।। रुद्रकवचम् ।।

।। ॐ नमः शिवाय ।।
।। रुद्रकवचम् ।।

कवच
भैरव उवाच —
वक्ष्यामि देवि कवचं मङ्गलं प्राणरक्षकम् ।
अहोरात्रं महादेवरक्षार्थं देवमण्डितम् ॥ १॥
अस्य श्रीमहादेवकवचस्य वामदेव ऋषिः, पङ्क्तिश्छन्दः, सौः बीजं, रुद्राः देवता, सर्वार्थसाधने विनियोगः ।
रुद्रो मामग्रतः पातु पृष्ठतः पातु शङ्करः ।
कपर्दी दक्षिणे पातु वामपार्श्वे तथा हरः ॥ २॥
शिवः शिरसि मां पातु ललाटे नीललोहितः ।
नेत्रं मे त्र्यम्बकः पातु बाहुयुग्मं महेश्वरः ॥ ३॥
हृदये च महादेव ईश्वरश्च तथोदरे ।
नाभौ कुक्षौ कटिस्थाने पादौ पातु महेश्वरः ॥ ४॥
सर्वं रक्षतु भूतेशः सर्वगात्राणि मे हरः ।
पाशं शूलञ्च दिव्यास्त्रं खड्गं वज्रं तथैव च ॥ ५॥
नमस्करोमि भूतेश रक्ष मां जगदीश्वर ।
पापेभ्यो नरकेभ्यश्च त्राहि मां भक्तवत्सल ॥ ६॥
जन्ममृत्युजराव्याधिकामक्रोधादपि प्रभो ।
लोभमोहान्महादेव रक्ष मां त्रिदशेश्वर ॥ ७॥
त्वं गतिस्त्वं मतिश्चैव त्वं भूमिस्त्वं परायणः ।
कायेन मनसा वाचा त्वयि भक्तिर्दृढास्तु मे ॥ ८॥
फलश्रुतिः
इत्येतद्रुद्रकवचं पाठनात्पापनाशनम् ।
महादेवप्रसादेन भैरवेन च कीर्तितम् ॥ ९॥
न तस्य पापं देहेषु न भयं तस्य विद्यते ।
प्राप्नोति सुखमारोग्यं पुत्रमायुः प्रवर्द्धनम् ॥ १०॥
पुत्रार्थी लभते पुत्रान्धनार्थी धनमाप्नुयात् ।
विद्यार्थी लभते विद्यां मोक्षार्थी मोक्षमेव च ॥ ११॥
व्याधितो मुच्यते रोगाद्बद्धो मुच्येत बन्धनात् ।
ब्रह्महत्यादि पापं च पठनादेव नश्यति ॥ १२॥
इति क्रियोड्डीशे महातन्त्रराजे देवीश्वरसंवादे रुद्रकवचं समाप्तम् ।
अष्टमः पटलः ।।

भावार्थ

संक्षिप्त भावार्थ
यह रुद्रकवच भगवान शिव की रक्षा-स्तुति है जिसमें साधक महादेव के विभिन्न नामों से अपने शरीर और जीवन की रक्षा की प्रार्थना करता है।
भैरव जी देवी से कहते हैं कि यह कवच अत्यंत मंगलकारी और प्राणों की रक्षा करने वाला है तथा दिन-रात साधक की रक्षा करता है।
इसमें साधक प्रार्थना करता है कि आगे रुद्र, पीछे शंकर, दाहिने कपर्दी और बाईं ओर हर रक्षा करें। सिर की रक्षा शिव करें, ललाट की नीललोहित, नेत्रों की त्र्यम्बक और भुजाओं की महेश्वर रक्षा करें। हृदय, उदर, नाभि, कटि और पैरों की भी भगवान शिव रक्षा करें।
इसके बाद साधक भगवान से प्रार्थना करता है कि वे उसे पाप, नरक, जन्म-मृत्यु, रोग, क्रोध, लोभ और मोह से बचाएँ। अंत में वह स्वीकार करता है कि शिव ही उसकी गति, बुद्धि और परम आश्रय हैं और उसकी दृढ़ भक्ति भगवान में बनी रहे।
फलश्रुति में कहा गया है कि इस कवच के पाठ से पाप नष्ट होते हैं, भय दूर होता है और सुख तथा आरोग्य की प्राप्ति होती है।

पूजन विधि

पाठ विधि
प्रातःकाल या सायंकाल स्नान के बाद पाठ करना श्रेष्ठ है।
स्वच्छ स्थान पर आसन बिछाकर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें।
भगवान शिव या शिवलिंग के सामने दीपक और धूप जलाएँ।
शांत मन से रुद्रकवच का पाठ करें।
सोमवार, प्रदोष या मासिक शिवरात्रि पर पाठ विशेष फलदायक माना जाता है।
रुद्राक्ष धारण करके पाठ करना और भी शुभ माना जाता है।

लाभ एवं महत्व

लाभ (फल)
रक्षा कवच
शरीर और जीवन की दिव्य रक्षा होती है।
पाप नाश
ब्रह्महत्या आदि पाप भी नष्ट होते हैं।
भय नाश
किसी प्रकार का भय नहीं रहता।
आरोग्य
रोगों से मुक्ति और स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है।
सुख और आयु
सुख और दीर्घायु प्राप्त होती है।
मनोकामना सिद्धि
पुत्र चाहने वाला पुत्र पाता है।
धन चाहने वाला धन पाता है।
विद्यार्थी विद्या पाता है।
मोक्ष चाहने वाला मोक्ष प्राप्त करता है।