी मधुर वचन बोलकर श्रीराम का संदेश सुनाते हैं।
दोहा:
हनुमान जी के वचन सुनकर सीता जी को विश्वास हो जाता है कि वे वास्तव में श्रीराम के दूत हैं।
(दोहा 10)
चौपाई : भावार्थ
हनुमान जी अशोक वाटिका में पहुँचकर चारों ओर खोज करते हैं। वे देखते हैं कि राक्षसियाँ सीता जी को घेरकर डरा रही हैं। सीता जी अत्यंत दुःखी होकर श्रीराम का स्मरण कर रही हैं और उनके विरह में अत्यंत कष्ट सह रही हैं।
हनुमान जी वृक्ष पर छिपकर यह सब देखते हैं और उचित समय की प्रतीक्षा करते हैं ताकि बिना भय उत्पन्न किए सीता जी को श्रीराम का संदेश दे सकें।
दोहा 11 : भावार्थ
हनुमान जी विचार करते हैं कि यदि वे सीधे सामने जाएँगे तो सीता जी भयभीत हो सकती हैं, इसलिए पहले श्रीराम की कथा सुनाकर उनका विश्वास जीतना उचित होगा।
चौपाई : भावार्थ
हनुमान जी वृक्ष पर बैठकर धीरे-धीरे श्रीराम के गुण, उनके वनगमन, सीता हरण और उनकी खोज का वर्णन करते हैं। यह सुनकर सीता जी को आश्चर्य होता है कि लंका में कोई श्रीराम का भक्त कैसे हो सकता है।
उनके मन में आशा की किरण जागती है।
दोहा 12 : भावार्थ
सीता जी सोचती हैं कि यह अवश्य श्रीराम का कोई दूत है, क्योंकि वही उनके जीवन की घटनाओं को इस प्रकार जान सकता है।
चौपाई : भावार्थ
हनुमान जी नीचे आकर विनम्र रूप से श्रीराम की अंगूठी सीता जी को देते हैं। अंगूठी देखकर सीता जी का दुःख दूर होता है और उन्हें विश्वास हो जाता है कि श्रीराम ने ही उन्हें भेजा है।
वे हनुमान जी से श्रीराम का कुशल समाचार पूछती हैं।
दोहा 13 : भावार्थ
सीता जी को श्रीराम का संदेश पाकर संतोष मिलता है और उनके हृदय में पुनः आशा जागती है कि शीघ्र ही श्रीराम उन्हें मुक्त करेंगे।
चौपाई : भावार्थ
हनुमान जी श्रीराम की व्याकुल अवस्था का वर्णन करते हैं और बताते हैं कि श्रीराम भी सीता जी के वियोग में अत्यंत दुःखी हैं। यह सुनकर सीता जी का हृदय करुणा से भर जाता है।
वे हनुमान जी को अपनी चूड़ामणि देकर श्रीराम को पहचान के रूप में देने को कहती हैं।
दोहा 14 : भावार्थ
सीता जी संदेश देती हैं कि श्रीराम शीघ्र आकर उन्हें रावण के बंधन से मुक्त करें, क्योंकि अब उनका धैर्य समाप्त हो रहा है।
चौपाई : भावार्थ
हनुमान जी सीता जी को सांत्वना देते हैं और कहते हैं कि श्रीराम की सेना शीघ्र ही लंका आएगी। वे अपनी शक्ति का परिचय देते हुए लंका के राक्षसों को परास्त करने की इच्छा प्रकट करते हैं, परन्तु सीता जी उन्हें संयम रखने को कहती हैं।
दोहा 15 : भावार्थ
हनुमान जी सीता जी को आश्वासन देकर उनसे विदा लेते हैं और श्रीराम के पास लौटने का निश्चय करते हैं।
चौपाई : भावार्थ
हनुमान जी अशोक वाटिका में उत्पात मचाने लगते हैं। वे वृक्ष उखाड़ते हैं, फल खाते हैं और राक्षसों को ललकारते हैं ताकि रावण तक संदेश पहुँचे कि श्रीराम का दूत आ चुका है।
राक्षस सैनिक उन्हें पकड़ने आते हैं, पर हनुमान जी सबको परास्त कर देते हैं।
दोहा 16 : भावार्थ
अनेक राक्षस वीर मारे जाते हैं और लंका में हाहाकार मच जाता है।
चौपाई : भावार्थ
रावण क्रोधित होकर अपने पुत्र अक्षयकुमार को भेजता है। वह हनुमान जी से युद्ध करता है, पर हनुमान जी उसे भी मार गिराते हैं।
यह समाचार सुनकर रावण और भी क्रोधित हो उठता है।
दोहा 17 : भावार्थ
रावण मेघनाद (इन्द्रजीत) को भेजता है, जो युद्ध में ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करता है।
चौपाई : भावार्थ
हनुमान जी ब्रह्मास्त्र का मान रखते हुए स्वयं को बंधन में जाने देते हैं। राक्षस उन्हें बाँधकर रावण की सभा में ले जाते हैं।
वे निर्भय होकर रावण के सामने खड़े रहते हैं।
दोहा 18 : भावार्थ
हनुमान जी रावण को श्रीराम का संदेश देते हैं और उसे समझाते हैं कि वह सीता जी को लौटा दे।
चौपाई : भावार्थ
रावण अहंकार में उनकी बात नहीं मानता और उन्हें दंड देने का आदेश देता है। विभीषण नीति का स्मरण कराते हैं कि दूत का वध अनुचित है।
तब रावण उनकी पूँछ में आग लगाने का आदेश देता है।
दोहा 19 : भावार्थ
राक्षस हनुमान जी की पूँछ में कपड़ा बाँधकर उसमें आग लगा देते हैं।
चौपाई : भावार्थ
हनुमान जी छोटा रूप बनाकर बंधन से मुक्त हो जाते हैं। वे जलती हुई पूँछ से एक-एक भवन पर कूदते हैं और पूरी लंका में आग लगा देते हैं।
चारों ओर अग्नि फैल जाती है और राक्षस भयभीत होकर भागने लगते हैं।
दोहा 20 : भावार्थ
पूरी लंका जल उठती है और रावण का नगर संकट में पड़ जाता है।
चौपाई : भावार्थ
लंका जलाने के बाद हनुमान जी को स्मरण होता है कि कहीं इस अग्नि से सीता जी को कष्ट तो नहीं पहुँचा। वे तुरंत अशोक वाटिका की ओर जाते हैं और देखते हैं कि सीता जी सुरक्षित हैं।
वे मन ही मन श्रीराम का स्मरण करके प्रसन्न होते हैं।
दोहा 21 : भावार्थ
हनुमान जी सीता जी से पुनः विदा लेकर श्रीराम को समाचार देने के लिए समुद्र की ओर चल पड़ते हैं।
चौपाई : भावार्थ
हनुमान जी समुद्र लाँघकर वापस उसी पर्वत पर पहुँचते हैं जहाँ वानर सेना प्रतीक्षा कर रही थी। सभी वानर उन्हें देखकर अत्यंत प्रसन्न होते हैं।
वे सीता जी का समाचार सुनने के लिए उत्सुक हो उठते हैं।
दोहा 22 : भावार्थ
हनुमान जी सबको बताते हैं कि सीता जी सुरक्षित हैं और शीघ्र ही श्रीराम उनसे मिलेंगे।
चौपाई : भावार्थ
सब वानर आनंद से भर जाते हैं। अंगद, जाम्बवन्त आदि हनुमान जी की प्रशंसा करते हैं और उन्हें साथ लेकर श्रीराम के पास चल पड़ते हैं।
सबके मन में उत्साह और विजय की आशा भर जाती है।
दोहा 23 : भावार्थ
वानर सेना शीघ्रता से श्रीराम के पास लौटती है ताकि शुभ समाचार सुनाया जा सके।
चौपाई : भावार्थ
हनुमान जी श्रीराम के चरणों में गिरकर सीता जी का समाचार सुनाते हैं। वे बताते हैं कि सीता जी रावण की कैद में हैं और श्रीराम का स्मरण कर रही हैं।
हनुमान जी सीता जी की दी हुई चूड़ामणि श्रीराम को देते हैं।
दोहा 24 : भावार्थ
चूड़ामणि देखकर श्रीराम अत्यंत भावुक हो जाते हैं और सीता जी के वियोग में व्याकुल हो उठते हैं।
चौपाई : भावार्थ
हनुमान जी सीता जी की स्थिति, उनके धैर्य और श्रीराम के प्रति उनकी अटूट भक्ति का वर्णन करते हैं। यह सुनकर श्रीराम की आँखों में आँसू आ जाते हैं।
वे हनुमान जी के पराक्रम और सेवा से अत्यंत प्रसन्न होते हैं।
दोहा 25 : भावार्थ
श्रीराम हनुमान जी को हृदय से लगाकर कहते हैं कि तुम्हारे समान उपकारी कोई नहीं।
चौपाई : भावार्थ
हनुमान जी विनम्र होकर कहते हैं कि यह सब श्रीराम की कृपा से ही संभव हुआ है। वे अपने पराक्रम का श्रेय स्वयं नहीं लेते। श्रीराम उनके सेवाभाव और नम्रता से अत्यंत प्रसन्न होते हैं।
वानर सेना में उत्साह भर जाता है और सबको विश्वास हो जाता है कि अब सीता जी की मुक्ति निश्चित है।
दोहा 26 : भावार्थ
श्रीराम हनुमान जी की भक्ति और सेवा की प्रशंसा करते हैं और उन्हें अपना प्रिय भक्त बताते हैं।
चौपाई : भावार्थ
हनुमान जी लंका की स्थिति, रावण की शक्ति और सेना का विस्तार से वर्णन करते हैं। वे बताते हैं कि युद्ध अवश्य होगा, पर विजय श्रीराम की ही होगी।
सुग्रीव और अन्य वानर युद्ध की तैयारी के लिए उत्साहित हो जाते हैं।
दोहा 27 : भावार्थ
श्रीराम युद्ध की तैयारी का निश्चय करते हैं और सीता जी को शीघ्र मुक्त करने का संकल्प लेते हैं।
चौपाई : भावार्थ
श्रीराम समुद्र तट की ओर चलने का विचार करते हैं। पूरी वानर सेना उनके साथ प्रस्थान की तैयारी करती है। सबके मन में उत्साह और विश्वास है कि अब धर्म की विजय होगी।
हनुमान जी बार-बार सीता जी के दुःख का स्मरण कर श्रीराम को शीघ्र चलने का निवेदन करते हैं।
दोहा 28 : भावार्थ
वानर सेना श्रीराम के साथ समुद्र की ओर प्रस्थान करती है।
चौपाई : भावार्थ
मार्ग में सब वानर श्रीराम के पराक्रम और करुणा का गुणगान करते चलते हैं। श्रीराम का मन सीता जी के विरह से द्रवित रहता है, पर वे धैर्य बनाए रखते हैं।
सबको प्रतीक्षा है कि कब लंका पहुँचकर युद्ध आरम्भ होगा।
दोहा 29 : भावार्थ
समस्त सेना समुद्र तट पर पहुँचती है और आगे की योजना पर विचार होता है।
चौपाई : भावार्थ
हनुमान जी के कार्य से सभी वानर प्रेरित होते हैं। वे श्रीराम की सेवा को ही अपना जीवन मानते हैं। श्रीराम भी सबको स्नेहपूर्वक देखते हैं और उचित समय की प्रतीक्षा करते हैं।
यहाँ सुंदरकाण्ड का भाव धीरे-धीरे युद्ध की तैयारी की ओर बढ़ता है।
दोहा 30 : भावार्थ
श्रीराम समुद्र पार करने के उपाय पर विचार करते हैं।
चौपाई : भावार्थ
समुद्र तट पर पहुँचकर श्रीराम विचार करते हैं कि समुद्र कैसे पार किया जाए। वानर सेना उत्सुक है, पर समुद्र अत्यंत विशाल है। श्रीराम धैर्यपूर्वक उपाय सोचते हैं और सबको संयम रखने को कहते हैं।
हनुमान जी और अन्य वानर श्रीराम की आज्ञा की प्रतीक्षा करते हैं।
दोहा 31 : भावार्थ
श्रीराम समुद्र से मार्ग देने की प्रार्थना करने का निश्चय करते हैं।
चौपाई : भावार्थ
श्रीराम समुद्र देवता की उपासना करते हैं और विनम्रता से मार्ग देने की प्रार्थना करते हैं। तीन दिन तक वे धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करते हैं, पर समुद्र कोई उत्तर नहीं देता।
वानर सेना आश्चर्य में रहती है कि अब आगे क्या होगा।
दोहा 32 : भावार्थ
जब समुद्र से कोई उत्तर नहीं मिलता, तब श्रीराम क्रोधित होकर कठोर उपाय करने का विचार करते हैं।
चौपाई : भावार्थ
श्रीराम धनुष उठाते हैं और समुद्र को सुखाने का संकल्प करते हैं। उनके क्रोध से प्रकृति भी व्याकुल हो उठती है। तब समुद्र देवता प्रकट होकर क्षमा माँगते हैं और सेतु बनाने का उपाय बताते हैं।
वे नल और नील की विशेष शक्ति का वर्णन करते हैं।
दोहा 33 : भावार्थ
समुद्र देवता सेतु निर्माण का मार्ग बताते हैं जिससे सेना पार जा सके।
चौपाई : भावार्थ
वानर सेना उत्साह से पत्थर और पर्वत लाकर समुद्र में डालने लगती है। श्रीराम के नाम के प्रभाव से पत्थर जल पर तैरने लगते हैं।
सेतु निर्माण का कार्य तीव्र गति से आगे बढ़ता है।
दोहा 34 : भावार्थ
सेतु बनना प्रारम्भ होता है और सेना में आनंद छा जाता है।
चौपाई : भावार्थ
सब वानर मिलकर परिश्रम करते हैं। श्रीराम सबको प्रेमपूर्वक देखते हैं। यह कार्य केवल बल से नहीं, बल्कि भक्ति और विश्वास से पूर्ण होता है।
सेना में एकता और उत्साह दिखाई देता है।
दोहा 35 : भावार्थ
सेतु निर्माण शीघ्र पूर्ण होने की ओर बढ़ता है।
चौपाई : भावार्थ
हनुमान जी श्रीराम के सामने अत्यंत विनम्र होकर खड़े रहते हैं। वे कहते हैं कि जो कुछ कार्य हुआ है, वह सब प्रभु की कृपा से ही संभव हुआ है। वे अपने पराक्रम का कोई गर्व नहीं करते।
श्रीराम उनके सेवाभाव और विनम्रता से अत्यंत प्रसन्न होते हैं और वानर सेना भी हनुमान जी की प्रशंसा करती है।
दोहा 35 : भावार्थ
श्रीराम हनुमान जी को हृदय से लगाकर कहते हैं कि तुम्हारे समान उपकारी कोई नहीं।
चौपाई : भावार्थ
हनुमान जी सीता जी की दशा, उनका धैर्य और श्रीराम के प्रति उनकी अटूट श्रद्धा का विस्तार से वर्णन करते हैं। यह सुनकर श्रीराम का हृदय करुणा से भर जाता है और वे सीता जी के विरह में भावुक हो उठते हैं।
लक्ष्मण और सुग्रीव भी यह सुनकर गंभीर हो जाते हैं।
दोहा 36 : भावार्थ
सीता जी के संदेश से श्रीराम का संकल्प और दृढ़ हो जाता है कि वे शीघ्र उन्हें मुक्त करेंगे।
चौपाई : भावार्थ
श्रीराम हनुमान जी की बुद्धि, बल और भक्ति की प्रशंसा करते हैं। वे कहते हैं कि सच्चा सेवक वही है जो बिना अहंकार के प्रभु का कार्य करता है।
हनुमान जी बार-बार प्रभु के चरणों में सिर झुकाते हैं।
दोहा 37 : भावार्थ
हनुमान जी स्वयं को केवल प्रभु का दास बताते हैं और सारी महिमा प्रभु को अर्पित करते हैं।
चौपाई : भावार्थ
वानर सेना में उत्साह भर जाता है। सबको विश्वास हो जाता है कि अब सीता जी की मुक्ति निश्चित है। श्रीराम की कृपा से सबके मन में साहस और आनंद उत्पन्न होता है।
हनुमान जी की कथा सुनकर सभी प्रेरित होते हैं।
दोहा 38 : भावार्थ
हनुमान जी का कार्य सुनकर सब वानर आनंद और उत्साह से भर जाते हैं।
चौपाई : भावार्थ
श्रीराम हनुमान जी को आशीर्वाद देते हैं और कहते हैं कि तुम्हारी भक्ति अमर रहेगी। जो भी तुम्हारा स्मरण करेगा, उसके कष्ट दूर होंगे।
हनुमान जी प्रभु की सेवा को ही अपना जीवन मानते हैं।
दोहा 39 : भावार्थ
श्रीराम हनुमान जी पर अपनी विशेष कृपा प्रकट करते हैं।
चौपाई : भावार्थ
यहाँ सुंदरकाण्ड का भाव भक्ति और महिमा की ओर मुड़ता है। हनुमान जी की सेवा, साहस और प्रभु भक्ति का स्मरण किया जाता है।
कहा गया है कि जो इस कथा को श्रद्धा से सुनता या पढ़ता है, उसके भय और दुख दूर होते हैं।
दोहा 40 : भावार्थ
सुंदरकाण्ड का श्रवण और पाठ मन को शांति और साहस प्रदान करता है।
चौपाई : भावार्थ
भगवान के नाम, भक्त की सेवा और विश्वास की महिमा बताई जाती है। हनुमान जी आदर्श सेवक के रूप में स्थापित होते हैं।
यह कथा मनुष्य को संकट में धैर्य और भगवान पर विश्वास रखने की शिक्षा देती है।
दोहा 41–50 : भावार्थ
सुंदरकाण्ड के इस भाग में भक्ति, स्मरण और प्रभु कृपा की महिमा कही गई है — कि संकट में भगवान और उनके भक्त का स्मरण करने से मार्ग मिलता है।
चौपाई : भावार्थ
अंत में गोस्वामी तुलसीदास जी प्रभु श्रीराम, सीता जी और हनुमान जी की वंदना करते हैं और कहते हैं कि यह कथा भक्तों के कल्याण के लिए कही गई है।
दोहा 51–60 : भावार्थ
जो श्रद्धा और प्रेम से सुंदरकाण्ड का पाठ करता है, उसके भय दूर होते हैं, मन में साहस आता है और जीवन में मंगल होता है। यही सुंदरकाण्ड की फलश्रुति है।
पूजन विधि
🌺 सुंदरकाण्ड पाठ की विधि (प्रयोग) 1️⃣ पाठ से पहले तैयारी प्रातः या संध्या समय स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनें। पूजा स्थान पर श्रीराम, सीता जी और हनुमान जी का चित्र या मूर्ति रखें। दीपक और धूप जलाएँ। मन में संकल्प लें — किस उद्देश्य से पाठ कर रहे हैं (शांति, संकट निवारण, मनोबल आदि)। 2️⃣ प्रारम्भ करने की विधि पहले गणेश वंदना और गुरु स्मरण करें। श्रीराम और हनुमान जी का ध्यान करें। “श्रीराम जय राम जय जय राम” या “हनुमान जी का नाम” लेकर पाठ शुरू करें। 3️⃣ पाठ करने का तरीका पूरा सुंदरकाण्ड एक बैठक में पढ़ सकते हैं (लगभग 1.5–2 घंटे)। या रोज थोड़ा-थोड़ा भाग पढ़ सकते हैं। मंगलवार और शनिवार को पाठ विशेष फलदायी माना जाता है। पाठ स्पष्ट और श्रद्धा से करें, जल्दी-जल्दी नहीं। 4️⃣ पाठ के बाद हनुमान चालीसा या आरती कर सकते हैं। अंत में भगवान से धन्यवाद और प्रार्थना करें।
लाभ एवं महत्व
🌼 सुंदरकाण्ड पाठ के लाभ (परंपरागत मान्यता) ✅ 1. भय और संकट से रक्षा हनुमान जी के पराक्रम और साहस का स्मरण मन से डर और चिंता कम करता है। ✅ 2. मानसिक शांति और आत्मबल सीता जी की धैर्य और हनुमान जी की निष्ठा का वर्णन मन को स्थिर करता है। ✅ 3. बाधा और नकारात्मकता में कमी परंपरा में इसे घर के क्लेश, बाधा और अशांति दूर करने वाला माना गया है। ✅ 4. कार्य सिद्धि और आत्मविश्वास हनुमान जी का उदाहरण कठिन कार्यों में विश्वास और साहस देता है। ✅ 5. भक्ति और सकारात्मक सोच श्रीराम के प्रति समर्पण का भाव बढ़ता है और मन में आशा बनी रहती है। ⭐ विशेष प्रयोग (लोक परंपरा में) संकट या बीमारी में — लगातार 7 या 11 दिन पाठ महत्वपूर्ण कार्य से पहले — एक बार पूर्ण पाठ घर की शांति के लिए — परिवार सहित साप्ताहिक पाठ