॥ श्रीबाला महामालामन्त्र स्तव ॥ ॐ-अस्य-श्री-बाला-त्रिपुर-सुन्दरी-महा-माला-मन्त्रस्य-दक्षिणामूर्तिः-ऋषिः। पङ्क्तिः-छन्दः। श्री-बाला-त्रिपुर-सुन्दरी-देवता। ऐं-बीजम्। सौः-शक्तिः। क्लीं-कीलकम्। श्री-बाला-त्रिपुर-सुन्दरी-प्रीत्यर्थे-महा-माला-मन्त्र-पारायणे-विनियोगः।। ध्यानम् रक्त-अम्बराम्-चन्द्र-कला-अवतंसाम्-समुद्यत्-आदित्य-निभाम्-त्रि-नेत्राम्। विद्या-अक्ष-माल-अभय-दान-हस्ताम्-ध्यायामि-बालाम्-अरुण-अम्बुज-स्थाम्।।१।। विद्या-अक्ष-माला-सु-कपाल-मुद्रा-राजत्-कराम्-कुन्द-समान-कान्तिम्। मुक्ता-फल-अलङ्कृत-शोभित-अङ्गीम्-बालाम्-भजे-वाङ्मय-सिद्धि-हेतोः।।२।। भजे-कल्प-वृक्ष-आधः-उद्दीप्त-रत्न-आसने-सन्निषण्णाम्-मद-आधूर्णित-अक्षीम्। करैः-बीज-पूरम्-कपालेषु-चापम्-स-पाश-अङ्कुशम्-रक्त-वर्णम्-दधानाम्।।३।। व्याख्यान-मुद्रा-अमृत-कुम्भ-विद्याम्-अक्ष-स्रजम्-सन्दधती-कर-अग्रैः। चित्-रूपिणीम्-शारद-चन्द्र-कान्तिम्-बालाम्-भजे-मौक्तिक-भूषित-अङ्गीम्।। लम्-इति-आदि-पञ्च-पूजाम्-कुर्यात्।। वं-वं-वषट्-वौषट्-श्रौषट्-आम्-ह्रीम्-क्रों-ऐं-क्लीं-सौः। आम्-ऐं-ह्रीम्-क्लीं-सौः। आम्-ह्रीम्-क्रों-ऐं-क्लीं-सौः-श्रीम्-ह्सौः-नमः-भगवति-बाला-परमेश्वरि।। ऐं-ह्रीं-श्रीं-ह्सौः-शौः-सह-क्षमल-वरय। ईम्-हस-क्षमल-वरय। ऊम्-श्री-गुरु-परम-गुरु-परमेष्ठि-गुरु-पर-अपर-गुरु-स्वरूपे।। ऐं-क्लीं-सौः-सकल-जगत्-उत्पत्ति-मातृके। अकार-आदि-क्षकार-अन्त-मातृका-वर्ण-स्वरूपिणि। इच्छा-ज्ञान-क्रिया-शक्ति-आत्मिके।। ऐं-क्लीं-सौः-बीज-त्रय-आत्मिके। बिन्दु-त्रय-आत्मिके। त्रि-कूट-आत्मिके। त्रि-गुण-आत्मिके। त्रि-खण्ड-आत्मिके। त्रि-चक्र-आत्मिके। त्रि-कोण-आत्मिके। त्रि-अक्षरे। त्रि-पुरे।। ऐं-क्लीं-सौः-पञ्च-भूत-आत्मिके। त्रि-शक्ति-आत्मिके। पञ्च-कृत्य-परायणे। सृष्टि-स्थिति-संहार-तिरोधान-अनुग्रह-कारिके। पञ्च-प्रेत-मञ्च-आधि-शायिनि।। ऐं-क्लीं-सौः-अतल-वितल-सुतल-तलातल-रसातल-महातल-पाताल-भूः-लोक-भुवः-लोक-सुवः-लोक-महः-लोक-जनः-लोक-तपः-लोक-सत्य-लोक-भुवन-एक-वीर-मात्रे।। समुद्यत्-आदित्य-सहस्र-आभे। सोम-सूर्य-अग्नि-लोचन-त्रय-राजिते। चन्द्र-कला-अवतंसे। रक्त-अम्बर-धारिणि।। पुस्तक-अक्ष-माला-वर-अभय-कर-विभूषिते। कनक-वज्र-वैडूर्य-मुक्ता-अलङ्कार-भूषिते।। ऐं-ऐं-सौः-क्लीं-क्लीं-ऐं-सौः-सौः-क्लीं-नव-अक्षर-आत्मिके।। नव-कोण-पुर-आवासे। नव-वर्ष-वयः-विशिष्ट-अङ्गि। बाला-त्रि-पुरे।। ब्राह्मि-आदि-अष्ट-मातृका-परि-सेविते। अणिमा-आदि-अष्ट-ऐश्वर्य-प्रदे। बाल-अम्बिके।। एहि-एहि-आगच्छ-आगच्छ। मम-शरीरे-प्रवेशय-प्रवेशय। मम-सकल-कार्याणि-साधय-साधय। दुर्गतिम्-मोचय-मोचय। श्रियम्-प्रापय-प्रापय।। आम्-ऐं-ह्रीं-क्लीं-क्रों-सौः। आम्-ह्रीं-क्रों-ऐं-क्लीं-सौः।। ऐं-ऐं-नमः-बाला-वागीश्वरि।। ऐं-ऐं-कर्पूर-धवल-आकार-प्रभे।। ऐं-ऐं-व्रज-मौक्तिक-मुक्ता-अलङ्कार-भूषिते।। ऐं-ऐं-मुक्ता-अक्ष-माला-पुस्तक-वर-अभय-कर-विभूषिते।। ऐं-ऐं-शुभ्र-अम्बर-धारिणि।। ॐ-ह्रीं-ह्स्रैं-ह्रीं-ॐ-ऐं-धीं-क्लीं-सौः-महा-सरस्वती-आत्मिके।। ऐं-ऐं-महा-सरस्वत-प्रदे।। ऐं-ऐं-वेद-वेदाङ्ग-न्याय-मीमांसा-पुराण-धर्म-शास्त्र-आत्मिके।। मम-निखिल-भाषासु-अनवद्य-गद्य-पद्य-रचना-चातुर्यम्-दापय-दापय।। विविध-तर्क-विगाहित-समस्त-शास्त्र-सागर-गरीयः-प्रतिभाम्-प्रापय-प्रापय।। ऐं-ऐं-वद-वद-वाग्-वादिनि।। ऐं-ऐं-गङ्गा-तरङ्ग-कल्लोल-वाक्-पटुत्व-प्रदे। मम-सकल-भाषासु-मृदु-मधुर-रस-भाव-भासुर-वाक्-जालम्-देहि-देहि।। आम्-ऐं-ह्रीं-क्लीं-क्रों-सौः। आम्-ह्रीं-क्रों-ऐं-क्लीं-सौः।। क्लीं-क्लीं-नमः-भगवति-बाला-कामेश्वरि।। इच्छा-काम-फल-प्रदे।। क्लीं-क्लीं-रक्त-गन्ध-अनुलेपने।। क्लीं-क्लीं-बन्धूक-कुसुम-आकार-कान्ति-भूषण-भूषिते।। क्लीं-क्लीं-रक्त-अलङ्कार-भूषिते।। क्लीं-क्लीं-रक्त-माल्य-अम्बर-धारिणि।। क्लीं-क्लीं-इक्षु-कोदण्ड-पुष्प-इषु-पाश-अङ्कुश-कर-भूषिते।। क्लीं-क्लीं-सर्व-सत्त्व-वशङ्करि।। क्लीं-क्लीं-सर्व-लोक-आकर्षिणि।। क्लीं-क्लीं-सकल-काम-प्रपूरणि।। क्लीं-क्लीं-असाध्य-साधिनि।। मम-दृष्ट-अदृष्टानाम्-सर्वेषाम्-स्त्री-पुरुषाणाम्-जनानाम्-गति-मति-हृदय-चित्त-आदिकम्-आकर्षय-आकर्षय।। वशम्-आनय-वशम्-आनय।। सम्मोहय-सम्मोहय।। आम्-ऐं-ह्रीं-क्लीं-क्रों-सौः। आम्-ह्रीं-क्रों-ऐं-क्लीं-सौः।। सौः-सौः-नमः-बाला-सौभाग्य-ईश्वरि।। सौः-सौः-हेम-प्रभा-भासमाने।। सौः-सौः-विद्युत्-निकर-नमत्-प्रभे।। सौः-सौः-स्फुरत्-चन्द्र-कला-पूर्णे।। कलश-वर-अभय-ज्ञान-मुद्रा-कर-विभूषिते।। सौः-सौः-स्रवत्-पीयूष-धारा-अभि-वर्षिणि।। महा-सौन्दर्य-सुभगे।। सौः-सौः-महा-मृत्यु-विनाशिनि।। सौः-सौः-सर्व-शत्रु-संक्षोभिणि।। मम-शत्रुभिः-कृत-क्रियमाण-करिष्यमाण-निखिल-मन्त्र-यन्त्र-तन्त्र-प्रयोगान्-उच्चाटय-उच्चाटय।। विविध-प्रयोगान्-नाशय-नाशय।। सौः-सौः-सर्व-शत्रु-भयङ्करि।। मम-शत्रूणाम्-वाक्-चित्त-चक्षुः-जिह्वा-गल-चेष्टा-आदिकान्-स्तम्भय-स्तम्भय।। आम्-ऐं-ह्रीं-क्लीं-क्रों-सौः। आम्-ह्रीं-क्रों-ऐं-क्लीं-सौः-नमः-बाला-त्रिपुर-सुन्दरि।। ऐं-क्लीं-सौः-सर्व-उपद्रव-नाशिनि। राज-चोर-सर्प-सिंह-वृश्चिक-व्याघ्र-अग्नि-जल-विष-आदि-उत्पन्नान्-सर्व-उपद्रवान्-नाशय-नाशय।। ऐं-क्लीं-सौः-सर्व-व्याधि-विनाशिनि। सर्व-रोगान्-नाशय-नाशय। आरोग्यम्-दापय-दापय।। ऐं-क्लीं-सौः-महा-साम्राज्य-दायिनि।। ऐं-क्लीं-सौः-सर्व-सम्पत्-प्रपूरणि। सर्व-सौभाग्य-प्रदे। महा-सम्पत्-प्रदे। मम-सकल-ऐश्वर्यम्-दापय-दापय।। ऐं-क्लीं-सौः-जये-विजये-जिते-अपराजिते। सकल-लोक-जय-प्रदे। मम-सर्वत्र-सर्वदा-यशः-विजय-आदिकम्-देहि-देहि।। स-कुटुम्बम्-स-परिवारम्-माम्-रक्ष-रक्ष।। आम्-ऐं-ह्रीं-क्लीं-क्रों-सौः। आम्-ह्रीं-क्रों-ऐं-क्लीं-सौः।। सकल-जगत्-नुतायै-श्री-बाला-त्रिपुर-सुन्दर्यै-ह्रीं-हूं-फट्-स्वाहा।। अनेन-मया-कृतेन-श्री-बाला-त्रिपुर-सुन्दरी-महा-माला-मन्त्र-जपेन-भगवती-सर्व-आत्मिका-श्री-बाला-त्रिपुर-सुन्दरी-सुप्रीता-सुप्रसन्ना-वरदा-भवतु।। श्री-बाला-त्रिपुर-सुन्दरी-चरण-समर्पितः-अस्तु।। इति-श्री-बाला-महा-माला-मन्त्र-स्तवः-सम्पूर्णः।।