संक्षिप्त भावार्थ
यह रुद्रकवच भगवान शिव की रक्षा-स्तुति है जिसमें साधक महादेव के विभिन्न नामों से अपने शरीर और जीवन की रक्षा की प्रार्थना करता है।
भैरव जी देवी से कहते हैं कि यह कवच अत्यंत मंगलकारी और प्राणों की रक्षा करने वाला है तथा दिन-रात साधक की रक्षा करता है।
इसमें साधक प्रार्थना करता है कि आगे रुद्र, पीछे शंकर, दाहिने कपर्दी और बाईं ओर हर रक्षा करें। सिर की रक्षा शिव करें, ललाट की नीललोहित, नेत्रों की त्र्यम्बक और भुजाओं की महेश्वर रक्षा करें। हृदय, उदर, नाभि, कटि और पैरों की भी भगवान शिव रक्षा करें।
इसके बाद साधक भगवान से प्रार्थना करता है कि वे उसे पाप, नरक, जन्म-मृत्यु, रोग, क्रोध, लोभ और मोह से बचाएँ। अंत में वह स्वीकार करता है कि शिव ही उसकी गति, बुद्धि और परम आश्रय हैं और उसकी दृढ़ भक्ति भगवान में बनी रहे।
फलश्रुति में कहा गया है कि इस कवच के पाठ से पाप नष्ट होते हैं, भय दूर होता है और सुख तथा आरोग्य की प्राप्ति होती है।
पाठ विधि
प्रातःकाल या सायंकाल स्नान के बाद पाठ करना श्रेष्ठ है।
स्वच्छ स्थान पर आसन बिछाकर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें।
भगवान शिव या शिवलिंग के सामने दीपक और धूप जलाएँ।
शांत मन से रुद्रकवच का पाठ करें।
सोमवार, प्रदोष या मासिक शिवरात्रि पर पाठ विशेष फलदायक माना जाता है।
रुद्राक्ष धारण करके पाठ करना और भी शुभ माना जाता है।
लाभ (फल)
रक्षा कवच
शरीर और जीवन की दिव्य रक्षा होती है।
पाप नाश
ब्रह्महत्या आदि पाप भी नष्ट होते हैं।
भय नाश
किसी प्रकार का भय नहीं रहता।
आरोग्य
रोगों से मुक्ति और स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है।
सुख और आयु
सुख और दीर्घायु प्राप्त होती है।
मनोकामना सिद्धि
पुत्र चाहने वाला पुत्र पाता है।
धन चाहने वाला धन पाता है।
विद्यार्थी विद्या पाता है।
मोक्ष चाहने वाला मोक्ष प्राप्त करता है।